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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 2119

From जैनकोष



आत्मार्थं श्रयमुंच मोहगहनं मित्रं विवेकं कुरु,

वैराग्यं भज भावयस्व नियतं भेदं शरीरात्मनो: ।

धर्म्मध्यानसुधासमुद्रकुहरे कृत्वावगाहं परं,

पश्यानंतसुखस्वभावकलितं मुक्तेर्मुखांभोरुहं ।।2119।।

आत्मप्रयोजन के आश्रयण का अनुरोध―हे आत्मन् ! तू आत्मा के प्रयोजन का आश्रय कर । दुनिया स्वार्थी है । अच्छी बात है, स्वार्थी सबको होना ही चाहिए किंतु वास्तविक स्वार्थी होना चाहिए अर्थात् स्व मायने आत्मा उसके अर्थी मायने अभिलाषी । आत्मा का जो स्वरूप है उस स्वरूप के दर्शन का अभिलाषी आत्मस्वभाव में रमण करने का इच्छुक वास्तव में स्वार्थी है । हे आत्मन् ! तू अपने आत्मा के प्रयोजन का आश्रय कर । अन्य के आश्रय को छोड़ दे, इस मोहरूपी बन को छोड़ दे । इससे निकल, भेदविज्ञान को अपना मित्र बना । बाहर में किसको मित्र बनाते हो, कौन पुरुष ऐसा निष्कृष्ट अथवा आपका कल्याण कर सकने वाला मिलेगा? वस्तुस्वरूप ही ऐसा नहीं कि कोई किसी का साथ निभाये । लोग स्नेह में कहते हैं अपने मित्र से कि देखो मित्र हमारे तुम्हारे शरीर तो दो हैं पर आत्मा एक है । यह बात कभी हो सकती है क्या? और यह बात हो सकती है कि शरीर तो एक हो और आत्मा अनेक हों । एक निगोद शरीर में अनंतानंत जीव होते हैं, मगर दो शरीरों में एक जीव रह सके ऐसा कहीं संभव है क्या? उसका अर्थ यह लगाना चाहिए कि हमारा किसी से संबंध नहीं । एक बार चिरौंजाबाईजी को किसी रिश्तेदार ने निमंत्रण दिया और कह दिया कि देखो तुम्हें जरूर आना पड़ेगा, तो चिरौंजाबाईजी बोलीं हाँ हम जरूर आयेंगी, सिर के बल आयेंगी । जब उस समय वह न पहुंच सकी तो वह रिश्तेदार उलाहना देने आया, कहा कि तुमने तो कहा था कि हम जरूर आयेंगी, सिर के बल आयेंगी पर आयी क्यों नहीं? तो उन्होंने कहा कि हाँ कहा तो था, सिर के बल चलने की कोशिश भी की, पर चलते ही नहीं बना । (हँसी) तो जो ज्यादा बढ़ बढ़कर बातें होती हैं उनमें समझो कि वहाँ वास्तविक स्नेह का लगाव नहीं है । न वहाँ कोई विशुद्ध संबंध है । वह स्नेह एक मोह की सीमा का उल्लंघन कर के है । तो हे आत्मन् ! देख भेदविज्ञान कर और विवेक को अपना मित्र बना । वैराग्य की सेवा कर ।अराग ज्ञानमात्र स्वरूप के निरीक्षण का अनुरोध―आत्मन् ! अपने आपको ऐसी स्थिति में निरख, इस स्वरूप में देख कि यहाँ तो केवल एक ज्ञानकला है, राग नहीं है, राग आता है तो किसी परउपाधि का निमित्त पाकर आता है । यह मेरा स्वरूप नहीं । अपने को रागरहित स्वरूप में अनुभव कर तो तेरा राग से छुटकारा हो जायगा । जो अपने को ऐसा ही मानता हैकि जैसा कि राग कर रहा है-मैं तो यही हूँ, मैं तो लटोरा घसीटा हूँ तो ऐसा ही घसीटना पड़ेगा । अपने को रागरहित स्वरूप में तो तको और जो राग लगे हैं वे सब राग इस जीव के लिए आपत्तियाँ हैं, ऐसा निर्णय रखकर वैराग्य की सेवा करो । और शरीर तथा आत्मा में भेद की भावना रखो । यह शरीर रूप, रस, गंध, स्पर्शमय है, जड़ है, आत्मा चैतन्यस्वरूप है, इस उपाय से धर्मध्यान के शीतल समुद्र में अवगाहन कर और व्यथावों को दूर कर । जब कोई संताप होता है, गर्मी की बाधा होती है तो लोग करते क्या हैं कि शीतल जल से स्नान करते हैं । तो यह राग आग इस जीव को जला रही है । तो राग आग के संताप से बचने का उपाय क्या है? ज्ञानध्यान रूपी शीतल जलनिधि में प्रवेश करना, यह है राग आग को शांत करने का उपाय । सीधीसी बात झट ख्याल कर लें―मैं तो केवल ज्ञानप्रकाशमात्र हूँ, रागद्वेष मोह विरोध ये कुछ भी ऐब मेरे स्वरूप में नहीं हैं ।

