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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 392

From जैनकोष



मूढ़त्रयं मदाश्चाष्टौ तथाऽनायतनानि षट् ।अष्टौ शंकादयश्चेति दृग्दोषा: पंचविंशति: ॥392॥

सम्यक्त्व में निर्दोषता का बल – ये 25 सम्यग्दर्शन के दोष कहे हैं – तीन मूढ़ता, 8 गर्व, 6 अनायतन और शंका आदिक 8 दोष ये 25 सम्यग्दर्शन के दोष कहे हैं । जिनको अभी बताया था ये सम्यक्त्व के दोष हैं और इनके विपरीत अर्थात् अपने आपकी ओर का लगाव ये सब गुण हैं । नि:शंकता रहना, इच्छारहित, ग्लानीरहित रहना, विशुद्ध ज्ञानप्रकाशवान अपने गुणों की वृद्धि में उत्साह रहना, अपने गुणों में, प्रभु के गुणों में वात्सल्य होना, अपने को चलायमान न रखना और अपने आपमे अपने प्रताप को उन्नत करना, प्रभावित करना ये सब सम्यक्त्व के गुण हैं । देव, शास्त्र, गुरु में ही भक्ति जगे और देव शास्त्र गुरु के सेवक सम्यग्दृष्टि जनों में ही प्रीति जगे, अन्यत्र आस्था न रहे ये सम्यक्त्व के गुण हैं जो पुरुष विपरीत अभिप्राय से परे हो जाते हैं उसमें ये सब गुण अनायास प्राप्त हो जाते हैं ।


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