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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 370

From जैनकोष



निष्पंदीकृतचित्तचंडबिहगा: पंचाक्षकक्षांतका:,

ध्यानध्वस्तसमस्तकल्मषविषा विद्यांबुधेपारगा: ।लीलोंमूलितकर्मकंदनिचया: कारुण्यपुण्याशया,

योगींद्रा भवभीमदैत्यदलता कुर्वंतिते निर्वृतिम्॥370॥

योगींदों से निज के आशीष की वांछा –ऐसे गुणवान योगींद्र हमारे और भव्य पुरुषों के आनंदरूपी मोक्ष को करें । कैसे हैं वे योगींद्र जिनके प्रति ध्यान करके एक मोक्ष सुख की प्रार्थना की गयी है । जिन्होंने चित्तरूपी पक्षी को वश किया है, अचलित किया है ऐसे निश्चल हैं । इस मन को पक्षी की उपमा दी है । जैसे पक्षी किसी एक जगह शांत होकर नहीं बैठ पाता, इधर उधर फुदकता अथवा पंख हिलाता रहता है, अभी कहीं बैठा है, थोड़ी ही देर में कहीं पहुंच जाता है । यों पक्षी को चंचल बताया है । तो जैसे पक्षी चंचल है ऐसे ही यह मन राग और द्वेष के कारण चंचल रहा करता है । ऐसे चित्त को जिन्होंने निश्चल किया है वे योगींद्र हमारे और भव्य जीवों के मोक्षरूप आनंद को करें । यद्यपि इस प्रार्थना करने वाले गुणाभिलाषी पुरुष की यह पूर्ण श्रद्धा है, कोई भी जीव किसी अन्य जीव के सुख दुःख संसार मोक्ष किसी भी परिणमन का कर्ता नहीं होता । लेकिन एक निमित्त दृष्टि से अथवा भक्ति के प्रसंग में यह कथन युक्त जँचता है कि जिस प्रभु के गुणों के स्मरण के माध्यम से हम तत्त्वचिंतन करके एक अपने में विविक्तता का अनुभव करते हैं और जिसके प्रसाद से मुक्ति निकट होती है तो उस प्रभु की भक्ति में यह कहना ठीक है कि वह हमें आनंद प्रदान करे, मुक्ति प्रदान करे । यह सब भक्ति का स्तवन है । क्या कोई इस तरह भी स्तवन करेगा किसी के सामने कि हे प्रभो ! तुम हमारा कुछ भी करने में समर्थ नहीं हो, तुम भिन्न हो, परद्रव्यहो ? ये कोई स्तवन के वचन हैं क्या ? यद्यपि बात ऐसी ही है कि प्रभु हमारा कुछ नहीं करते, पर इस तरह से कहना कोई गुणानुराग की बात नहीं है । गुणानुराग में आभार प्रकट किया ही जाता है ।

