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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2116-2117

From जैनकोष



ततो विवेकमालम्व्य विरज्य जननभ्रमात् ।

त्रिरत्नशुद्धिमासाद्य तप: कृत्वान्यदुष्करम् ।।2116।।

धर्मध्यानं च शुक्लं च स्वीकृत्य निजवीर्यत: ।

कृत्स्रकर्मक्षयं कृत्वा व्रजंति पदमव्ययम् ।।2117।।

मुमुक्षु को विवेक की प्रथम आवश्यकता―जब कि संसार में किसी भी वस्तु का शरण लेना हितकारी नहीं है तब समस्त परपदार्थों से विरक्त होकर परमशरणभूत जो आत्मा का स्वरूप है, भगवान का जो स्वरूप है उसमें दृष्टि देना, उसकी शरण गहना, यही एक हितकारी है ।जब इस धर्मध्यान में यत्न होता है संत पुरुषों का तो उसके फल में मनुष्यभव के बाद वे अहिमिंद्र देव में उत्पन्न होते हैं और वहाँ से आयु पूरी कर बड़े श्रेष्ठ मनुष्य होते हैं । फिर वैराग्य से सुवासित होकर, दीक्षित होकर, आत्मध्यान में लगकर निर्वाणपद प्राप्त करते हैं । इस कारण से जिन्हें मोक्ष की इच्छा है वे इस विवेक का आलंबन करें । यहाँ संसार में तो सारा अटपट संबंध है । जो आपके घर में दो चार जीव आ गए हैं वे उन अनंत जीवों में से हैं, यदि ये न आते, इनकी जगह पर और कोई आते तो उनसे मोह करते । तो फिर अपना तो कोई न रहा । तब विवेक करना चाहिए कि इस आसक्ति स्नेह और मोह से कुछ भी सिद्धि न होगी । जो पुरुष मोही होगा, आसक्त होगा वह अपना जीवन व्यर्थ में खो रहा है, हाथ कुछ लगेगा नहीं और व्यर्थ ही जिंदगी में कष्ट सह रहा । यदि धर्म की प्रीति हो जाय तो इस जीव को इस भव में भी शांति मिले और आगे भव का भी रास्ता मिले, जिससे रत्नत्रय की साधना कर सके । तो विवेक करना चाहिए ।

अविवेक का उदाहरण और विवेक की ओर झुकाव―जैसे किसी आदमी ने किसी लड़के को बहका दिया कि देख लड़के ! तेरा कान वह कौवा लिए जा रहा है, तो वह लड़का उस कौवा का पीछा करता है । कोई पूछता है―अरे बेटा क्यों भागे जा रहे हो? तो वह कहता―अरे बाबा जी छेड़ो मत, बड़ा गजब हो गया,....अरे क्या हो गया ?....अरे मेरा कान कौवा ले गया । वह समझाता है―अरे कौवा तेरा कान कहां लिए जा रहा है, अपने कान को टटोलकर देख तो सही । जो उसने टटोलकर देखा तो कहता है―अरे कान तो यहीं लगा है । तो ऐसे ही दुनिया के मोही प्राणियों को बहका रखा है दूसरे बहके हुए व्यक्तियों ने देखो अमुक में सुख है, ऐसे इंद्रिय भोगों में सुख है, यों भोजन करो, यों देखो, यों सुनो, इसमें सुख है । यों बहका रखा है और अपने सुख के लिए दौड़ा जा रहा है विषयसाधनों के पास । आचार्यदेव समझा रहे हैं―अरे भाई कहाँ दौड़े जा रहे हो ?....तो ये मोही प्राणी कहते―आचार्य महाराज, आप चुप बैठे रहो, मेरा सुख उन विषयों में है, वैभव में हैं, धन में है । आचार्य कहते―अरे क्यों श्रम करते हो? जरा अपने को तो टटोलो, तेरा सुख तेरे से बाहर नहीं गया, किसी ने छीना नहीं है । अपने स्वरूप को तो तको, और कदाचित् यह जीव अपने स्वरूप पर दृष्टिपात कर ले तो मान जायगा―अहो ! मैं सुख के लिए कहाँ-कहाँ बाहर दौड़ा भटका, किसके पीछे भागे, मेरा सुख तो यहीं रखा हुआ है । मैं स्वयं आनंदस्वभावी हूँ ।