जीव पर महती विपदा―अहो, कितनी बड़ी विपत्ति है इस जीवलोक पर? कुछ संबंध नहीं, कोई बाह्यपदार्थ अपने नहीं । जैसे किसी चौहट्टे पर यहाँ वहाँ से आये हुए मुसाफिर एक जगह दो सेकेंड को मिल जाते हैं और अपना-अपना रास्ता नाप कर चले जाते हैं, ऐसे ही इस घर में हो क्या रहा है कि चौहट्टों से चारों गतियों से मुसाफिरी करते हुए जीव आये, थोड़े समय को ठहरे, फिर बिदा हो गए, कुछ भी संबंध नहीं किंतु यह मोही प्राणी अपनी सुध बुध भूलकर इन समागमों को ही सर्वस्व समझता है और इस ही पर यह इतराता है, घमंड करता है, और इस समागम में कोई बाधा करे तो यह खेद मानता है । यह ही मात्र एक आपदा है और आपदा ही कुछ नहीं । कुछ भी स्थितियाँ बनें, धन कम हो जाय, किसी इष्ट का वियोग हो जाय, बाह्य में सब कुछ हो गया, वह कोई विपदा नहीं है, पर मोहभाव चल रहा है भीतर गहन अंधकार अज्ञान का चल रहा है विपदा तो वह है ।

भ्रम की महती विपदा―एक बार 10 जुलाहे एक नगर में कपड़ा बेचने गए, रास्ते में एक नदी पड़ी । जब कपड़ा बेचकर वापिस आये, नदी पार कर ली तो एक जुलाहा बोला कि अपन गिन तो ले, 10 जने थे सो 10 के 10 है या नहीं । जो वे गिने तो सामने जो दिखे उन्हीं को गिन लें और अपने को गिनना छोड़ दें । उन सभी जुलाहों ने 9 मित्र गिने । अब एक मित्र कम पड़ा तो वे सभी दुःखी होकर रोने लगे । वे आपस में यही कहे कि गये तो थे अपन 10 मित्र दो रुपये के लाभ के लिए, पर एक मित्र खो आये । पता नहीं नदी में बह गया या क्या हो गया? उनमें परस्पर में बड़ा अनुराग था । इतना उन सभी को दुःख हुआ कि वे अपना-अपना सिर फोड़ने लगे । वहाँ से निकला एक घुड़सवार, उसने उन सबके रोने का कारण पूछा तो उन सभी ने सारा वृत्तांत बताया । घुड़सवार ने एक निगाह में ही देख लिया कि हैं तो ये 10 के 10, और कहते हैं कि 9 हैं । समझ लिया कि ये सभी महामूर्ख हैं । तो उसने कहा―अच्छा भाई कहो तो हम तुम्हारा वह 10वां मित्र बता दें, तो उन्होंने कहा हम तुम्हारा बड़ा आभार मानेंगे । सो उसने क्या किया कि उन दसों को एक लाइन में खड़ा किया, हाथ में एक बेंत लिया, और एक तरफ से गिनता जाय-1, 2, 3, 4,5, 6, 7, 8, 9 और 10वें के जरा जोर से मारकर कहे―तू है 10वां । इसी तरह से सभी को बता दिया कि तू है 10वां । वे सब बड़े खुश हुए अपने 10वें मित्र को पाकर । वे खुश तो हो गए, उनका दुःख तो मिट गया, जो भूल पड़ी थी अंदर में वह तो दूर हो गई किंतु उस भूल के काल में जो ढेलों से अपना सिर फोड़ लिया था वह दर्द तो अभी नहीं दूर हुआ । हाँ वह दर्द तो नहीं दूर हुआ, पर उस भीतर में पड़ी हुई भूल का जो दर्द था उसके मुकाबले तो यह न कुछसा दर्द है । तो इसी तरह समझिये कि इष्ट का वियोग हुआ, अनिष्ट का संयोग हुआ, शरीर में वेदना हुई, धन कम हो जाय, और-और भी उपद्रव उपसर्ग आ जायें इतने पर भी ये कोई दुःख नहीं हैं और अंतरंग में जो भूल का दुःख है, यह सब कुछ मेरा है यह भूल का दर्द बहुत कठिन है ।

