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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 213

From जैनकोष



सहलाणं दव्वाणं जं दादुं सक्कदे हि अवगासं ।

तं आयासं दुविहं लोयालोयाण भेएण ।।213।।

आकाशद्रव्य का स्वरूप―आकाशद्रव्य उसे कहते हैं जो समस्त द्रव्यों को अवगाह दे, स्थान दे । सभी चीजें कहां भरी रहती हैं ? आकाश में । आकाश में यह सामर्थ्य है कि यहाँ पदार्थ आते जायें । कहीं-कहीं तो पदार्थ में पदार्थ भी समा जाते हैं । तो इसमें मूल कारण तो आकाश है ही । पर उन पदार्थों में ऐसी विशेषता है कि वे पदार्थ दूसरे पदार्थ का प्रतिघात नहीं करते । जो सर्वद्रव्यों को अवगाह देने में समर्थ है उसे आकाश कहते हैं । वह आकाश दो प्रकार का है लोकाकाश और अलोकाकाश । आकाश के स्वयं दो भेद नहीं हैं, आकाश तो अखंड एक द्रव्य हैं। कोई आकाश के टुकड़े कर सकता है क्या? वह अखंड चीज है, पर उसमें यह विभाग बनाया है कि जितनी जगह में छहों द्रव्य हैं उतने को लोकाकाश कहते हैं, और जहाँ केवल आकाश ही है, अन्य कोई द्रव्य नहीं है उसको अलोकाकाश कहते हैं ।

सर्वद्रव्यों में अवगाहनशक्ति होने व न होने की एक जिज्ञासा―अब यहाँ एक शंका की जा सकती है कि बतलाओ सर्वद्रव्यों में अवगाहना शक्ति है या नहीं? जैसे राख में पानी समा जाता है और उसमें सूई समा जाती है, तो एक पदार्थ में दूसरा पदार्थ समा जाता है यह दिखने में आ रहा है तो उस ही का लक्ष्य करके या आकाश के स्वरूप के वर्णन के विरोध में शंका की जा रही है कि इन पदार्थों में खुद में अवगाहन शक्ति है या नहीं । अगर कहो कि अवगाहन शक्ति नहीं है तो कौन किसको अवगाह देता है सो बताओ? और यदि है तो उसकी उपपत्ति बताना चाहिए । देखिये―छहों द्रव्य अपना-अपना स्वरूप लिए हुए है और उनमें यह देखा जा रहा है कि जहाँ जीव है वहाँ पुद्गल भी समाये हैं, वहीं धर्मद्रव्य भी है । प्रत्येक प्रदेश पर छहों द्रव्य हैं, उनका अवगाह तो सिद्ध हो रहा है, तो यह अवगाह हो रहा है उसका कारण क्या है? बताया गया है कि केवलज्ञान में सारा लोकालोक समाया हुआ है । आकाश द्रव्य तो अनंतप्रदेशी है, वह केवलज्ञान में समा गया है । आकाश के ठीक मध्य में असंख्यातप्रदेशी लोक है और असंख्यातप्रदेशी लोक में अनंत जीव समाये हैं । तो देखिये―एक द्रव्य में अनेक द्रव्य समाये हुए हैं ना । जीव में जीव समाये हैं, जीव में पुद्गल समाये हैं, और उन जीवों से अनंत गुने पुद्गल है । एक द्रव्य में कितने ही दूसरे द्रव्यों का अवगाह सिद्ध होता है । तो ऐसा अवगाह होने में कारण क्या है? उस अवगाह की उपपत्ति बताने के लिए अब आकाश द्रव्य की विशेषतया स्वरूप विश्लेषणा की

जायेगी और बताया जायेगा कि किस तरह से पदार्थ का परस्पर में अवगाह है और परस्पर में अवगाह होकर भी सर्व वस्तु का एक आकाश में ही अवगाह है । तो जो सर्व पदार्थों को अवगाहित करे, ठहराये उसे आकाश कहते हैं ।


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  • कार्तिकेय अनुप्रेक्षा
  • प्रवचन
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