मन:संयमन का प्रभाव―देखो भैया! जिन बड़े मुनीश्वरों की कथा हम बड़ी भक्ति से सुनते हैं तो बात क्या हुई उनमें? उन्होंने अपना स्वरूप पहिचाना । ज्ञान और आनंदरूप मैं हूँ ऐसा उन्होने पहिचाना, जिसके फल में बाहर में उनको कुछ खोजने की चाह न रही इसी कारण वे महान हुए हैं और हम उनकी बड़ी भक्ति से चर्चा करते हैं । देखो―करने को कोई कैसा ही पाप करे किंतु 10 आदमियों में वह पाप की बात का उपदेश करे तो वह किसी को न रुचेगा, झेलने वाले को भी न रुचेगा । तो पाप यदि अच्छी चीज होती तौ उसे भी समारोह में उपदेश में या भाषण में खुले रूप से उपदेश देते, पर उसका उपदेश कोई नही देता । वहाँ तो त्याग, व्रत, संयम, दान, परोपकार आदिक की ही बातें करनी होंगी । तो जिसकी बात भी करना पाप है वह कार्य इस जीव का हित कैसे कर सकता है? तो विवेक करिये―बाह्यपदार्थों में दौड़ न लगाइयेगा, संसार के भ्रमण से विरक्त होइये । थोड़ा मन को संयत करना है कि आनंद मिलेगा अपार । थोड़ा मन को ढीला किया, थोड़ा मार्ग से च्युत हुए कि करा कराया जो कुछ है वह समाप्त हो जाता है । विवेक करें और संसार के भ्रमण से विरक्त हों, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र की शुद्धि प्राप्त करें, इतना आधार पाने वाला साधु फिर अत्यंत दुष्कर तपश्चरण को भी करे, धर्मध्यान, शुक्लध्यान को स्वयं करे तो वह समस्त कर्मो का क्षय कर के अविनाशी पद प्राप्त कर लेता है ।

कल्याणर्थीक होने के लिये आत्मप्रयोग के बल की आवश्यकता―कोई ऐसी शंका करे कि हमने तो बहुत विद्या नहीं पढ़ी, बहुत शास्त्र नहीं देखा, हम अपना कल्याण कैसे कर सकेंगे? तो जरा उन बंदरों से, मेढकों से भी तो पूछ लो, जिनकी चर्चा पुराणों में हे, कि तुमने किस पाठशाला में पढ़ा था और कैसे सम्यक्त्व उत्पन्न कर लिया था? यद्यपि मनुष्य की बात तिर्यंचों से कुछ निराली है भव के कारण, इन्हें विद्याध्ययन करना चाहिए, किंतु कोई ऐसा निरुत्साह हो जाय कि हमने बचपन में अध्ययन किया नहीं, तर्क छंद व्याकरण आदिक कलावों को सीखा नहीं, तो अब क्या होगा? तो उन्हें निरुत्साह होने की जरूरत नहीं है । अरे उन्हें भी इतना ज्ञान तो है कि जगत के सभी पदार्थ भिन्न हैं और नष्ट हो जाने वाले हैं, जिसको आत्मकल्याण की लगन है उसको इतना ज्ञान तो सही मायने में होता है कि विश्व के ये सारे समागम न्यारे हैं, विनाशीक हैं, इनसे मेरा पूरा नहीं पड़ सकता है, इतना ज्ञान तो चाहिए । फिर चूंकि उसने भिन्न जाना, अहित जाना, विनाशीक समझा सो समस्त परपदार्थों से ऐसी उपेक्षा कर ले, ऐसा अपना चित्त बनाये, ऐसी अपनी समझ बनाये कि दिल में कोई भी परपदार्थ बस न सके, कोई भी पदार्थ ख्याल में न आये, बस कह दे कि तुम मेरे ख्याल में मत आवो, तुम हम से अत्यंत भिन्न हो, विनाशीक हो, तुम्हारा ख्याल करने से मेरे को कुछ भी लाभ नहीं हे, यह तो एक मोटी सी बात है, इसके लिए कोई पैनी बुद्धि की जरूरत नहीं है । समझ लिया, पर एक ऐसा विशुद्ध आग्रह होना जरूरी है कि मैं किसी को भी अपने चित्त में न बसाऊँगा ।यों समस्त पर को चित्त से हटाकर और एक निर्भारसा बन जाय, कुछ नहीं सोचना है, ऐसी स्थिति बन जाय तो स्वयं आत्मदर्शन हो जायगा और उस दर्शन से फिर इसका मार्ग सब स्पष्ट हो जायगा । प्रयोग की आवश्यकता है । मोह बिल्कुल न तजा जाय तो कैसे यह आशा की जा सकती कि यह कल्याणपथ पा सकेगा?

