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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 211

From जैनकोष



नरकांधमहाकूपे पततां प्राणिनां स्वयम्।

धर्म एवं स्वसामर्थ्याद्दत्ते हस्तावलंबनं।।211।।

धर्मी की वैपरीत्य में भी धर्म वत्सलत्व―यह आत्मस्वभावरूप धर्म की दृष्टि करने वाला धर्मपालन नरकरूपी महान अंधकूप में गिरते हुए जीवों को मानो हस्तावलंबन देकर बचा देता है। अर्थात् इस धर्म के प्रसाद से यह जीव नरक गति में नहीं जाता है। सम्यक्त्व धर्म है और सम्यक्त्व जिसके उत्पन्न हो जाता है वह कुयोनियों में जन्म नहीं लेता। सम्यग्दर्शन उत्पन्न होने के बाद यह मनुष्य यदि किसी आयु का बंध करे तो वह देव आयु का बंध करेगा या मोक्ष जायेगा। सम्यग्दृष्टि मनुष्य सम्यक्त्व के रहते हुए भी संसार में कुछ रहता है, उसे दूसरा भव धारण करना पड़ता है तो वह देव भी बनेगा या मोक्ष जायेगा। सम्यग्दर्शन के रहते-सहते मनुष्य न तो तिर्यंच आयु का बंध करता है न नरक आयु का बंध करता है और न मनुष्य आयु का बंध करता है। हाँ कोर्इ मनुष्य सम्यग्दर्शन से पहिले नरक आयु, तिर्यंच आयु या मनुष्य आयु का बंध लगा हो उसके बाद सम्यग्दर्शन हो तो वह नरक में, तिर्यंच में और मनुष्य में जीव तो सही पर नरक में जायेगा सम्यग्दर्शन रहते हुए सम्यग्दर्शन से पहिले नरक आयु बाँधने के कारण पहिले नरक में ही जायेगा, इससे नीचे नहीं। तिर्यंच में जायेगा तो भोगभूमिया तिर्यंच बनेगा, कर्मभूमिया तिर्यंच नहीं। मनुष्य में भी जायेगा तो भोगभूमिया मनुष्य बनेगा, कर्मभूमिया मनुष्य नहीं। इसी तरह जो-जो जीव देवगति में है वह देव सम्यग्दृष्टि बन जाये और सम्यग्दर्शन के बाद वह किसी आयु को ही बाँधेगा। अर्थात् सम्यग्दृष्टि जीव मरकर मनुष्य ही बन सकेगा, तिर्यंच में न जाएगा, नरक में न जायेगा। तिर्यंच में सम्यग्दृष्टि हो तो सम्यग्दर्शन के रहते हुए में यदि आयु का बंध करे तो देव आयु का ही बंध करेगा, अन्य आयु का नहीं। इसी प्रकार नारकी जीव सम्यग्दृष्टि हो और सम्यक्त्व के रहते हुए आयु का बंध करे तो मनुष्य आयु का ही बंध करेगा। यह मनुष्यों को समझाया जा रहा है। अतएव यहाँ कहा गया है कि धर्म इस जीव को नरक में जाने से बचाता है।

भेद विज्ञान की महिमा―धर्म प्रथम तो भेदविज्ञान है, जहाँ आत्मा के स्वरूप का सही प्रकाश है। यह में जीव हूँ, स्वरूप से, स्वभाव से सहज ही ज्ञान दर्शन मात्र हूँ और ये देहादिक पदार्थ अचेतन हैं, जड़ हैं, पौद्गलिक हैं, रूप, रस, गंध, स्पर्श हैं, अमूर्तिक हूँ। इनकी हमारी जाति मिलती ही नहीं है। अत्यंत विमुख हैं। पुद्गल, पुद्गल की जाति तो मिल गयी पर मेरी जाति तो पुद्गल से बिल्कुल विलक्षण है उनसे मैं मिलता नहीं। और अन्य जीवों के स्वरूप से तो मिल गया व्यक्तिस्वरूप किसी भी जीव में मिल सकता नहीं। ऐसा में अन्य समस्त जीवों से न्यारा समस्त पुद्गलों से न्यारा केवल ज्ञानदर्शनस्वरूप अविदित अमर एक ज्योतिपुंज हूँ इसका ऐसा स्वभाव है कि अपने स्वभावरूप प्रवर्ते तो इसके आकुलता रह नहीं सकती। तो मेरा स्वरूप ज्ञानानंद है। एक नमस्कार मंत्र बोलते हैं ना―चिदानंदाय नम:। सच्चिदानंदाय नम:। इसमें आत्मा के स्वरूप का ही वर्णन है। यह मैं आत्माचैतन्य और आनंदस्वरूप हूँ।। चैतन्य शब्द कहने से ज्ञान और दर्शन दोनों आ जाते हैं। मैं चैतन्यस्वरूप हूँ और आनंद स्वरूप हूँ। सच्चिदानंद कहने से अनंत चतुष्टय की बात आती है। मैं ज्ञान, आनंद और शक्ति स्वरूप हूँ, मेरे स्वरूप की ही दृष्टि की गई है इस मंत्र में। तो जो पुरुष ऐसे सच्चिदानंद स्वरूप निज पवित्र स्वभाव का ध्यान करता है उसके विषय कषायों में प्रवृत्ति नहीं है और विषयकषायों में प्रवृत्ति न होने से यह जीव नरक आदिक कुगतियों में नहीं पैदा हो सकता है। धर्म का अतुल प्रताप है। हम आप सब जितने भी शुद्ध रह सकते हैं, जितना भी आनंद पा सकते हैं वह सब सबसे न्यारा बनकर केवल एक शुद्ध स्वभाव की ओर झुकने से पा सकते हैं। यही धर्म है अर्थात् आनंद पाने का एक मात्र उपाय धर्म ही है।

