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जगदानंदन जिन अभिनंदन

From जैनकोष

जगदानंदन जिन अभिनंदन, पदअरविंद नमूं मैं तेरे ।।टेक ।।
अरुणवरन अघताप हरन वर, वितरन कुशल सु शरन बडेरे ।
पद्मासदन मदन-मद-भंजन, रंजन मुनिजन मन अलिकेरे ।।१ ।।
ये गुन सुन मैं शरनै आयो, मोहि मोह दुख देत घनेरे ।
ता मदभानन स्वपर पिछानन, तुम विन आन न कारन हेरे ।।२ ।।
तुम पदशरण गही जिनतैं ते, जामन-जरा-मरन-निरवेरे ।
तुमतैं विमुख भये शठ तिनको, चहुँ गति विपत महाविधि पेरे ।।३ ।।
तुमरे अमित सुगुन ज्ञानादिक, सतत मुदित गनराज उगेरे ।
लहत न मित मैं पतित कहों किम, किन शशकन गिरिराज उखेरे ।।४ ।।
तुम बिन राग दोष दर्पनज्यों, निज निज भाव फलैं तिनकेरे ।
तुम हो सहज जगत उपकारी, शिवपथ-सारथवाह भलेरे ।।५ ।।
तुम दयाल बेहाल बहुत हम, काल-कराल व्याल-चिर-घेरे ।
भाल नाय गुणमाल जपों तुम, हे दयाल, दुखटाल सबेरे ।।६ ।।
तुम बहु पतित सुपावन कीने, क्यों न हरो भव संकट मेरे ।
भ्रम-उपाधि हर शम समाधिकर, `दौल' भये तुमरे अब चेरे ।।७ ।।