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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 225

From जैनकोष



अनादिनिधन: सोऽयं स्वयंसिद्धोऽप्यनश्वर:।

अनीश्वरोऽपि जीवादिपदार्थैं: संभृतो भृशम्।।225।।

लोक की स्वयंसिद्धता―यह लोक अनादिनिधन है अर्थात् काल की अपेक्षा न इस लोक का आदि है और न अंत है। अनादि निधन जो भी होगा वह स्वयं सिद्ध हुआ करता है। समस्त पदार्थ स्वयं सिद्ध हैं, किसी भी पदार्थ की सत्ता किसी अन्य ने उत्पन्न नहीं की। तो स्वयं सिद्ध पदार्थ का जो समूह है उसी का नाम लोक है। तो जब पदार्थ स्वयं सिद्ध हैं, तो लोक भी स्वयं सिद्ध हुआ और अनादि निधन हुआ। प्रत्येक पदार्थ चूँकि स्वतंत्र है, किसी भी पदार्थ का कोई अन्य पदार्थ ईश्वर नहीं है, पदार्थ में यह स्वरूप ही पडा हुआ है, तो पदार्थों का समूह यह लोक है, इसका भी कोई ईश्वर नहीं है अर्थात् इसका भी कोर्इ अधिकारी अथवा कर्ता नहीं है। समस्त पदार्थ अपने-अपने अधिकारी हैं, अपने-अपने सत्त्व से पूर्ण हैं। अभाव 4 प्रकार के बताये गए हैं―प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यंताभाव। यह अभाव की व्यवस्था भी इस बात को बताती है कि प्रत्येक पदार्थ में अपने ही पर्यायों की अपेक्षा तो उत्पाद व्यय है, अपने में ही अपनी पर्यायों का आगमन निर्गमन है, किंतु किसी भी अन्य पदार्थ का किसी अन्य पदार्थ में आगमन नहीं है।

अभावों का भाव―अभाव 4 प्रकार के बताये गए हैं, ये अभाव सभी सद्भाव रूप हैं। वस्तु की जो पहिली पर्याय है उस पहिली पर्याय में उत्तरपर्याय का अभाव है। इसलिए पहिली पर्याय का ही नाम प्रागभाव है। किसी भी वस्तु की पहिली पर्याय में उत्तर पर्याय का अभाव है प्रध्वंसाभाव का अर्थ है वर्तमान पर्यायों का विनाश होने पर जो अभाव हुआ है, अर्थात् आगामी काल में पूर्व पर्याय का अभाव होना, जैसे घड़ा फूटकर खपरियाँ बन गई तो खपरियों की अवस्था में घट का प्रध्वंसाभाव है। इन दो अभावों से यह उत्पाद और व्यय की सिद्धि जानी जा सकती है। तीसरा अभाव है अन्योन्याभाव, जो द्रव्य द्रव्य का तो नहीं है, अत्यंताभाव तो नहीं है, पर जो कभी बन सकता है किंतु इस समय नहीं है वह अन्योन्याभाव है। जैसे घड़ा और कपड़ा ये दो वस्तुवें हैं किंतु घड़ा कभी कपड़ा बन सकता है, कपड़ा कभी घड़ा बन सकता है। किंतु अत्यंताभाव में तो त्रिकाल अभाव है, जीव में पुद्गल का त्रिकाल अभाव है, पुद्गल में जीव का त्रिकाल अभाव है और इतना ही नहीं, द्रव्य दृष्टि से प्रत्येक जीव में त्रिकाल प्रत्येक जीव का अभाव है। समस्त पुद्गल आदिक का अभाव है, प्रत्येक परमाणु में अन्य समस्त परमाणुओं का अभाव है, समस्त जीवादिक का अभाव है।

अभाव के विज्ञान से प्राप्तव्य शिक्षा―यह अभाव की दृष्टि हमें यह शिक्षा देती है कि किसी भी पदार्थ का कोई अन्य पदार्थ ईश्वर नहीं है। जरा अपने आपके स्वरूप पर भी ध्यान दो, जब हम कभी भी दु:खी होते हैं तो कल्पनाएँ बनाकर दु:खी हुआ करते हैं। दूसरे लोग तो किसी भी दूसरे को देखकर यह समझते हैं सीधे तौर से कि इसे कोई भी क्लेश नहीं है, पर वह अपने ही मन में कल्पनाएँ बना-बनाकर दु:खी होता रहता है दु:खी होने की जरूरत क्या थी किस बात पर दु:खी हुआ जा रहा है। वैभव की बात यह है कि चाहे बहुत हो चाहे थोड़ा हो, छोड़कर सब जाना है। रही यह बात कि लोग सोचते हैं हमारे संतान को तो वैभव मिल जायेगा, तो मरने पर कौन किसका संतान है? यहाँ लोकव्यवहार में भी थोड़ी कल्पना करके मानते हैं अन्यथा बताओ आपके पूर्व भव के माता-पिता, पुत्र कहाँ हैं? अथवा पूर्व भव के वैभव से आपका अब कुछ संबंध रहा क्या? जो जीव पूर्व भव में पुत्र रहा होगा कहो वही जीव आज कहीं शत्रु के रूप में हो, जिसे आज तक पुत्र के रूप में मानते हैं, परभव में या इसी भव में आगामी काल में शत्रुता का रूप वह रख सकता है। कषाय की तो बात है। जब कषाय जग जाये तब ही विरोधी बन जाता है जीव। इस ही भव में बड़े उपकारी की भी आन खो देता है यह जीव। जब कषाय का उदय होता है तो विनय सब खत्म हो जाता है। उसे कितना लाड़-प्यार से पाला, कितना उसे चतुर बनाया, पर उन सारे उपकारों पर वह पानी फेर देता है। किसी भी पदार्थ का कोई अन्य अधिकारी नहीं है।

