• जैनकोष
    जैनकोष
  • Menu
  • Main page
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • Home
    • Dictionary
    • Literature
    • Kaavya Kosh
    • Study Material
    • Audio
    • Video
    • Online Classes
    • What links here
    • Related changes
    • Special pages
    • Printable version
    • Permanent link
    • Page information
    • Recent changes
    • Help
    • Create account
    • Log in

जैन शब्दों का अर्थ जानने के लिए किसी भी शब्द को नीचे दिए गए स्थान पर हिंदी में लिखें एवं सर्च करें

 Actions
  • वर्णीजी-प्रवचन
  • Discussion
  • View source
  • View history

वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 371

From जैनकोष



विंध्याद्रिनंगरं गुहा वसतिका शय्या शिला पार्वती ।दीपाश्चंद्रकरा मृगा: सहचरा मैत्री कुलीनाङ्ना ॥

विज्ञानं सलिलं तथा सदर्शनं येषां प्रशांतात्मनाम् ।धन्यास्ते भवपंकनिर्गमपथप्रोद्देशका: संतु न: ॥371॥

साधुओं का नगर –जिन साधु मुनि महाराजों का नगर क्या है – विंध्याचल आदिक पर्वत । जैसे गृहस्थों से पूछा जाय कि आपका नगर कौन-सा है तो उत्तर देंगे–मेरठ, मुजफ्फरनगर, हापुड़ इत्यादि तो उन महाराजों का, मुनीश्वरों का कोई पूछे कि नगर कौन है, तो भक्त लोग यही उत्तर देंगे कि उनका नगर है वन उपवन इत्यादि । जहाँ ठहरकर, विचर कर नि:शंक रहा जाता है उसे नगर कहते हैं । लोकव्यवहार में अज्ञानी रागीजनों का विश्राम नगर यहाँ के नगर आदि हैं । यहाँ भी व्यवहार से यह कहा जा रहा है कि विरक्त ज्ञानी साधु संत पुरुषों का विश्रामस्थान वन उपवन आदि हैं, ये ही साधुओं के नगर हैं । ऐसा एकांत भयावह स्थानों पर निवास करना भी साधारणजनों से शक्य नहीं है सो यह वन निवास आदि भी उत्तमजनों द्वारा किये जा सकते हैं । लेकिन अंत: तो देखिये साधुजनों का नगर क्या है ? उनका अपना आत्मक्षेत्र, आत्मस्वरूप ही उनका नगर है, जहाँ उनका परमार्थत: निवास रहता है । इस परमार्थ नगर में निवास करने वाले ज्ञानी साधु संत परमार्थ आनंद का अनुभव करते हैं और इसी आनंदानुभव के कारण वन निवास उन्हें सुखद प्रतीत होता है ।साधुवों का गृह –साधुवों का घर क्या है, कितनी मंजिल का है ? अरे पर्वतों की गुफायें ही उनके घर हैं जो प्रकृत्या बनी हुई हैं । कहीं पोल सा है ऐसा कोई स्थान है तो वह ही उन मुनियों का घर है । जहाँ ठहर कर विश्राम किया जाता है, वह घर कहलाता है । गृहस्थों को तो झरोखे वाले एयरकन्डीशन वाले, महलों में विश्राम मिलना प्रतीत होता है, किंतु साधुजनों को अपने आत्मस्वरूप में विश्राम मिलता है, यह आत्मस्वरूप रमण विविक्त स्थानों में सुगमतया होता है और संसार से प्रयोजन न रखने वाले संतजनों का प्रकृत्या निर्जन गुफादिक एकांतस्थानों में निवास होता है, सो उन्हें ऐसे विविक्त स्थानों में ही विश्राम मिलता है । जहाँ रहकर विश्राम मिले, नि:शंकता रहे, निर्बाधता रहे वही उसका घर है । साधु संतों का घर पर्वतों की गुफायें आदिक स्थान हैं ।