योगींद्रों की उत्कृष्ट विषयनिवृत्तता –ये योगींद्र पंचेंद्रिय रूप बनके दग्ध करने वाले हैं अर्थात् इंद्रिय के विषय को जीतने वाले हैं । आत्मबल का प्रयोग विषयों के जीतने से होता है । जो जितना इंद्रियविजयी है उसे उतना ही आत्मबली समझना चाहिए । ये योगींद्र ध्यान से समस्त पापों का नाश करने वाले हैं । पाप तब उत्पन्न होते हैं जब कोई दुर्ध्यान हो । खोटे विषयों में चित्त लगता हो तो पाप उत्पन्न होते हैं किंतु जहाँ निष्पाप, निष्कर्म शुद्ध ज्ञायकस्वरूप का ध्यान बन रहा हो ऐसे उत्तम ध्यान में पापों का बंध नहीं है और पूर्वबद्ध पापकर्मों का विनाश होता है । यों ध्यान से जो पापों का नाश करने वाले हैं वे योगींद्र हमारे और अन्य भव्य जीवों के मोक्षसुख के प्रदान करने वाले हों ।योगींद्रों की विद्यांबुधिपारगता –ये योगींद्र विद्यारूपी समुद्र के पारगामी हैं अर्थात् सर्वप्रकार की विद्याओं के अधिपति हैं । जो सभी प्रकार की विद्याओं के अधिपति होते हैं, अनेक कलाओं में कुशल होते हैं ऐसे पुरुषों में ध्यान की समुचित योग्यता होती है । जैसे लोक में भी देखा जाता है कि जिनकी बुद्धि हर दिशा में चलती है उनका धर्म में भी बहुत विधिपूर्वक गमन होता है । तो कोई राजा थे, कोई मंत्रि थे, कोई विद्वान थे, ऐसे ही लोग विरक्त होकर निर्ग्रंथ दिगंबर हुए हैं और उन्होंने उन कला कुशलताओं का प्रयोग अब आत्मध्यान के लिए किया है तो ऐसे कुशल पुरुषों के आत्मध्यान होना बहुत सुगम सिद्ध है । ऐसे योगींद्र जो समस्त विद्याओं के अधिपति हैं हमारे और भव्य प्राणियों के सुखरूप मुक्ति को करो ।योगींद्रों की कर्मध्वंसकुशलता –वे योगींद्र जरा सी लीला मात्र में कर्मों की जड़ को उखाड़ने में समर्थ हैं । जिनकी जिस विषय में गति होती है वे उस विषय को लीला मात्र में सिद्ध कर लेते हैं । जैसे जो लिखने में बड़े चतुर होते हैं वे थोड़े से ही श्रम से जैसा चाहे बैठे हुए भी लिखने में समर्थ हो जाते हैं और जो कुशल नहीं हैं वे बड़ा उपयोग लगायेंगे, बहुत हाथ को सम्हालेंगे, बड़े श्रम से लिख सकेंगे । जो किसी खेल में निपुण हैं वे दौड़ते हुए, चलते हुए, झुकते हुए, अनेक स्थितियों में उस क्रीड़ा में विजय प्राप्त कर लेते हैं । तो जिन महापुरुषों ने अपनी आत्मा के सहजस्वरूप का अनेकों बार अवलोकन किया और इस अवलोकन में वे दृढ़ता से समर्थ हुए ऐसे पुरुष क्रीड़ा मात्र में अर्थात् जरा से ही अभ्यास से समस्त कर्मों के मूल को उखाड़ फेंकते हैं । उपयोग की ही तो बात है । उपयोग जहाँ निष्कलंक अंतस्तत्त्व की ओर लगा वहाँ समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं । तो ये योगींद्र जो अपने ज्ञान की लीला से कर्मों को मूल से उखाड़ने में समर्थ हैं वे हम सबको मोक्षसुख प्रदान करें ।कारुण्यपवित्रित योगियों की उपासना –इन योगींद्रों में अपार करुणा होती है । और, उनकी करुणा अकारण होती है, बिना स्वार्थ के होती है । करुणा भी कैसी अपूर्व है कि संसार के संकटों से छुटाने का यह सुगम उपाय है । इस उपाय को बहुत जल्दी समझ लें और उस उपाय पर चलने लगें ऐसी उनके आंतरिक भावना होती है, और यह भी बिना किसी खुदगर्जी के । लोक में बंधु और मित्र बहुत होतें हैं पर वे किसी न किसी खुदगर्जी को लेकर होते हैं । ये ज्ञानी संत जिन्हें संसार और मुक्ति का सब रहस्य विदित हो गया है वे बिना ही खुदगर्जी के संसार के समस्त जीवों का भला चाहने वाले होते हैं । तो जो सत्य करुणा भावरूप पुण्य से पवित्र मन वाले हैं वे योगींद्र हमें और भव्य जीवों को मुक्तिसुख प्रदान करें । ये योगींद्र संसाररूप भयानक दैत्य को चूर्ण कर जाने वाले हैं अर्थात् संसरण परिणाम और द्रव्य संसरण ये सब जिनके समाप्त हो जाने वाले हैं वे योगींद्र हम सबका कल्याण करें । जो स्वयं कल्याण पथ पर लगे हैं वे ही दूसरों के कल्याण के निमित्त बन सकते हैं ।राग की विकट शत्रुरूपता– जगत में बहुत से मित्र बंधु हैं, मोहीजन हैं, वे कल्याण के मार्ग तो क्या अकल्याण के निमित्त बन जाते हैं । जिन्हें लोग मानते हैं कि ये मेरे खास बंधु हैं, मित्र हैं उनका राग करके उनसे मोह करके यह जीव संसार की कुगतियों को प्राप्त करता है । जिन्हें लोग गैर मानते हैं वे गैर भले हैं जिनके कारण हमें कोई विपदा नहीं आती । विपदा केवल द्वेष से द्वेष की नहीं होती, किंतु राग भी महाविपदा है । कभी किसी को कोई कषाय जगे, क्रोध उत्पन्न हो तो लोग उसका और-और प्रकार से बिगाड़ करना चाहते हैं, उसे धन हानि करके या उसकी किसी उन्नति में हानि करके उसका बिगाड़ करना चाहते हैं, लेकिन सबसे अधिक बिगाड़ करने का तरीका तो यह नहीं है । यह तरीका है कि उसे कुछ विषय – साधन जुटा दिये जायें ताकि वह भव-भव में संकट सहता रहे । यह उपाय उसे दुःखी करने का उसके द्वेष के साधन मिलाने से अधिक दुर्विपाक है । कोई घर का पड़ौसी गरीब हो लेकिन जो कुछ भी दो रुपया कमा पाता है, दो एक प्राणी हैं, सारा का सारा खर्च करके खूब आराम से अपने दिन गुजारता है । कोई पड़ौसी हो उसका धनी और सेठानी उससे रोज लड़े कि तुम तो इतने बड़े सेठ हो फिर भी साधारण ही भोजन बनवाकर खाते हो, देखो यह पड़ौसी जो गरीब है, 2) ही रोज कमाता है वह कितना अच्छा खाता है और कितना ठाठ से रहता है ।सेठ को उस पड़ौसी के प्रर्वतन के कारण कष्ट होगा और उसका वह बदला चुकाना चाहेगा, उसे मिटा दें, भगा दें, क्योंकि इसके कारण सेठानी हमसे रोज लड़ती है । यदि सेठ हो होशियार तो उसे भगाने की तथा मिटाने की अपेक्षा यह करेगा कि उसे 99 के चक्कर में डाल देगा । वह तृष्णा में आकर खुद बर्बाद हो जायगा । कभी रात को 99 रु. की थैली उसके घर के आँगन में फेंक दे, 99 रु. पाकर वह तो यह सोचेगा कि 1) कम है, नहीं तो मैं शतपति कहलाता । ठीक है, कल 1) बचा लेंगे और 1) ही खर्च करेंगे । पर जब 100) हो गए तो हजार की तृष्णा हो गई । यों चवन्नी रोज में ही गुजारा करने लगा । अब तो सारा जीवन ही दुःखमय हो गया । तो लोग समझते हैं कि द्वेष और विरोध यह बड़ी विपदा है, पर इससे भी बड़ी विपदा राग और मोह है । अपने लिए वे गैर भले हैं जिनके कारण हमें नरक निगोद जैसी यातनाओं के पाप तो नहीं बनते, पर जिनमें तीव्र मोह है वे तो हमारी कुगति के कारण बनते हैं । पर कैसी बुद्धि है संसारी जीवों की कि यह बात चित्त से नहीं जाती कि ये मेरे हैं, इन स्त्री, पुत्रादिक के लिए ही मेरे तन, मन, धन, वचन सब कुछ न्योछावर हैं और बाकी लोगों के लिए एक पैसा भी खर्च हो तो उसे समझ लेते कि यह मुफ्त गया, इतना तीव्र तृष्णा रंग चढ़ा हुआ है कुबुद्धि का । जो ही विपदा के कारण है उन ही में हम अधिक राग किया करते हैं ।