धर्म की महत्ता―यही शरण है, यही हमें कुगतियों से हस्तावलंबन देकर बचाता है ऐसी इस धर्म में सामर्थ्य है। यह बारह भावनाओं में उस धर्मभावना का प्रकरण है। इसमें धर्म के जितने गुण गायेंगे, जितना धर्म के प्रताप का चिंतन करेंगे उतनी धर्म में रुचि जगेगी और धर्म में रुचि जगने से उस धर्म में ही हमारा यत्न होगा और धर्म से ही हम सारे संकटों से दूर हो जायेंगे। जिसकी जहाँ रुचि होती है उसकी श्रद्धा भी वहाँ होती है। इसका प्रयत्न भी वहाँ होता है। अज्ञानी जीव के अधर्मभाव में रुचि है। वह विषय भावों को, कषाय भावों को, विकारों को चाहता है तो उसी में उसकी श्रद्धा है। राग करने से ही आनंद मिलता है। द्वेष मोह करने से ही सुख मिलता है। ऐसी ही श्रद्धा अज्ञानी के बनती है, तो जब श्रद्धा भी अधर्म की है और ज्ञान भी अधर्म का ही पकड़ता हे तो वह यत्न किसका करेगा? वह तो अधर्म का ही यत्न करेगा, किंतु ज्ञानी जीव को अपने बारे में धर्ममय स्वरूप की श्रद्धा है, मैं केवल ज्यार्तिमय हूँ। ज्ञानानंदस्वरूप हूँ। इस मुझ आत्मा का दुनिया में कुछ भी नहीं है। समस्त परपदार्थों से मैं विविक्त हूँ। ऐसा अपने आपमें अपने सहज स्वरूप का प्रत्यय है ज्ञानी को तब ज्ञानी की रुचि भी तो धर्म में हुई इसकी श्रद्धा भी निज धर्म में हुई तो यत्न भी निज धर्म में होता है। अपने आपके शुद्ध स्वरूप का विश्वास हो। शुद्ध स्वरूप का ज्ञान हो, और उस शुद्ध स्वरूप का ही आचरण हो, यही रत्नत्रय है, यही धर्म है। यही अपने आपकी सच्ची दया है। जिसके प्रताप से आत्मा संसार के समस्त संकटों से छूट जाये और उत्कृष्ट अतींद्रिय आनंद का अनुभव करे ऐसा कार्य करने से बढ़कर और क्या दया का काम हो सकता है? इसलिए दया ही धर्म है यो कहो, 10 लक्षण धर्म है यों कहो, रत्नत्रय धर्म है यों कहो। सबका भाव यही हे कि यह आत्मा अपने स्वरूप का श्रद्धान करे, अपना ज्ञान करे और अपने आचरण में ही रंग जाये, बस यही धर्म का पालन है। जो पुरुष इस धर्म का आश्रय लेता है वह पुरुष नरक जैसे महान अंधकूप में नहीं गिरता हे, नरक में नहीं गिरता। इससे यह भी उपलक्षण अर्थ लेना कि अन्य भी कुयोनियों में वह पतित नहीं होता है और सीधी सी बात यह है कि जिसके पास धर्म है वह देव होगा, मनुष्य होगा। मोक्ष जाने से पहिले इन ही अच्छी गतियों में उसका जन्म होगा और बहुत ही शीघ्र इन जन्मों से निवृत्त होकर मुक्ति के आनंद को प्राप्त करेगा। अपने कर्मों से विकारों से और शरीर से सदा के लिए छूटकर यह अपने आपके स्वरूप में बसे हुए अतींद्रिय आनंद का भोग करेगा। तो दुर्गतियों से निकलकर उत्कृष्ट पद में पहुँच जाना यह सब धर्म का ही प्रसाद है। धर्म के प्रसाद से हम सब संकटों से दूर होते हैं और समस्त संपन्नताओं को प्राप्त करते हैं।


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