साधुवों की शय्या –साधुवों की शय्या क्या है, वे सोते किस पर हैं ? आखिर सभी लोग जानते हैं कि दिन भर श्रम करने के बाद कुछ कोमल गद्दा आदिक तो होना ही चाहिए तब तो हम सोयें । तो मुनियों की शय्या क्या है ? बताया है कि जो पर्वतों की शिलायें हैं वे ही शय्या हैं । लोग जब कुछ विषयसाधन वैभव के समागम में रहते हैं तो काल्पनिक मौज मानते हुए कोमल शैय्यापर शयन कर आराम का प्रतिकल्पन करते हैं, किंतु सत्य आराम तो निर्विकल्प ज्ञानोपयोग में होता है । जो लोग आराम के लिए परपदार्थों का आश्रय लेते हैं और चूँकि मायामय पर का आश्रय लिया है उन्होंने सो उन्हें यथार्थ आराम हो ही नहीं सकता । साधुवों ने स्वब्रह्म का ही आलंबन लिया है सो उन्हें सत्य आराम प्राप्त होता है । ऐसे साधुजन शारीरिक श्रम के खेद को दूर करने के लिये आयासप्राप्य शय्या की चाह नहीं करते, उनकी शय्या तो पर्वतीय शिला है ।साधुक्षेत्र दीपक –उनके पास कुछ बिजली दिया वगैरह भी रहता होगा ? कहते हैं कि हाँ रहता है । जो चंद्रमा का प्रकाश है, नक्षत्रों का उजाला है, वह चाहे उन गुफावों के अंदर पहुँचे अथवा न पहुँचे, ऊपर ही दृष्टिगत रहे, वही उनकी दीपक है । ये तो बड़ी विलक्षण बातें कही जा रही हैं, जो गृहवासी के लिये कठिन हैं । दीपक या किसी प्रकार का पौद्गलिक प्रकाश न होने पर गृहस्थ घबड़ा जाते हैं, किंतु तत्त्ववेत्ता साधुजन निज अंत:प्रकाश में ही प्रसन्न रहा करते हैं । ऐसे साधुजन बाह्य दीपकारित के लिये क्या श्रम करेंगे, वे तो इस आरंभ से दूर हैं, तब साधुओं के निवासस्थल पर जो प्रकृति की दैन है वही उस स्थल पर बाह्य प्रकाश है । मुनिजन निर्जन पर्वत, बन, गुफा आदि एकांत स्थानों में रहते हैं अत: उनके लिये चंद्रकिरण आदि ही बाह्य में दीपक हैं ।साधुवों के क्षेत्र में सहचर –आखिर उन ध्याता योगीश्वरों के कोई दोस्त तो होंगे, सहचर तो होंगे, उनके साथ रहने वाला और कोई भी तो होगा ? कहते हैं – अरे हिरण हैं, खरगोश हैं, और और भी अनेक प्रकार के जानवर हैं जो उनके पास आते जाते रहते हैं, वे बड़े नि:शंक रहा करते हैं, वे उनके सहचर हैं । आत्मसाधना की धुन में आत्मसाधना के विराधक के निमित्त परिजन का परित्यागकर एकांत वन में विचरने वाले, ध्यान करने वाले योगीश्वरों के निकट योगीश्वरों की शांत मुद्रा से आकर्षित अनेक बनचर जीव ठहरकर अहिंसा की प्रतिष्ठा को बढ़ाते हैं । उस वातावरण में योगीश्वर कितने समृद्ध कहे जाँय, यह आप अपनी बुद्धि से निश्चय कर लीजिये । इन ध्याता योगीश्वरों के सहचर ये हिरण आदिक हैं । देखिये कैसी निरालंबता इन ध्याता योगीश्वरों की है ।