स्वरूपपरिचय बिना धर्मभाव की अनुद्भूति –हम भगवान की पूजा करें, दर्शन करें, सब कुछ करें और इन बातों में अंतर न डालें तो वह प्रभु की भक्ति क्या हुई ? हम प्रभु को भक्ति, पूजन, वंदन सब कुछ करें और परिजन से तथा अन्य पर पदार्थों से मोह न छूटे तो क्या यह कोईभली बात है ? मोह नहीं छूटा इसका चिन्ह यही है कि आप अपना सब कुछ सर्वस्व तन, मन, धन, वचन उनके ही लिए न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं । यों तो जब कोई धर्म के भेष में आता है, पूजन स्तवन आदिक में आता है अथवा चर्चा में बैठता है, स्वाध्याय करता है अथवा दूसरों को सुनाता है तो वहाँ तो बातें लंबी चौड़ी झौंकनी ही पड़ती हैं, उसका ही तो नाम आजकल का धर्म है । और, अब स्वाध्याय करने बैठे तो क्या यह बोलना चाहिए कि मोह करने से जीव को सुख होता है ? वहाँ तो यही बोला जाता है कि ऐ जगत के मोही प्राणियों ! तुम मोह से अपनी बरबादी कर रहे हो । हम क्या हैं इस पर कुछ दृष्टि नहीं है । वहाँ तो गप्पें झोंकी जायेंगी । प्रभु की भक्ति वंदना बड़े गान तान से करेंगे, बोलेंगे सही सही, पर मोह जरा भी शिथिल न हो, चित्त में थोड़ी भी यह बात न समाये कि आखिर जल्दी ही एक दिन सब छूट जायेंगे, तो इनके पीछे माथा रगड़ने से क्या हित होगा । ऐसे दुर्लभ नर जीवन में कुछ निर्मलता की स्थिति क्यों न बना लें । समझ लो कि हम 105 साल पहिले ही मर गए थे । वर्तमान जीवन में स्वहित की बात अगर चित्त में न आयें तो ऐसे जीने से क्या लाभ ? यदि ऐसी बातें चित्त में समाती हैं तो यह भी एक निर्मोहता की निशानी है । तो जो योगींद्र निर्मोह हैं और निर्मोहता के कारण संसाररूप भयानक दैत्य को चूर्ण कर देते हैं ऐसे योगींद्रों का हमारा गुणस्मरण रहें ।


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