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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 212

From जैनकोष



महातिशयसंपूर्ण कल्याणोद्दाममंदिरम्।

धर्मो ददातिनिर्विध्नं श्रीमत्सर्वज्ञवैभवम्।।212।।

धर्म का अलौकिक फल―धर्म अंतरंग और बहिरंग लक्ष्मी से संपन्न अरहंत सर्वज्ञ देव के वैभव को भी प्रदान करता है अर्थात् धर्म के प्रसाद से चार घातिया कर्मों का अभाव होता है और परम वीतराग दशा और सर्वज्ञ स्थिति होती है, और इनकी इस वीतरागता और प्रभुता की भक्ति से प्रेरित होकर इंद्र महान समवशरण की रचना करता है और अतुल वैभव की उसमें रचना हुआ करती है। वह वैभव बड़े-बड़े अतिशयों से परिपूर्ण है। जहाँ अरहंत विराजमान हों वहाँ से चारों ओर सौ-सौ योजन तक दुर्भिक्ष तक भी नहीं पड़ता यह कितना अलौकिक अतिशय है? जहाँ प्रभु विराजे हों जो जिन लोक के नायक प्रभु अत्यंत शुद्ध परमात्मा जहाँ विराजमान हों वहाँ के निकट के जब लोग अन्न के अभाव से अथवा अन्न रोग मारी आदिक से दु:खी रहें यह नहीं हो पाता है। प्रभु यह कुछ करते नहीं है किंतु उनके परिणामों का अतिशय ही ऐसा है कि चारों ओर सौ-सौ योजन सुभिक्ष रहता है। प्रभु अरहंत सयोगकेवली अवस्था में हैं और जब वे विहार करते हैं तो उनका आकाश में ही गमन होता है और विहार के समय देवता जो विहार में नियुक्त होते हैं, प्रभु के चरण कमलों के नीचे स्वर्णकमल रचते हैं और एक दो ही नहीं किंतु चारों ओर अनेक स्वर्णकमल रच देते हैं। यह एक सर्व साधारण जनों के लिये अतिशय हो जाता है। इतना बड़ा अतिशय जहाँ हो रहा है वह किसका प्रताप है? धर्म का प्रताप है। जिसके ये सब चमत्कार प्रकट होते हैं।

धर्मों की निर्वांछकता―वह तो इन चमत्कारों को चाहता ही नहीं और जो लोग ऐसी प्रभुता के चमत्कारों को सुनकर उन चमत्कारों में इच्छा रखते हैं उनके ये चमत्कार नहीं होते हैं। तो इसका निष्कर्ष यह निकला कि कुछ चाहो मत। जो चाहेगा उसे नहीं मिलता, जो नहीं चाहता है उसके निकट लक्ष्मी दासी बनकर आती है। पर अब आने से क्या लाभ? जब चाह थी तब वैभव नहीं मिला, अब नहीं चाह है तो वैभव चरणों में आकर गिरता है। तो इसका अर्थ यह हुआ कि संसार पूरा असार है।

अरहंत की गंध कुटी की अतिशयता―जब किसी प्रोग्राम में कोई महापुरुष आता है तो बड़ा मंडप सजाया जाता है। भाषण सुनने के लिए बड़ी तैयारियाँ होती हैं। सब कुछ तैयारियाँ होती हैं। सब कुछ तैयारियाँ होने के बावजूद भी बड़े लाउडस्पीकर लग जायें, सब तरह के प्रबंध हो जायें पर एक कमी हर जगह रहती ही है। सामने सब लोग बैठे हों तो वक्ता का मुँह दिखेगा। पर लोग तो अगल-बगल भी बैठा करते हैं, और बहुत बड़ी सभा हो तो पीछे भी लोग बैठा करते हैं, पर वक्ता का मुख सबको नहीं दिख सकता। यह एक बहुत बड़ी कमी रहती है। बहुत-बहुत ऊँची व्यवस्थायें करने के बाद भी लोग वीतराग सर्वज्ञदेव के समवशरण में गंधकुटी में अथवा दिव्य उपदेश की व्यवस्थाओं में यह कमी नहीं रह पाती। प्रभु का मुख चारों ओर बैठने वालों को दिखता है। यह अतिशय क्या एक सर्व साधारण में पाया जाता है? बड़े-बड़े अतिशयों से संपूर्ण सर्वज्ञ देव के वैभव को यह धर्म ही तो देता है? कोर्इ तीर्थंकर होता हैं उस भव में कोर्इ हाथ पैर से कमायी करके या कोई बड़ा ऊँचा रोजगार ठानकर या कोई ऊँची फैक्टरी लगाकर बड़ा बना हो और समवशरण की रचना बनाया हो यह संभव है क्या? ज्यों-ज्यों वे पर से विरक्त होते गए, अपने आपकी ओर ही झुकाव बढ़ता गया, ये सब अतिशय उनके प्रकट होते गए। कोई महापुरुष जब आता है तो प्रबंधकों को यह खतरा रहता हे कि यह आये हैं भली प्रकार से अपना काम करके भाषण देकर सकुशल चले जायें। कहीं कोई उपद्रव न हो, कोई गुंडा इन्हें गोली से मार न दे। अनेक आशंकाएँ रहती हैं, इसी कारण पुलिस की बड़ी व्यवस्थाएँ रहती हैं। कोई उपद्रव न कर सके। लेकिन सर्वज्ञदेव के निकट उपसर्ग और उपसर्ग की शंका है ही नहीं। कोई कर ही नहीं सकता। यह वैभव भी उन्हें मिला जो अतिशय से परिपूर्ण है। कैसा है सर्वज्ञदेव का वैभव? कुछ अधिक 8 वर्ष कम एक कोट पूर्व तक अरहंत अवस्था में सशरीर अवस्था में बने रहे और इतने लंबे समय तक उनके न आहार, न कवलाहार, न भूख, न प्यास, न वेदना, न कोई क्षोभ कुछ भी उपद्रव नहीं होते। यह क्या कम अतिशय का वैभव है? इस वैभव को कौन प्रदान करता है? धर्म ही प्रदान करता है।

