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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 448

From जैनकोष



अवग्रहादिभिर्भेदैर्बह्वाद्यंतर्भवै: परै: ।

षट्त्रिंशत्त्रिशतं प्राहुर्मतिज्ञानं प्रपंचत: ॥448॥

मतिज्ञान का विवरण ― अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा तथा बहुविधि आदिक 12 प्रकार इन सबके विस्तार करने से मतिज्ञान 336 प्रकार का हो जाता है । हम आप सब को 5 इंद्रिय और एक मन के द्वारा जो कुछ ज्ञान होता है वह सब मतिज्ञान है । और उस मतिज्ञान के होने के बाद उस पदार्थ में जो और कुछ विशेष बोध होता है वह श्रुतज्ञान है । मतिज्ञान में सबसे पहिले जो ज्ञान हुआ है, एक ही ज्ञान की बात कह रहे हैं ― पहिले अवग्रह हुआ है । एक प्रकार का जिस कार्य का संकल्प होता है उसकी भाँति में ज्ञान का प्रारंभ हुआ है । उसके पश्चात्​ उस ज्ञान में विशेष जानने की वृत्ति होती है और उस वृत्ति में जैसा वह पदार्थ है तैसे ही जानने की वृत्ति जगे तो वह ईहा ज्ञान है, उसके बाद उस ही ज्ञान में जो निश्चयात्मक एवकार लगाकर ज्ञान बनता है वह अवाय ज्ञान है । और फिर उस ज्ञान की बात कभी भी न भूलना यह धारणा ज्ञान है । कुछ भी जानते समय है, यह है, यही है, इस प्रकार की तीन दृढ़ता की डिग्रियाँ बनती हैं, वही है अवग्रह ईहा और अवाय । फिर उस ज्ञाता विशेष को न भूल सकना ऐसी जो धारणा होती है वह है धारणा । ये चार प्रकार के ज्ञान 5 इंद्रिय और मन से उत्पन्न होते हैं । किंतु अवग्रह में जो एक भेद व्यंजनावग्रह का है अर्थात्​ कुछ जानकारी करने के बाद फिर उसके आगे सिल्सिला न चले, वहीं खत्म हो जाये, ऐसी कमजोरी का नाम है व्यंजनावग्रह । व्यंजनावग्रह नेत्र और मन से उत्पन्न नहीं होता, इसका कारण भी हम आपकी समझ में स्पष्ट हो जायेगा कि आँखों से जो हम जानते हैं वह एकदम स्पष्ट जान लेते हैं, तभी तो लोग कहते हैं कि तुमने कानों सुना या आँखों देखी ? आँखों देखे का बहुत महत्व लोग देते हैं, क्योंकि उसमें स्पष्ट बोध होता है । ऐसे ही मन की बात है । मन और नेत्र में जो ज्ञान होता है वह व्यंजनावग्रह नहीं है । तो व्यंजनावग्रह चार साधनों से हुआ और अवग्रह, ईहा, अवाय आदि 6 साधारण ज्ञानों से हुआ । 6×4=24+4=28 यों 28 प्रकार के ज्ञान 12 प्रकार के पदार्थों के होते हैं ― बहुत पदार्थों का बहुत प्रकार के पदार्थों का शीघ्र ज्ञान और विलंब से ज्ञान, एक का ज्ञान, एक प्रकार का ज्ञान, प्रकट निकले हुए का ज्ञान, गुप्त छिपे हुए का ज्ञान, एकदम स्पष्ट कहते हुए का ज्ञान और एक अस्पष्ट अनियत का ज्ञान । एक ध्रुव पदार्थ का ज्ञान एक अध्रुव पदार्थ का ज्ञान, यों 28 प्रकार के ज्ञान बारह-बारह प्रकार के होते हैं । इस प्रकार मतिज्ञान के 336 प्रकार हैं ।


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