व्यामोह का परिणाम―गुरुजी एक घटना सुनाते थे कि बंबई में कोई गणित का प्रोफेसर था, लखपति घराने का था, उसे अपनी स्त्री से बड़ा मोह था । जब स्त्री कहीं घूमने जाये तो वह प्रोफेसर साहब उस स्त्री पर छाता लगाकर जावे, इसलिए कि कहीं इसके धूप न लग जाय । तो वह स्त्री एक दिन कहती है कि तुम को हम से इतना अधिक मोह न रखना चाहिए, नहीं तो तुम को बड़ा कष्ट भोगना पड़ेगा, पागल हो जावोगे । आखिर हुआ भी ऐसा ही । वह स्त्री तो गुजर गयी और वह प्रोफेसर पागल-सा ही हो गया । एक बार वह प्रोफेसर बनारस में एक धर्मशाला में ठहरा था, पास ही के एक कमरे में चिरौंजाबाईजी ठहरी थीं । तो चिरौंजाबाईजी को ये शब्द सुनने में आये-देखो बाई जी ने तो रोटी बना ली, पंडित जी को खिला भी दिया, 10 बज गये, अभी तक तुमने रोटी नहीं बनाई? तो बाईजी उससे बोली कि तुम किससे वे सारी बातें कह रहे थे? यहाँ तो कोई नहीं है । तुम्हीं अकेले हो । तो उसने अपनी सारी कथा सुनाई कि हम को अपनी स्त्री में बड़ा मोह था, उसके मर जाने पर इस फोटो को देखकर मुझे उसकी याद आ जाती है । और मुझे क्लेश होता है । तो बाई जी बोली कि तुम्हें क्या यह पता नहीं कि यह कागज है, फोटो है, यह रोटी नहीं बना सकता? तो वह प्रोफेसर बोला―हाँ हम जानते हैं इस बात को, पर उसके मर जाने से मेरे हृदय में एक बहुत बड़ा धक्का पहुंचा है, उसका वियोग हो जाने से हमारा मन काबू में नहीं है । तो यहाँ रहना कुछ नहीं है लेकिन उस मोह के काल में जो मन गड़बड़ कर लिया जाता है उसका दुःख उनको ही भोगना पड़ता है । इस कारण जितना सचेत बन सकते हों, बनें ।

