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गाफिल हुवा कहाँ तू डोले, दिन जाते तेरे भरती में

From जैनकोष

(राग भैरवी)
गाफिल हुवा कहाँ तू डोले, दिन जाते तेरे भरती में ।।
चोकस करत रहत है नाहीं, ज्यों अंजुलि जल झरती में ।
तैसे तेरी आयु घटत है, बचै न बिरिया मरती में ।।१ ।।
कंठ दबै तब नाहिं बनेगो, काज बनाले सरती में ।
फिर पछताये कुछ नहिं होवै, कूप खुदै नहीं जरती में ।।२ ।।
मानुष भव तेरा श्रावक कुल, यह कठिन मिला इस धरती में ।
`भूधर' भवदधि चढ़ नर उतरो, समकित नवका तरती में ।।३ ।।