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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 391

From जैनकोष



द्रव्यादिक यथासाद्य तज्जीवै: प्राप्यते क्वचित् ।

पंचविंशतिमृत्सज्य दोषास्तच्छक्तिघातकम् ॥391॥

सम्यग्दर्शन में शंकादिक दोषों का अभाव – यह सम्यग्दर्शन द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप सामग्री को प्राप्त होकर तथा सम्यग्दर्शन की शक्ति के घात करने वाले 25 दोषों को छोड़ने से यह प्राप्त होता है । योग्य द्र्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की प्राप्ति होने पर सम्यक्त्व होता है । निर्मल सम्यक्त्व में पच्चीसों दोष नहीं हुआ करते । शंका आदिक 8 दोष, जिनवचनों में शंका करना, अपने स्वरूप में संदेह होना, भय होना ये शंका ऐब दोष हैं । धर्मधारण करके भोगों की वांछा करना, मुझे अमुक प्रकार के आराम भोग विजय प्राप्त हो, इनके लिए यात्रा जाप आदिक करना, इनको करके भोग वांछा करना वांछादोष है । साधुजनों की भक्त पुरुषों की सेवा में घृणा करना ग्लानी करना यह निर्विचिकित्सा दोष है । ये सम्यग्दर्शन के दोष हैं । इन दोषों के रहने पर सम्यक्त्व की विशुद्धि नहीं होती । सम्यक्त्व का लाभ भी नहीं होता । कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरुवों को देखकर, उनका ढाल चाल चमत्कार निरखकर उनमें आदर बुद्धि जगना यह मूढ़ दृष्टि दोष है । किसी धर्मात्मा के दोषों को प्रकट करना अर्थात् धर्म की अप्रभावना करना, धर्म का लांछन व्यक्त करना ये सब अनुपगूहन दोष हैं । इनसे खुद का भी और दूसरों का भी अनर्थ होता है । धर्म की श्रद्धा से दूसरे भी चिग जाते हैं धर्म लांछनों को सुनकर । सो अनुपगूहन से अन्य जीवों को भी हित से वंचित रखा जाता है । सो अनुपगूहन का दूसरा नाम है अनुपवृंहण । अपने गुणों की वृद्धि में उत्साह न करना ये सम्यक्त्व के दोष हैं । धर्मात्माजनों को निरखकर प्रेम का भाव न उमड़ना किंतु ईष्या द्वेष का ही आशय रखना यह सम्यक्त्व का दोष है । धर्मात्मा पुरुष किसी प्रकरण में विचलित हो बनाये रहे हों तो उन्हें हर संभव उपायों से सहयोग देकर उन्हें धर्म में स्थिर करना सो तो स्थितिकरण है और डिगते हुए को और डिगा देना, उनको स्थिर न करना यह दोष है । अपने दुराचारों से अथवा अन्य विरोधी कर्तव्यों से धर्म की अप्रभावना फैलाना यह सम्यक्त्व का दोष है ।सम्यग्दर्शन में मद, अनायतन, मूढ़तादिक दोषों का अभाव – इसी प्रकार ज्ञान, प्रतिष्ठा, कुल, जाति, बल, रूप आदिक पाकर उनका मद करना, मैं सबसे श्रेष्ठ हूँ यह दोष हैं । ऐसे भावों में सम्यक्त्व उत्पन्न नहीं होता । कुदेव, कुशास्त्र, कुगुरु और इनके सेवक इनका आदर रखना, आस्था करना ये सब अनायतन हैं । ये सम्यक्त्व के दोष हैं । लोगों में धर्म के नाम पर जो कुछ भी बात प्रचलित है उस रुढ़ि में बहना । जैसे कोई समुद्र में, नदी में नहानें में धर्म मानते, कोई पर्वत से गिरने में धर्म मानते, कोई ढेलों को इकट्ठा करके या उन ढेलों के ढेर में एक ढेला फेंक देने पर धर्म मानते, ऐसी धर्म के बारे में जो रूढ़ियाँ चल रही हैं उनमें तत्त्व का निर्णय तो कुछ न करें और उसी में ही बह जायें यह भी सम्यक्त्व में दोष है । जो कुगुरु हैं, पाखंडी हैं उनमें अपना पूजा भाव, आदर भाव करना सम्यक्त्व के दोष हैं । जो देव नहीं हैं, कुदेव हैं उनमें देवत्व का भाव करना सम्यक्त्व का दोष है । ऐेसे इन सब दोषों से रहित सम्यक्त्व हुआ करता है ।

सम्यक्त्व की शरणरूपता – सम्यक्त्व में केवल अपने सहज स्वरूप का ध्यान और ऐसा ही स्वरूप जिनके प्रकट हो गया है ऐसे परमेष्ठी का भान होता है, भगवान आत्मा अरहंत परमेष्ठी इनके स्वरूप का श्रद्धान करना यह भाव जगता है और ऐसा ही भाव जगने पर जीव को निर्विकल्पता की उत्पत्ति होती है । यह दृश्यमान संसार तो मायाजाल गोरखधंधा की तरह है । जैसे गोरखधंधे में जितने चलें, उलझते जायेंगे अथवा जैसे मायाजाल देखने में तो बड़ा सुहावना लगता है, पर वह विडंबना को उत्पन्न करने वाला है, ऐसे ही ये समस्त समागम जिनमें लोग भूल रहे हैं और मोहवश कुछ को अपना मान रहे हैं बाकी को गैर मान रहे हैं, अपने पाये हुए पुद्गल ढेर से बड़ी आस्था बना रहे हैं, यह सब पापभाव है और इन परिणामों से संसार में जन्म मरण करने का बंधन चलता है । सम्यक्त्व के समान इस जगत में कोई उपकारी तत्त्व नहीं है, न कोई शरण है, अपना ही सम्यक्त्व भाव, अपना ही ज्ञानभाव, अपने में ही अपने को लगाने का पुरुषार्थ यह तो शरण है, बाकी अन्य कोई तत्त्व शरण नहीं है । भले ही पुण्य के प्रभाव से यहाँ बहुत बड़े-बड़े लोग बड़े सुखी नजर आये, लेकिन वह पुण्य मायारूप है और ये लोक के पोजीशन भी मायारूप हैं । सत्य आनंद तो आत्मा जब अपने स्वभाव में रत होता है तब प्राप्त होता है ।


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