पुराण पुरुषों की चर्या से शिक्षा―श्री रामचंद्रजी का कितना प्रबल स्नेह था लक्ष्मण से और लक्ष्मण का श्रीराम से । स्नेह की इससे अधिक अच्छी मिसाल अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकती । केवल नारायण और बलभद्र में ही यह मिसाल मिलती है, ऐसा ही घनिष्ट स्नेह श्रीकृष्ण और बलदेव जी में था, मगर श्रीराम का प्रताप इसलिए बड़ा समझिये कि बलभद्र होकर भी श्रीराम की सेवा लक्ष्मण ने की । नारायण की सेवा बलभद्र किया करते हैं, पर राम बलभद्र की सेवा लक्ष्मण नारायण ने की । उनमें परस्पर में कितना महान प्रेम था? राम तो गए वन में, लक्ष्मण से घर रहा न गया, वे भी वन को गए । यद्यपि उनको घर पर बड़ा आराम था, पर जंगल गए राम का साथ निभाने के लिए, और रामचंद्र जी का स्नेह देखिये कि जब लक्ष्मण का वियोग हुआ तो 6 माह तक उनका चित्त विभ्रम रूप रहा, लक्ष्मण की देह को नहीं छोड़ा । कितना महान स्नेह था उनका परस्पर में, पर आज इस भूलोक में हमें वे कहाँ दिख रहे? श्रीराम भगवान हुए, मोक्ष पधारे, लक्ष्मण भी थोड़े ही समय में मोक्ष जायेंगे, तो कहाँ रहा वह संयोग? बड़ों-बड़ों की जब ये स्थितियाँ रहीं तो इस थोड़े से वैभव को पाकर, साधारण जनों को पाकर मोह में इतरा रहे हैं, यह कौनसी बुद्धिमानी है? विवेक करिये―उन बड़ों ने क्या किया? बड़ा वैभव पहिले जोड़ा, खूब आराम के साधन बनाये, बड़ी व्यवस्थायें बनायी, बड़ा प्रताप फैलाया, और जिंदगी व्यतीत हुई । अंत में क्य। हुआ? कोई कभी बिछुड़ा, कोई कहीं बिछुड़ा, कोई दीक्षित हो गया और फिर मैदान साफ । तो संसार की यह स्थिति है । यथार्थ बात तो विचारिये, और उस भूल-भटक से निकलकर अपने आत्मा के शुद्ध प्रकाश में आयें, शांति इस ही उपाय से प्राप्त होगी, अन्य उपाय से नहीं ।

कल्पना के पुल के टूटने का क्लेश―शेखचिल्ली की एक कथा है कि एक श्मश्रुनवनीत नाम का कोई पुरुष था । देखो करतूत के अनुसार उसका नाम भी श्मश्रु नाम है । श्मश्रु नाम है मूंछ का और नवनीत नाम है मक्खन का । तो श्मश्रुनवनीत का अर्थ हिंदी में हो गया मूंछ―मक्खन । सो एक दिन वह किसी श्रावक के घर छाछ पीने गया । पीने के बाद में उसने ज्यों ही अपनी मूँछों पर हाथ फेरा तो कुछ मक्खन हाथ में लग गया । सोचा कि यह तो बड़ा ही अच्छा रोजगार है । 10-20 घरों में रोज मट्ठा पी आया करेंगे और उसे पोंछकर इकट्ठा कर लिया करेंगे, फिर उसका घी बनाकर बेचेंगे । सो उसी दिन से उसने वही काम शुरू कर दिया । एक दो साल में ही उसने करीब 1 सेर घी जोड़ लिया । एक दिन जाड़े के दिनों में अपनी झोपड़ी में वह हाथ ताप रहा था, घी एक मिट्टी के डबले में था, जो कि उसी झोपड़ी में ऊपर लटक रहा था । कुछ उसे निद्रासी आई सो लेट बया । लेटे हुए में उसने विचार किया कि मैं कल बाजार में इस घी को बेच दूंगा । जो भी रुपये मिलेंगे उनका खोम्चा लगाऊँगा, जब 10-20 रु0 हो जायेंगे तो एक बकरी खरीदूंगा, फिर उसके बच्चे होंगे, बच्चों को बेचकर व दूध आदिक को बेचकर जब 50-60 रु0 हो जायेंगे तो एक गाय खरीदूंगा, फिर उससे बैल व भैंस आदि खरीदूंगा, फिर कुछ जमीन खरीदूंगा, फिर शादी भी कर लूंगा । बच्चे होगे । कोई बच्चा बुलाने आयगा कि चलो दद्दा खाना खाने-माँजी ने बुलाया है तो मना कर दूंगा । फिर सोचने लगा कि लड़का फिर बुलाने आया है―कहता है दद्दा खाने चलो, मांजी ने बुलाया है । तो वह कहता है―अभी हम नहीं जाते । जब कई बार उस लड़के ने कहा तो गुस्से में आकर पैर फटकारकर उस लड़के से कहा―अबे कह दिया कि अभी हम नहीं जाते । लो उसका पैर लग गया उस घी के डबले में । बहु घी का डबला आग पर गिर गया, आग खूब जल उठी, झोपड़ी भी जलने लगी, तो वह झट बाहर निकलकर चिल्लाता है―अरे मेरी स्त्री मर गयी, मेरे बच्चे मर गए, मेरा घर जल गया, मेरे जानवर जल गए, मेरी सारी संपदा नष्ट हो गई । लोग जुड़े । सोचने लगे कि यह कल तक तो भीख मांगता था और आज यह इस तरह से कह रहा है । देखें तो सही कि आखिर मामला क्या है? सो एक सेठजी ने उससे पूछा तो उसने सारा हाल बताया । तो सेठ जी कहते हैं―अरे तू क्यों रोता है, तेरे पास कुछ था तो नहीं, केवल कल्पना ही तो कर लिया था । वह तो एक शेखचिल्लीपने की बात थी, तेरा कुछ जला तो नहीं, तेरा कुछ नष्ट तो नहीं हुआ? तू क्यों रोता है? तो कोई एक समझदार पुरुष थे । उसने सेठ जी से कहा―अरे सेठ जी तुम्हारी भी तो यही हालत है । तुम्हारा यहाँ है कुछ नहीं, केवल कल्पना से मान रखा है कि यह मेरी स्त्री है, ये मेरे पुत्र हैं, यह मेरा वैभव है । तुम क्यों इनके पीछे दुःखी होते हो? ये तो तुम्हारे कुछ भी नहीं हैं, तुम से अत्यंत भिन्न हैं, तुम भी व्यर्थ में इनके पीछे दुःखी होते । तो इस दुनिया में इन तृष्णावों को करके कुछ भी तत्व न पाया जा सकेगा । जो भी हो, पर यह यथार्थ भान होना चाहिए कि परवस्तु के ममत्व से मेरा हित नही हो सकता ।