धर्म में सुख की कारणता―तो ऐसे-ऐसे महान् अतिशयों से परिपूर्ण सर्वज्ञदेव की विभूति को तीर्थंकर की पदवी को प्रदान करने वाला धर्म ही है। यह धर्म समस्त कल्याण का उत्कृष्ट निवास स्थान है। धर्म नाम है रागद्वेष मोह से रहित शुद्ध जाननहार, परिणमन होना। जिस भव्य आत्मा का ऐसा ज्ञाताद्रष्टा रहने का परिणमन हो जहाँ संकल्प विकल्प तरंगे नाम को भी न हों, ऐसी उत्कृष्ट स्थिति में ऐसा प्रताप है कि आत्मा के समस्त गुण चरम सीमा में विकास को प्राप्त हो जायें। धर्मभावना में धर्म माहात्म्य की भावना की गई है। हमारा शरण केवल हमारा धर्म ही है। यह शरण हुए बिना इस ओर दृढ़तापूर्वक अपना प्रयोग हुए बिना व्यवसाय हुए बिना जगत में कहीं भी भटककर देख लो किसी भी साधन में इसे शांति प्राप्त नहीं हो सकती। जब कभी भी शांति होगी तो अपने आपमें अपने आपकी दृष्टि होने से ही होगी, उपयोग किसी बाहर की ओर जाय किसी परवस्तु को अपने विषय में ले तो उसकी तो प्रकृति ही ऐसी है कि आकुलता को उत्पन्न करता है।

आत्मा की सबसे निरपेक्षता―यह आत्मा स्वयं ज्ञानानंदस्वरूप है। किसी अन्य की कोर्इ अपेक्षा ही नहीं है। बल्कि अन्य की अपेक्षा रखने से इसके आनंद में विघात होता है। प्रयोग करके अनुभव करने की बात है। केवल श्रवण से, केवल कथन से, चर्चा से इसका विशद परिचय नहीं होता। इसका विशद परिचय अनुभव से ही होता है। अपने चित्त को, अपने ज्ञान को इस प्रकार से परिणमाया जाय कि यह विश्राम को प्राप्त हो, इसमें रागद्वेष का झंझट न आ सके तो इस पुरुषार्थ में यह अनुभव होता है कि शांति का धाम यही परिणमन है। धर्म ही शांति का एकमात्र स्थान है। यह तो सर्व कल्याण का मंदिर बना हुआ है। हमारे सर्व संकटों का निवारण होना एक मात्र आत्म धर्म के पालन से संभव है, अन्य कोर्इ उपाय नहीं है। लोग शांति के लिए धन जोड़ते हैं, जोड़ते जायें पर आखिर होगा क्या? छूटेगा एक साथ सब। मिलता क्या है इसमें? जोड़ते गए जोड़ते गए पर अंत में मिला क्या इस आत्मा को? व्यर्थ का ही वह सब श्रम रहा। जीवन भर उसके पीछे अड़े, उसमें फँसे और अंत में मिला कुछ नहीं। किंतु धर्म के लिए लगन हो, यथार्थ ज्ञान रखना, भेदविज्ञान करना, अनात्मतत्त्व को छोड़ना अपने स्वरूप में आना, ऐसा यत्न रहे तो उसके प्रसाद से जो लाभ प्राप्त होगा वह स्वयं समझेगा, स्वयं अनुभवेगा कि हमने यह कुछ तत्त्व पाया है।

धर्म की बाह्याडंबरता से रिक्तता―यह धर्म दिखावट, बनावट, सजावट से अत्यंत दूर है। जिसकी यह भावना अथवा वासना हो कि लोगों को बताऊँ कि में कितना ऊँचा हूँ, कितना धर्मपालन करता हूँ अथवा पर्याय बुद्धि बने। अपने विचार, अपनी तर्कणायें, अपना राग, अपनी कषाय अपने को प्रिय लगें और यही मैं हूँ और उसके ही पोषण का यत्न रखें तो इस दिखावट बनावट और सजावट की परिस्थिति में धर्म नहीं होता। धर्म होता है गुप्त ही गुप्त, अपने आपमें अपने आपका नाता रखकर। अपने स्वरूप में रुचि करे, उसका ही परिज्ञान करे उसमें ही मग्न हो ऐसी ही अपनी गुप्त वृत्ति में धर्म प्रकट होता है। यों कह लीजिए एक शब्द में कि सर्वस्व त्यागने पर अथवा अपने आपको अपने आपमें मग्न होने के लिए समर्पण कर देने पर धर्म की महिमा अनुभव में आती है। यह धर्मभावना अतिशयों से परिपूर्ण कल्याण का एकमात्र स्थान अंतरंग और बहिरंग लक्ष्मी से संपन्न श्रीमान् सर्वज्ञदेव के वैभव को प्रदान करता है। धर्म के करते हुए कुछ छुटपुट विभूति मिल जाय, राज्य मिल जाय, धन वैभव मिल जाय तो वह सब तो न कुछ चीज है। जैसे कोई किसान खेती करता है तो उसका लक्ष्य तो अनाज उत्पन्न करना है, भुस स्वयमेव मिलता है। ऐसे ही धर्म के यत्न में उत्कृष्ट आनंद मिलता है पर अन्य छुटपुट विभूति स्वयमेव प्राप्त होती है।


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