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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:कार्तिकेय अनुप्रेक्षा - गाथा 214

From जैनकोष



सव्वाणं दव्वाणं अवगाहण-सत्ति अत्थि परमत्थं ।

जह भसम पाणियाणं जीव-पएसाण बहुयाणं ।।214।।

वस्तुत: आकाश में व अप्रतीघातरूप से सर्व द्रव्यों में अवगाहनशक्ति का वर्णन―यहां आकाशद्रव्य का लक्षण बता रहे हैं । आकाश उसे कहते हैं जहाँ सब द्रव्य समा सकें, जो दूसरों को अवगाह देवे उसे आकाशद्रव्य कहते हैं । यहाँ यह बात विचारना है कि अन्य द्रव्यों में अवगाहन शक्ति है या नहीं, तो इसके समाधान में कहते हैं कि सर्वद्रव्यों में अवगाहन शक्ति है । एक द्रव्य में दूसरा द्रव्य समा जाय ऐसी अवगाहन शक्ति है वास्तव में । जैसे कि राख और पानी में जहाँ पानी है वहाँ ही राख डालने पर पानी में राख समा जाती है अथवा जहाँ राख है उसमें पानी डालने पर पानी समा जाता है तो इसी प्रकार एक द्रव्य में दूसरे द्रव्यों के अवगाहने की शक्ति है । निश्चय से सभी द्रव्यों में अवगाह शक्ति है । जैसे जल और भस्म में, इसी प्रकार बहुत से जीवों का आकाश में अवगाह जानें । जहाँ एक जीव है वहाँ अनेक जीव भी समाए हैं, और सिद्ध स्थान में तो जहाँ एक सिद्ध भगवान विराजमान हैं उस ही जगह अनेक सिद्ध विराजमान हैं । इस ढाई द्वीप के अंदर ऐसी कोई जगह नहीं बची जहाँ से कोई मोक्ष न गया हो । प्रत्येक प्रदेश से अनेक जीव मोक्ष गए । जिस स्थान से एक जीवमोक्ष गया उसी जगह से अनेक जीव मोक्ष गए । और, सिद्ध होने पर उनकी गति सीधी होती है । तो जहाँ एक भगवान ऊपर विराजे हैं वहाँ ही अनेक भगवान विराजे हैं । तभी तो कहते हैं कि एक माँहि एक राजे एक मांहि अनेकनो । स्वरूप दृष्टि से देखो तो एक भगवान में एक ही रह रहा है दूसरा नहीं । जो भगवान केवलज्ञान के द्वारा लोकालोक को जानते हैं वे अपने ज्ञात से ही जानते हैं, एक भगवान दूसरे भगवान के ज्ञान से नहीं जानते । आनंद भी सबका अपने आपमें है । तो एक में एक ही है, पर व्यवहार दृष्टि से, प्रदेश दृष्टि से देखा जाय तो जहाँ एक भगवा हैं वहाँ ही अनेक भगवान हैं, तो वहाँ तो यह बात स्पष्ट है । यहाँ भी संसार अवस्था में जहाँ एक जीव है वहाँ अनेक जीव भी समाये हुए रहते हैं । एक निगोद शरीर में अनंत जीव रहते हैं । तो प्रदेश वही है और वहाँ अनेक जीव रह रहे हैं तो एक स्थान में अनेक का रहना संभव है । क्योंकि उनमें अवगाह की शक्ति है । जैसे आकाश में घट है, घट में भस्म है, भस्म में जल समा गया और उसही में सूई डाला तो वह भी समा जाती है । तो ऐसे ही समझिये कि सभी द्रव्य लोकाकाश में परस्पर अवगाह रूप से समा जाते हैं । जहाँ एक दीप का प्रकाश है वहाँ 10-50 दीप रख दिए जायें तो उनका भी प्रकाश समा जाता है तो इसी तरह समझिये कि सभी द्रव्यों में परस्पर अवगाहन की शक्ति हैं, लोकाकाश में जितने प्रदेश हैं सभी प्रदेशों पर छहों जाति के द्रव्य हैं । ये सब द्रव्य हैं तो वे प्रतिघात नहीं करते, इस कारण से उनमें समाने की बात कही है । वस्तुत: तो यह गुण आकाश का है । आकाश में सभी पदार्थ समा जाते हैं ।


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  • कार्तिकेय अनुप्रेक्षा
  • प्रवचन
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