बाह्य अर्थ में शरणत्व का अनवकाश―खूब निरख लीजिये कि जितने भी समागम हैं उन सबका नियम से वियोग होगा । ऐसी बात जान लेने से कितना फायदा है? एक तो उससमय भी यह अंधेरे में न रहेगा, मोह में व्याकुल न रहेगा और जब वियोग होगा तब इसको अधिक आकुलता न होगी, क्योंकि वह समझेगा कि यह बात तो मैं वर्षों से जानता था कि जो समागम मिला है उसका वियोग अवश्य होगा । तब इन समागमों में राग करने से लाभ कुछ नहीं है । वैराग्य की सेवा करें और सबसे निराला जो अपना ज्ञानस्वरूप है उसकी भावना करें । निज कारणपरमात्मतत्त्व की उपासना से ही हम आपका कल्याण हो सकता है । जगत में और कोई दूसरा नहीं है ऐसा कि जिसका आश्रय कर लेने से कल्याण हो सकेगा बाकी तो सब स्थल लात मारने वाले हैं । जैसे फुटबाल जिस बालक के पास पहुंचता है वह बालक उसे हृदय से नहीं लगाता बल्कि लात मारकर उसे वहाँ से भगा देता है, फिर वह फुट-बाल जहाँ जाता है वहाँ भी यही हाल होता है, इसी तरह यह जीव जहाँ जायगा, जिन जिनकी शरण में पहुंचेगा वहीं से धक्के खायगा, किसी के वश की बात नहीं है । कैसा भी किसी से प्रेम हो, धक्का न देना चाहे, लेकिन कोई न कोई बात ऐसी बन ही जाती है कि वहाँ धक्का ही लग जाता है । प्रत्येक जीव अपने-अपने ही स्वरूप में परिपूर्ण हैं, उनकी परिणति न्यारी है, कैसे वे शरण बन सकते हैं? तो बाह्य पदार्थों में शरणत्व की बुद्धि छोड्कर एक अपने आत्मा का आश्रय लें ।

मिथ्यात्रितप का क्लेश और उससे बचने को त्रियत्न का अनुरोध―भैया ! जैसा ही दुःख राग से होता है वैसा ही दुःख द्वेष से होता है और मोह से भी दुःख है । ये तीनों ही संसार के कारण हैं । एक ब्राह्मणी थी, उसके थे तीन लड़के । एक छोटा, एक मझला और एक बड़ा, यों समझ लो । एक बनियाने सोचा कि हमें एक ब्राह्मण जिमाना है तो चले जायें कल के दिन को उस बुढ़िया ब्राह्मणी के घर, सबसे छोटे बच्चे को निमंत्रण दे दें । पहुंचा वह बनिया उस बुढ़िया के पास और बोला कि बुढ़िया मां कल के दिन को तुम्हारे छोटे बच्चे को हमारे यहाँ भोजन करने का निमंत्रण है, तो बुढ़िया कहती है कि हमारे तीन लड़के हैं, तुम चाहे छोटे को निमंत्रण दो, चाहे बड़े का, चाहे मंझले को । हमारे तो तीनों ही लड़के तिसेरिया है अर्थात् तीन सेर खाने वाले हैं तो ऐसे ही भव-भव में भटकाने वाले ये मिथ्या-दर्शन-ज्ञान-चारित्र का तिगड्ड अथवा मोह रागद्वेष की त्रिपुटी ये सभी हमारी बरबादी के कारण हैं-हम उनमें क्या छांटे कि कौन कम है कौन ज्यादा है? कभी ऐसा हो कि मोह कम रहा और रागद्वेष जिंदा है तो वे बढ़कर फिर कभी बड़े पतन की स्थिति बना सकते हैं । बुद्धिमान पुरुष ऐसा सावधान रहते हैं कि के किसी में रंच भी रागद्वेष नहीं करते, और जैसे धुनिया रुई को जर्रे-जर्रे करके धुन देता है इसी तरह वे बुद्धिमान जन इन रागद्वेषों को धुन डालते हैं । रंचमात्र भी राग कभी बहुत बड़ी महान विपदा का कारण बन जाता है । तो भेदविज्ञान करें, वैराग्य की सेवा करें और आत्मस्वरूप की भावना बनाये । यह इस एक धर्मध्यान का पूर्णरूप होगा । इस प्रकार धर्मध्यान में अनुरोध कर के अब आचार्यदेव शुक्लध्यान का वर्णन करेंगे ।


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