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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2118

From जैनकोष



रागाद्युग्ररुजाकलापकलितं संदेहलोलायितं,

विक्षिप्तसकलेंद्रियार्थगहने कृत्वा मनो निश्चलम् ।

संसारव्यसनप्रबंधविलयं मुक्तेर्विनोदास्पदं,

धर्मध्यानमिदं विदंतु निपुणा अत्यक्षसौख्यार्थिन: ।।2118।।

अतींद्रिय आनंद के अभिलाषी योगियों का मन की निश्चलता का उद्यम―जो अतींद्रिय सुख के अभिलाषी हैं, केवल आत्मा के स्वरूप के ध्यान के प्रसाद से जो निराकुलता का अनुभवन होता है उस आनंद के जो अभिलाषी हैं ऐसे मुनिजन मन को निश्चल करते हैं । मन की निश्चलता में वैराग्य का प्रबल सहयोग है । रागादिक होने के कारण मन निश्चल नहीं रह पाता, तब वे योगी प्रथम ही रागादिक तत्त्व रोगों का अभाव करते हैं । मन की चंचलता रागादिक भावों के कारण ही है । अनेक संदेशों से यह मन चलायमान रहता है । कोई आदमी बीमार है तो उसके प्रति यह ख्याल रखते हैं कि कहीं यह मर न जाय । यद्यपि उस स्थिति में दोनों बातें संभव है-मर भी सकता और अच्छा भी हो सकता, किंतु रागभाव ज्यादा है तो इस ओर अधिक ध्यान रहता कि कहीं यह मर न जाय । ऐसे अनेक संदेह वहाँ ही होते हैं जहाँ रागादिक भाव विराजते हैं । जब तक यथार्थ निर्णय न हो तब तक यह चित्त स्थिर नहीं रहता है । विषयरूपी गहन वन में यह मन यत्र तत्र खूब भटकता फिरता है ।तो सर्वप्रथम अतींद्रिय आनंद के अभिलाषी साधु संतजन मन को निश्चल करते हैं । संसार के कष्ट अनेक व्यसन आदिक आयें तो भी निश्चल मन वाले उनसे विचलित नहीं होते । निश्चल मन में जो ध्यान होता है उसे आदर्श धर्मध्यान कहते हैं । जब तक साधक रागसहित है तब तक धर्मध्यान चलता है और जहाँ राग अत्यंत मंद हो जाते हैं अथवा रागादिक नहीं रहते हैं वहाँ शुक्लध्यान चलता है ।

