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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 226

From जैनकोष



अधो वेत्रासना कारो मध्ये स्याज्झल्लरीनिभ:।

मृगंगसदृशस्चाग्रे स्यादित्थं स त्रयात्मक:।।226।।

लोक का आकार―लोक का आकार कैसा है? इसका स्पष्टीकरण इस श्लोक में किया है। इस लोक को 3 भागों में बाँट लीजिए, किसी भी चीज के तीन भाग किए जायेंगे तो उनका क्या नाम है? अधोभाग, मध्य भाग और ऊर्ध्व भाग। इस लोक के तीन भाग हैं अधो भाग, मध्य भाग और ऊर्ध्व भाग। इसमें अधोलोक तो है वेत्रासन के आकार, मूढ़ा के आकार, अर्थात् नीचे जो चौड़ा है और ऊपर सकरा हो गया है। लोक रचना को शीघ्र जानने के लिए यह उपाय बड़ा अच्छा है कि 7 बालक एक के पीछे एक खड़े कर दिये जायें और वे सातों के सातों पैर पसार कर कमर पर हाथ रखकर खड़े हों तो सारी लोक रचना बिल्कुल ठीक समझ में आ सकती है। कहाँ क्या है, मानो ऐसा लोक रचना का दृश्य बनायें, 7 बालकों को खड़ा करके, यह तो हुआ पूरा लोक। अब बतलाओ हम आप किस जगह रहते हैं कि इस लोक के चारों तरफ भी घूम करके देखें तो वह स्थान नहीं दिख सकता। इस सारे लोक के बीच में एक त्रसनाली है। जैसे तीन लड़के पीछे के छोड़कर बीच के बालक में उसमें भी ठीक बीच में मान लो कि जितनी चौडी गर्दन है उतने ही चौड़े शरीर के बीच-बीच में चौकोर एक आकार बना लीजिए।

त्रस नाली की रचना―उतनी ही ऊँची वह त्रसनाली है, यह भी किसी ओर से दिखेगा नहीं, और उस त्रसनाली के मध्य भाग में असंख्याते द्वीप समुद्रों की रचना है। उन असंख्याते द्वीप समुद्रों के ठीक बीच में जंबूद्वीप है, उसके एक ओर भरत क्षेत्र, उसमें 5 खंड। आर्य खंड के बीच में है अपना सबका देश, वहाँ हम आप कितनी सी जगह में रहते हैं, यों समझ लीजिए कि जितना उन सब लड़कों का विस्तार बन गया है, घेरा बन गया उस घेरा में एक सूई की नोक के बराबर भी भाग नहीं बैठता जिस देश में हम आप रहते हैं। तो उस रचना में जो अधोलोक है अर्थात् नाभि से नीचे का, कमर से नीचे का जितना हिस्सा है वह अधोलोक है, वह वेत्रासन के आकार का लगता है, और ऊपर जो नाभि से ऊपर बचा हुआ है वह मृदंग की तरह मालूम होता है। जैसे मृदंग दोनों तरफ से सकरा रहता और बीच में मोटा रहता है, कुछ-कुछ ढोल भी ऐसी होती है पर मृदंग में बीच में बहुत घेरा रहता है उसकी तरह मालूम होता है। और बीच में जो मध्य लोक है वह झल्लरी की तरह मालूम होती है, समतल है। ऐसे ये तीन प्रकार के लोक इस आकार में स्थित हैं इस समस्त लोक में जो एक त्रसनाली है उसमें ही त्रस जीव होते हैं और जितना बचा हुआ हिस्सा है आप उन 7 बालकों की रचनाओं से लोक को निरखकर सोचते जाइये, जितना भी त्रसनाली से बाहर का हिस्सा है उसमें केवल स्थावर जीव रहते हैं। स्थावर जीव त्रसनाली में भी हैं और त्रसनाली से बाहर भी हैं। त्रसनाली के सिवाय अन्य जगह त्रस नहीं है और उन त्रसों में भी जो विकलत्रय हैं, कीड़ा मकौड़ा हैं वे तो सब इस मध्य लोक में भी थोड़ी सी जगह में पाये जाते हैं, ऊपर देव लोक का निवास है, नीचे नारकी जीवों का निवास है।

त्रसनाली से बाहर भी त्रस की संभावना―स्थावर सब जगह हैं। त्रसनाली से बाहर कभी त्रस जीव अगर रहते हैं तो किस स्थान में रहते हैं? इसे भी ध्यान में लाना। कोई भी जीव मरकर यदि त्रसनाली से बाहर जन्म धारण कर जाता है तो मरने के बाद तो वह स्थावर कहलाने लगेगा, लेकिन मरण से पहिले जिसे कि मारणांतिक समुद्घात कहते हैं कि जीव मरते समय एक बार जन्मस्थानों में भी पहुँच सकता है, फिर लौटकर शरीर में आकर एकदम निकलता है। तो मारणांतिक समुद्घात हो किसी त्रस का और उसे पैदा होना हो त्रसनाली से दूर तो वह त्रसजीव बाहर ही आया ना फिर लौटकर फिर शरीर में आकर एक साथ मरकर जायेगा। इससे भी त्रसनाली से बाहर त्रसजीव रह सकते हैं। बाहर के स्थावर जीव का त्रसनाली में त्रसपर्याय में मानो जन्म होता है तो मरने के बाद वह त्रस कहलाने लगेगा, सो यों भी बाहर त्रस रहा। वहाँ कोई स्पष्ट दिशा में त्रस बाहर नहीं रहते हैं।

समस्त लोकरचना के मान का फल―ऐसा एक महान् लोक है जिस लोक में हम आप निवास करते हैं। सारी लोक रचना जान लेने से मोह में अंतर आता है। किस का मोह करना? लोक तो ऐसा है। तो इन सब भावनाओं का प्रयोजन है―मोह रागद्वेष से दूर होना, और जिस प्रकार आत्मा को समता का सुख प्राप्त होता हो उस प्रकार की परिणति बने इसी के लिए बारह भावनाओं का चिंतवन किया जाता है।


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