जिस क्लेश से दुःखी होना उसी क्लेश में रमना―खेद की बात तो यह है कि धक्के खाते जाते हैं फिर भी उन्हीं में मोह करते जाते हैं । जैसे किसी बूढ़े के 5-6 पोता पोती थे, वे उस बूढ़े को बहुत हैरान करते थे । कोई पोता सिर पर चढ़े, कोई मूंछ पटाये । वह बड़ा हैरान हो रहा था । एक संन्यासी जी वहाँ से निकले, पूछा―बाबा जी ! तुम क्यों रोते हो? तो वह बूढ़ा बोला―संन्यासी जी, हमारे ये 5-6 पोता पोती हैं, ये हम को बहुत हैरान करते हैं । तो संन्यासी बोला―तुम दुःखी मत हो, हम तुम्हारा यह दुःख मेट देंगे । इस बात को सुनकर वह बूढ़ा बड़ा खुश हुआ । सोचा कि संन्यासी जी कोई ऐसा जादू डाल देंगे कि ये बच्चे फिर तो हमारे सामने हाथ जोड़े ही खड़े रहेंगे । सो कहा अच्छा संन्यासी जी हमारा यह दुःख मेट दो । तो संन्यासी जी कहते हैं―अच्छा तुम हमारे साथ चलो, हमारे ही पास रहना, फिर ये सारे दुःख मिट जायेंगे । तो वह बूढ़ा कहता है―अरे ये पोते आखिर हमारे पोते ही रहेंगे और हम इनके बाबा ही कहलायेंगे, तुम बीच में कौन तीसरे बहकाने आये? तो जिन बातों से धोखा ही मिलता है, कष्ट ही मिलता है उन ही बातों में ये मोही प्राणी पड़ते हैं । अब इसका कौन इलाज करे? परवस्तुविषयक मोह में किसने शांति पायी? एक भी दृष्टांत ऐसा बता दो जिसमें मोह कर के यह प्राणी सुखी रहा हो? तो विवेक से ही पूरा पड़ सकेगा और विवेक खो करके तो कुछ पूरा नहीं पड़ता । तो यों भेदविज्ञान करें, संसार से विरक्त हों, रत्नत्रय की आराधना करें, तपश्चरण करें और उत्तम ध्यान को स्वीकार कर के आत्मस्थ हों । यही एक उपाय है कि सर्व कर्मों का क्षय कर के अविनाशी पद प्राप्त किया जा सकता है ।

(शुक्लध्यान वर्णन प्रकरण 42)


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