शुक्लध्यान में प्रवेश होने से पूर्व धर्मध्यान की प्रेरणा―शुक्लध्यान का प्रकरण शुरू होने को है उससे पहिले धर्मध्यान की प्रेरणा दी है आचार्य ने कि इस धर्मध्यान को अनुभव करो ।आत्मा का एक धर्म ही शरण है, यह आत्मा बाहर में करता कुछ नहीं है । किससे स्नेह करना, किससे विरोध करना, किसका संग्रह करना, ये सब विपरीत बातें जो देखी जा रही हैं वे आत्मा के द्वारा नहीं की जा रही हैं । यह आत्मा तो अपने में मात्र भाव बनाता है । वह भाव या तो पुण्यरूप होगा या पापरूप होगा या विशुद्ध धर्मरूप होगा । भावो के अतिरिक्त आत्मा कुछ करने में समर्थ नहीं है । जब भाव ही कर पाता है । यह जीव तो अपने विशुद्ध भाव बना ले तो इसका उद्धार हो जायगा ।धर्म के बिना इस संसार में नाना जन्ममरण और कष्ट भोगने पड़ते हैं । एक रानी ने अपने (पति) राजा को समझाया कि तुम रोज धर्म किया करो । तो राजा कहे वाह―हम धर्म क्यों करें, हमारे पास किस चीज की कमी है, धर्म तो गरीब लोग करें । तो मरण तो सबका होता ही है । राजा मरण कर के बादशाह के यहाँ ऊँट बना और रानी मरकर बादशाह की लड़की बनी । लड़की का जब विवाह हुआ तो उस बादशाह ने उस ऊँट को भी दहेज में दे दिया । अब जब बरात जाने लगी तो बरात वाले सोचते हैं कि यह ऊँट क्यों खाली जाय, इस पर कुछ लाद दिया जाय । सो उस दुल्हिन के कपड़े उसके ऊपर लाद दिये । रास्ते में ऊँट को हो गया जातिस्मरण । सोचा―अहो ! ये तो मेरी स्त्री के ही कपड़े मेरे ऊपर लदे हैं । पूर्वभव की वह उसकी स्त्री ही तो थी । अब वह चले नहीं तो उसका चलाने वाला उसे खूब पीटे । उसी समय हो गया उस दुल्हिन को भी जातिस्मरण । सोचा―ओह ! यह ऊँट तो मेरा पूर्वभव का पति है । सो उसके न चलने का कारण उसने समझ लिया । सो उस ऊँट खेदने वाले से कहा―भाई तुम लोग इसे मारो मत, हम इसे समझा लेंगे । सो उसने अकेले में उसे समझाया कि देखो मैं कहती थी कि तुम रोज धर्म किया करो, नहीं तो मरकर कुगति में जावोगे । तुमने धर्म नहीं किया उसका फल है कि तुम को ऊँट बनना पड़ा है । अब तो अच्छा यही है कि तुम चले चलो, नहीं तो डंडे पड़ेंगे ही । तो जितने भी जीव यहाँ नजर आ रहे हैं कीड़ा मकोड़ा पशु पक्षी आदिक यह सब धर्म न करने का फल है । इन बैल, भैंसा, घोड़ा घोड़ी आदिक की हालत देखो―गर्दन सूझ गई है, खून भी बह रहा है फिर भी बहुत सा बोझा लादे चले जा रहे हैं, डंडे भी पड़ते जा रहे हैं । ये सब हालतें जो हो रही हैं वे धर्मध्यान न करने का फल है ।

मनुष्यभव पाकर जिम्मेदारी का निभाव―आज मनुष्यभव पाया है तो अपनी बड़ी जिम्मेदारी समझिये । सर्व गतियों में, सर्व पर्यायों में मनुष्य का जन्म हो सकता है । अब भी न चेते तो चार दिनों का जो स्वप्न है, मोह में कल्पना आ गई यह तो मिटेगा, किंतु अधर्म पाप परंपरा से यह आगामी भविष्य में भी बहुत समय तक क्लेश पायगा । एक धर्म ही शरण है ।किसी से मित्रता करें तो ऐसी करें कि हम से उसे भी धर्म की प्रेरणा मिले और उससे हमें भी धर्म की प्रेरणा मिले । घर गृहस्थी में, स्त्री पुत्रादिक में भी ऐसा ही व्यवहार रखें कि हमारे द्वारा इन सबको धर्म की प्रेरणा मिले और इनके द्वारा हमें धर्म की प्रेरणा मिले । धर्म से दूर रहकर जो परिणाम बनेगा वह दु:ख का ही कारण होगा । मन को निश्चल करके ही धर्मध्यान होता है और इस मन की निश्चलता में सांसारिक व्यवहार की प्रवृति नहीं जगती । ऐसा मन को स्थिर बनाकर किसे देखें―अपने आप में जो अपने आपका सहज स्वरूप है उस स्वरूप दर्शन के उत्सुक बने । ऐसी भावना भायें कि मैं मात्र ज्ञानस्वरूप हूँ, जो जानन है, जो ज्ञानस्वरूप है, जो ज्ञानपुंज है एतावन्मात्र मैं हूँ । इस प्रकार ज्ञानस्वरूप की भावना करने से यह उपयोग एक ज्ञानोपयोग बनेगा, निराकुल होगा और विशुद्ध आनंद का अनुभव होगा । इससे जो मुनिजन इस अतींद्रिय आनंद के अभिलाषी हैं । उन्हें सर्वप्रथम आवश्यक है कि अपने मन को निश्चल करें और धर्मध्यान में कुशल होवे ।


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