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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 449

From जैनकोष



प्रसृतं बहुधाऽनेकैरंगपूर्वै: प्रकीर्णकै: ।

स्याच्छब्दलांछितं तद्धि श्रुतज्ञानमनेकथा ॥449॥ श्रुतज्ञान का वर्णन ― श्रुतज्ञान 11 अंग 14 पूर्व और 14 प्रवीर्ण अर्थात्​ अंग बाह्य इनके भेदों से बहुत प्रकार के भेद वाला है । जिसे श्रुतज्ञान कहो, आगमज्ञान कहो । इन सब ज्ञानों में स्यात्​ शब्द का चिन्ह पड़ा हुआ है । किसी अपेक्षा से ऐसा है, इस अपेक्षा से ऐसा है, यों ाअपेक्षा लगाकर ज्ञान की बात का प्रकाश करना यह है स्यात्​वाद । स्यात्​ शब्द संस्कृत में है उसका अर्थ है अपेक्षा से । लेकिन हिंदी उर्दू में एक शब्द है ‘सायद’ । यह शब्द बड़ा प्रसिद्ध है । तो सकल सूरत से स्यात्​ शब्द की सदृशता ‘सायद’ शब्द में मिली । कुछ लोग स्यात्​ का सायद अर्थ लगाकर एकदम संसयवाद जैसी सकल स्यात्​वाद बना देने हैं । जैसे कहा तो यों जाता कि जीव स्यात्​ नित्य ही है, जीव स्यात्​ अनित्य ही है, जिसका अर्थ तो यह है द्रव्यदृष्टि की अपेक्षा से जीव नित्य ही है, पर्यायदृष्टि की अपेक्षा में जीव अनित्य ही है । लेकिन स्यात्​ का अर्थ सायद करके अपने आपको ठगना और दूसरों को भी परेशानी में डालना यह ही बनता है । तो विरुद्ध अभिप्राय के लोग यों अर्थ लगाते हैं सायद जीव नित्य है, सायद जीव अनित्य है । इसमें कोई निश्चय नहीं है ऐसी प्रसिद्धि करते हैं । स्यात्​वाद में इतनी दृढ़ता के साथ निश्चय की बात कही जाती है जिसमें शिथिलता और संशय का रंच भी स्थान नहीं है । स्यात्​ नित्य: अस्ति इसका अर्थ है ― जीव द्रव्यदृष्टि से नित्य ही है, संशय का रंच स्थान नहीं है और न शिथिलता की बात है । किसी पुरुष के संबंध में यदि यह कहा जाये कि यह अमुकचंद का ही पुत्र ही है और अमुकप्रसाद का पिता ही है निश्चय हुआ या संशय ? इसमें निश्चय हुआ । दृष्टि लगाकर पूर्ण निश्चस के साथ बताने का नाम स्यात्​वाद है । स्यात्​वाद में भी शब्द का प्रयोग नहीं है । जैसे कि लोग भी शब्द करके प्रसिद्ध करते हैं । जीव नित्य भी है जीव अनित्य भी है । भी जैसी शिथिलता का स्थान नहीं है स्यात्​वाद में किंतु जीव द्रव्यदृष्टि से नित्य ही है, ही का स्थान है । निश्चयात्मक ज्ञान ही प्रमाण होता है । अनिश्चय ढीलपोल वाला ज्ञान प्रमाण नहीं माना जाता । हाँ जो लोग दृष्टियों से अपरिचित हैं उनके समक्ष यदि भी लगाकर भी कहा जाये तो जानने वाले भी के साथ जानें तो गलत है । भी लगाकर बोलने पर भी कहने वाले और सुनने वाले को ही लगाकर समझना चाहिए । नित्य भी है इसका अर्थ यों समझना कि द्रव्यदृष्टि से ही नित्य ही है, इसके अलावा दूसरी भी बात है । और, वह बात है ― पर्यायदृष्टि से अनित्य ही है । यों स्यात्​ शब्द करके जो बसा हुआ ज्ञान है आगम का वह सब श्रुतज्ञान है ।


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