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चित्त! चेतनकी यह विरियां रे

From जैनकोष

(राग सोरठ)
चित्त! चेतनकी यह विरियां रे ।।टेक ।।
उत्तम जनम सुतन तरूनापौ, सुकृत बेल फल फरियां रे ।।
लहि सत-संगतिसौं सब समझी, करनी खोटी खरियां रे ।
सुहित संभाल शिथिलता तजिदैं, जाहैं बेली झरियां रे ।।१ ।।चित. ।।
दल बल चहल महल रूपेका, अर कंचनकी कलियां रे ।
ऐसी विभव बढ़ी कै बढ़ि है, तेरी गरज क्या सरियां रे ।।२ ।।चित. ।।
खोय न वीर विषय खल साटैं, ये क्रोड की घरियां रे ।
तोरि न तनक तगा हित `भूधर' मुकताफलकी लरियां रे ।।३ ।।चित. ।।