साधुवों की परमार्थ रमणी –साधुवों के कुछ घर बार तो होगा, रमणी तो होगा ? कहते हैं कि हाँ उनके रमणी भी हैं जो सदा उनके साथ रहा करती है । सर्वप्राणियों की परमार्थभूत दया ही उनकी रमणी है । जो मन को रमा दे उसे रमणी कहते हैं । गृहवासियों का मन स्त्री से रमता है, किंतु तत्त्ववेत्ता ज्ञानी संत जनों का मन स्वपर दया में रमता है । भ्रमरहित, कषायरहित अपने उपयोग को प्रर्वताने में साधुओं का मन रमता है और ऐसे ही सर्वप्राणियों को नि:संकट देखने के लिये उनके उद्धार की जो परमकरुणा होती है उसकी चेष्टा में मन रमता है । इसी शुद्ध भावना में रमण करके साधुजन निर्जन बन गुफादिक स्थानों में रहकर प्रसन्न रहा करते हैं । साधुवों की रमणी स्वपरदया है ।साधुवों का ज्ञानपात्र –किसी के भी घर में देखो तो पानी पीने के लिए अनेक बर्तन होते हैं घड़ा अथवा सुराही वगैरह । तो उन मुनि महाराजों के पास पीने का पानी तो होगा ? कहते हैं – हाँ है, विज्ञान ज्ञान ही उनका पीने का पानी है । जैसे जब आप विश्राम से बैठे हों, शुद्ध ध्यान हो तो अपने आप ही गले से पानी उतर आता है । यह आपको विशुद्ध आनंद की सूचना देता है ना । इससे भी अधिक विश्राम व शांति में बसने वाले साधुजन वस्तुस्वातंत्र्य के उपयोग से विकल्मष ज्ञानजयोति का अनुभव करते हैं, उन्हें शुद्धज्ञानसुधारसपान में अनुपम तृप्ति उत्पन्न होती है । इस ज्ञानसुधारसपान से ज्ञानी संत ग्रीष्मकाल की कठिन तपस्या के बीच में भी तृप्त और प्रसन्न रहा करते हैं ।बेपढ़ा है साधुवों का परमार्थ भोजन –साधुवों का उनका भोजन क्या है ? कहते हैं कि ज्ञान विज्ञान जल से सने हुए ध्यान, तप, व्रत, नियम आदि कर्तव्यों का पालन उनका भोजन है । जिससे बुभुक्षा शांत हो उसे लोग भोजन कहा करते हैं । बुभुक्षा नाम पदार्थों के भोगने की इच्छा का है । ज्ञानपूर्वक ध्यान तप व्रत नियम के आचरण से साधु संतों का समय विशुद्ध विश्राम में व्यतीत हो जाता है, उनके पदार्थों के भोगने की इच्छा शांत हो जाती है । साधु संतों का यह भोजन अनुपम है । इस भोगने को ही वे बनाते हैं, अपने ही अभिन्न साधन से बनता है और वे ही स्वयं खाते हैं और ऐसा ही खाते रहते हैं इस कारण यह भी कहना युक्त है कि खाते हुए अघाते भी नहीं है अथवा इस भोजन से वे पूर्ण तृप्त रहते हैं । ऐसे मुनिराज का जिनका अनूठा परिवार है वे संसारूपी कीचड़ से निकलने का हम सब लोगों को मार्ग बतायें, उपदेश करते रहें, ऐसा ध्यानी योगीश्वरों की प्रशंसा में उनका गुणगान किया गया है । योगीश्वर समस्त प्राणियों के निरपेक्ष बंधु हैं, अत: समस्त जगत को उनका परिवार कहा जा सकता है । उनके उपदेश से अनेकों भव्य जीव अज्ञानांधकार को दूर करके ज्ञानप्रकाश को पाकरके शांतिपथ विहार करके उत्कृष्ट शांतिपद को प्राप्त करते हैं । योगीश्वरों का जितना आभार माना जाय वह सब थोड़ा है । ऐसे योगीश्वरों को मन वचन काय से मेरा प्रणाम हो ।


पूर्व पृष्ठ

अगला पृष्ठ

अनुक्रमणिका

Retrieved from "https://www.jainkosh.org/w/index.php?title=वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव_-_श्लोक_371&oldid=84056"
Categories:
  • ज्ञानार्णव
  • प्रवचन
JainKosh

जैनकोष याने जैन आगम का डिजिटल ख़जाना ।

यहाँ जैन धर्म के आगम, नोट्स, शब्दकोष, ऑडियो, विडियो, पाठ, स्तोत्र, भक्तियाँ आदि सब कुछ डिजिटली उपलब्ध हैं |

Quick Links

  • Home
  • Dictionary
  • Literature
  • Kaavya Kosh
  • Study Material
  • Audio
  • Video
  • Online Classes

Other Links

  • This page was last edited on 2 July 2021, at 16:34.
  • Privacy policy
  • About जैनकोष
  • Disclaimers
© Copyright Jainkosh. All Rights Reserved
  • Powered by MediaWiki