लोक के विषय में लोगों की कल्पना―पदार्थ का समूह ही यह लोक है तो लोक का भी कोई अधिकारी नहीं है। लोक कुछ अलग चीज नहीं है। जैसे लोग कहा करते हैं, संसार में अनेक मनुष्य हैं तो संसार कुछ अलग हुआ, मनुष्य कुछ अलग हुए। जैसे व्यवहारीजन अपने मन में आशय रखते हैं, लो यह तो है संसार, जो पोल सी दिख रही है यह है मनुष्य। छह द्रव्यों का जहाँ तक निवास है, जो पिंड है उसी का नाम लोक है। तो यह लोक जीवादिक पदार्थों से खूब दृढ़ भरा हुआ है। लोक की रचना के संबंध में अनेक लोग अनेक कल्पनाएँ करते हैं। कोई कहता है कि यह पृथ्वी नारंगी के समान गोल है चारों ओर से और पृथ्वी घूमती है, सूर्य स्थिर रहता है और उसमें भी अनेक प्रकरण ऐसे ढूंढ निकाले गए हैं कि कुछ हिस्सा पृथ्वी के ऊपर बसा है, कोई देश पृथ्वी के नीचे बसे हैं, एक जगह दिन जब होता है तो उसी समय दूसरी जगह रात होती है। इन सब बातों से यह विदित होता कि पृथ्वी नारंगी की तरह गोल है और भी कल्पनाएँ लोग करते हैं किंतु जैन सिद्धांत में जो बात प्रतिपादित है वैज्ञानिक जन उनके आधार पर खोज करें तो बड़ी सफलता मिलेगी। अविष्कारक लोगों की थोड़ी इस ओर दृष्टि नहीं है, और जिनकी दृष्टि है, जिन्हें ज्ञात है वे अविष्कार के क्षेत्र में नहीं है और जो अविष्कार के क्षेत्र में हैं उनकी इस ओर दृष्टि नहीं दिलायी जाती। यदि उन्हें इस ओर दृष्टि दिलायी जाय तो वे विदित करेंगे कि यह समस्त पृथ्वी एक ओर थाली के समान समतल है और जंबूद्वीप इस मध्य लोक के बीच में जो गोल-गोल है उसके एक किनारे भरत क्षेत्र है, उसमें 5 खंड हैं, उनमें से जो एक आर्य खंड है उस आर्य खंड में ही आज की सारी दुनिया एक कोने में समायी हुई है।

पृथ्वी के गोल का कारण―यह पृथ्वी गोल है ऐसा उनमें विकल्प क्यों हुआ? उसका कारण यह है कि इस हुंडावसर्पिणी काल में यह पृथ्वी केवल आर्य खंड में मल बन गयी है और यह पृथ्वी करीब 4 हजार कोश ऊँची समतल से उठ गई है तो इतनी ऊँची उठ जाने से गोल बन गयी और यों समझिये कि अर्द्ध गोल सा उठा बना लिया। यह मलमा भी ऐसी विचित्र बना है कि मूल में घेरा थोड़ा लेकर उठा है और बीच में घेरा अधिक हो गया है। अब इतनी पृथ्वी ऊँची उठ जाने से सूर्य का जो उदय होता है वह एक ओर से निकले तो जिस ओर से सूर्य है उस ओर दिन रहा तो दूसरी ओर अँधेरा सा रहा, यों सभी प्रश्नों का समाधान मिलेगा, लेकिन वे वैज्ञानिक लोग इस दृष्टि को लेकर कुछ निरीक्षण करें तो। बात यह है जैसे रेल में बैठे हुए लोगों को जो बड़ी सावधानी से चल रही है, जिसमें हिलना डुलना नहीं है, ऐसा लगता है कि ये पेड़ खूब तेजी से जा रहे हैं और अपने आपकी स्थिरता मालूम होती है। नाव में भी यही हिसाब रहता है। तो चाहे कल्पनाओं से सूर्य को चलना मानें अथवा पृथ्वी का चलना मानें, सूर्य को स्थिर मानें तो भी ज्योतिष का हिसाब सही बैठ जायेगा। कल्पना की तो बात है और पृथ्वी स्थिर है, सूर्य चलता है, यों निरखा करें तो भारत में प्रारंभ से ज्योतिष बना हुआ है। लोक के विषय में अनेक कल्पनाएँ लोग करते हैं। लेकिन अनंत तीर्थड्.करों की परंपरा का व्याख्यान चला आया हुआ यह लोक का निरुपण एक बहुत विशाल है और लोक के निरुपण के संबंध में तो एक बड़ा शास्त्र विस्तार है।

