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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 227

From जैनकोष



यत्रैव तंतव: सर्वे नानागतिषु संस्थिता:।

उत्पद्यंते विपद्यंते कर्मपाशवशंगता:।।227।।

सभी जीवों के स्वभाव में ऐक्य, पर-विभाव से विविधता―जहाँ पर ये सब प्राणी नाना गतियों में स्थित होते हुए कर्मों के जाल के वशीभूत होकर उत्पन्न होते हैं और मरते हैं वही तो यह लोक है। लोक में क्या हो रहा है? लोक में जीव नाना गतियों में जन्म लेते हैं, मरते हैं, संपन्न होते हैं, विपन्न होते हैं, यही सब जीवों के लिए हो रहा है। एक स्थिति समान स्थिति जो भी होगी वह स्वभाव विकास की होगी। स्वभाव से विपरीत जितने भी परिणमन हैं वे सब एक समान होते हैं, जैसे कोई सवाल दे तो उसका सही उत्तर जो होगा वह एक ही होगा और गलतियाँ जो होगी वह नाना तरह की होंगी। तो विकार जो होते हैं वे नाना प्रकार के, किंतु जो स्वभाव का विकास है वह सबमें एक समान है। तो यहाँ लोक में सब विभिन्नताएँ देखी जा रही हैं। यहाँ वहाँ चलने फिरने से त्यागियों के लिए विहार कह लीजिए, गृहस्थों के लिए पर्यटन कह लीजिए। तो चलना फिरना अनेक घटनाएँ जो दृष्टि में आती हैं उन घटनाओं से इस जीव को शिक्षा मिलती है और कुछ यह अपनी ओर झुकने का भी भाव रखता है। अब देखिये बहुत बड़ा बोझ लदा है बग्गी में और भैंसा लादे चला जा रहा है और ऊपर से बेदर्द होकर डंडे भी मारते जा रहे हैं और और भी दसों प्रकार की घटनाएँ देखने में आती हैं, उसकी यह हालत देखकर क्यों दु:ख होता है? इसलिए दु:ख होता है कि वह भी जीव है, हम भी जीव हैं। जैसी वेदना हमें होती हैं वैसी ही वेदना इसके होती है, पर बेचारा भार लादे है, परतंत्र है, उसको देखकर दया आती है। उसका कारण है कि समानता की बात मन में आयी। ऐसा हो तो मैं भी हूँ, यह भी जीव है, यों अनेक प्रकार के संबंध चित्त में आते हैं जिनके कहने में तो देर लगती है पर विचारों में देर नहीं लगती। तो इन सब संबंधों के कारण एक राग हो जाता है अपनी ओर के झुकाव का। ऐसी घटना देखने पर यह लगता कि किसलिए वैभव कमाना, किसलिए धन जोड़ना, किसलिए दुनिया में बहुत-बहुत अपना नाम चाहना, सारी बातें एक हो जाती हैं, पर जैसे कभी खुद पर विपत्ति आती है रोग हो गया कठिन या अन्य कोर्इ विपदा आ गयी।

लोक में सर्वत्र अशरण्यता―मरणासन्न अवस्था हो गई तो उस समय फिर उसे वैभव के जोड़ने की नहीं पड़ती, कमाई की नहीं मन में आती है, सब असार जँचने लगता है। फिर उस समय किसी का मोह नहीं बसता है ऐसी प्राकृतिक बात है। कुछ भी विवेक हो जिसके उसकी बात है। तो अनेक तरह के विकार, अनेक घटनाएँ जहाँ जीव करते रहते हैं, वही तो यह लोक है। यह लोक साररहित है। इस लोक में कोर्इ क्षेत्र ऐसा नहीं है जिसका शरण मान लिया जाय, विश्वास किया जाय, जहाँ शांति और विश्राम मिल सके। लोक में ऐसा कोई भी जीव नहीं है जिस जीव के निकट हम रहें जिसको हम आत्मसमर्पण कर दें तो अपना कुछ दु:ख दूर हो सके, ऐसा भी कोई जीव नहीं है। यह असारता की अशरणता की बात अनादिकाल से चली आ रही है। ऐसे इस लोक में मौज मानकर रहना, बेहोश रहना, धर्म की ओर दृष्टिपात न रहना, विषयों के भोगों में रम जाना, यह तो कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है।

पवनवलयमध्ये संभृतोऽत्यंतगाढं,


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