जीवादि पदार्थों से पूर्ण लोक―यह लोक जीवादिक समस्त पदार्थों से गाढ़ा भरा हुआ है। इस लोक में ऐसा कोई प्रदेश नहीं बचा जहाँ में अनंत बार उत्पन्न न हुआ होऊँ। इस लोक में ऐसा कोई समागम नहीं बचा जो हमने पाया न हो, इस लोक में ऐसा कोई भोगने को अणु नहीं बचा जिसे हमने अनेक बार भोगा न हो। लेकिन मोह की विचित्र लीला है कि जो कुछ आज मिला है वह प्रकट असार है, क्लेश का ही कारण है लेकिन उस ही असार वैभव में इतनी तीव्र ममता लगाये हुए हैं कि सर्व बाह्य विकल्पों से उठकर एक शुद्ध ज्ञायकस्वरूप आत्मतत्त्व के अनुभव में उत्साह नहीं जगता। ऐसा मूर्छा का रंग जगत के जीवों पर बना हुआ है कि लोकभावना से हम यही तो शिक्षा लें कि अब मुझे इन लौकिक समागमों से कुछ प्रयोजन नहीं है। हमने जान लिया सब कुछ यथार्थ जो जैसा है। यह लोक अनादि निधन है, स्वयं सिद्ध है, अविनाशी है इसका कोई कर्ता धर्ता ईश्वर नहीं है और ये जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल 6 जाति के पदार्थों से भरा हुआ है।

अंतर्द्वंद्व क्षोभ का मूल अज्ञानता―भैया ! किसी भी तत्त्व का स्पष्ट ज्ञान हो तो अंतरंग में निर्भयता सी रहा करती है, निराकुलता रहा करती है, लेकिन जब यथार्थ ज्ञान नहीं होता तो अज्ञान के ही कारण इसके अंत:द्वंद्व क्षोभ और एक बेसुधी सी बनी रहती है। हम क्या हैं, कैसे हैं, क्या होंगे इन सब बातों का ज्ञानी जीव को किसी भी रूप में, प्रत्यक्ष रूप में, परोक्ष रूप में जब यथार्थ परिचय होता है तो उसके विह्वलता नहीं जगती। जैसे मोही पुरुष किसी इष्ट के वियोग होने पर ऐसा मानते हैं कि हमारी तो दुनिया ही लुट गयी, अब मैं कुछ भी नहीं रहा, मेरा जीना बेकार है और कितने ही लोग तो इस वियोग से दु:खी होकर आत्मघात भी कर डालते हैं, किंतु ज्ञानी जीव को तो सर्वविदित है। क्या था। कोई वह भी मायारूप था जिसका वियोग हो गया, जीव द्रव्य था, शरीर के स्कंध थे, कर्मों की वर्गणायें थी, उन सबका वह पिंड था, असमानजातीय द्रव्य पर्याय था, उस पर भी अलग-अलग द्रव्यों पर विचार करें तो उस जीव से तो कोई वास्ता नहीं, वह तो अमूर्त है, चेतन है, नामरहित है, उससे तो व्यवहार ही नहीं बनता और कामार्णवर्गणाओं से व्यवहार क्या और शरीर स्कंध से व्यवहार क्या, अचेतन है तो फिर अब कर क्या रहा था इस इष्ट के साथ, कुछ नहीं कर रहा था, अज्ञान कर रहा था, मूढ़ता का विकल्प कर रहा था। मोही जीव इष्ट वियोग में विह्वल रह-रहकर अपना सारा जीवन खो देता है। यदि सुख चाहिए, शांति चाहिए तो सभी पदार्थों का यथार्थ निर्णय रखना चाहिए, यह है सबसे उत्कृष्ट बुद्धि हम आप लोगों की। बाह्य चीजों से क्या प्रयोजन? बाह्य वैभव है फिर भी दु:खी बाह्य वैभव नहीं है कोर्इ ज्ञानी है तो वह सुखी सुख शांति के लिये बाह्य वैभव के संचय की धुन तो न रखें, उससे कुछ सिद्धि नहीं होने की है, बल्कि महान् अनर्थ अंत में यह होगा कि मरते समय जबकि सह चीजें छूट रही हैं तो यह बड़ा क्लेश करेगा, हाय मैंने रात-दिन जी तोड़कर इतना धन कमाया, इतना वैभव जोड़ा और यह सारा का सारा एक साथ छूटा जा रहा है। उसकी विह्वलता दूसरे क्या समझें? तो कुछ दृष्टि इस ज्ञान विकास की रहना चाहिए।


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