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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 450

From जैनकोष



देवनारकयोर्ज्ञेयस्त्ववधिर्भवसंभव: ।

षड्विकल्पश्र्च शेषाणां क्षयोपशमलक्षण: ॥450॥

अवधिज्ञान का प्रकाश और उसके प्रकार ― ज्ञान के 5 भेद कहे गए हैं ― मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान । मतिज्ञान और श्रुतज्ञान का तो वर्णन किया, अब अवधिज्ञान का वर्णन कर रहे हैं । अवधि शब्द का अर्थ है मर्यादा । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की मर्यादा लेकर जो प्रत्यक्ष ज्ञान होता है उसे अवधिज्ञान कहते हैं । यद्यपि मर्यादा मन:पर्याय में भी है किंतु रुढ़िवश इसका नाम अवधिज्ञान है । अवधिज्ञान के पहिले से जितने ज्ञान हैं उन सबमें मर्यादा पड़ी हुई है, अवधिज्ञान के बाद का ज्ञान केवलज्ञान है, उसमें मर्यादा नहीं पड़ी है । इस दृष्टि से 5 ज्ञानों का नं. यों आ गया ― मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, मन:पर्ययज्ञान, अवधिज्ञान और केवलज्ञान । अवधिज्ञान और अवधिज्ञान के पहिले से जितने ज्ञान हैं वे सब मर्यादासहित हैं और अवधिज्ञान के बाद का ज्ञान असीम है । इस दृष्टि से ऐसा नंबर होने पर भी चूँकि मन:पर्ययज्ञान सम्यग्दृष्टी के ही होता, संयमी के ही होता पूज्यता विशेष । केवलज्ञान के बाद ज्ञानी में पूज्यता मन:पर्ययज्ञान की है, इस कारण मन:पर्ययज्ञान का नंबर तीसरे से हटाकर चौथे नंबर पर किया है । इस तरह की व्यवस्था इस दृष्टि से बनी है । अवधि का अर्थ है मर्यादा । अवधिज्ञान में एक खासियत यह भी है कि जानता तो है यह चारों ओर की बातें किंतु नीचे का क्षेत्र ज्यादा होता है, ऊपर का क्षेत्र कम होता है । अवधिज्ञानी जीव जितना ऊपर की चीज जानेगा उससे कई गुनी नीचे की चीज जानेगा । यह अवधिज्ञान में एक प्रकृति पड़ी हुई है । अवधिज्ञान के दो भेद हैं ― भवप्रत्यय और लब्धिप्रत्यय । भवप्रत्यय का अर्थ है उस भव को पाकर नियम से अवधिज्ञान हो उसे भवप्रत्यय अवधिज्ञान कहते हैं । और, लब्धिप्रत्यय अवधिज्ञान उसे कहते हैं कि अवधिज्ञानावरण का क्षयोपशम पाकर इस योग्यता के ही कारण जो ज्ञान होता है वह लब्धिप्रत्यय अवधिज्ञान है । यद्यपि भवप्रत्यय अवधिज्ञान में भी भवप्रत्यय अवधिज्ञान चाहिए । अवधिज्ञानावरण का क्षयोपशम हुए बिना अवधिज्ञान होता नहीं है, किंतु देव और नारकियों का भव उन्हें ही मिलता है जिनके अवधिज्ञानावरण का क्षयोपशम भी हो जाता है । अथवा उस भव में जन्म लेने वाले जीव की एक यह विशेषता है कि अवधिज्ञानावरण का भी क्षयोपशम उसके होता है । तो लब्धिप्रत्ययमात्र से अवधिज्ञान हो उसकी अपेक्षा भवप्रत्यय में एक भव की विशेषता भी पायी गई, अतएव लब्धिप्रत्यय की दोनों जगह समानता होने से भव की खासियत की प्रधानता से भवप्रत्यय नाम रखा है । भवप्रत्यय अवधिज्ञान विशेष अधिक विशुद्धि को लिए हुए नहीं होता । परमावधि, सर्वावधि जैसा ज्ञान जिसके प्राप्त होने पर उसी भव से नियम से मुक्त हो जाता है वह लब्धिप्रत्यय अवधिज्ञान ही है । भवप्रत्यय अवधिज्ञान में उतनी उत्कृष्टता नहीं होती । भवप्रत्यय अवधिज्ञान देव और नारकियों के होता है और लब्धिप्रत्यय अवधिज्ञान शेष जीवों के होता है अर्थात्​ संज्ञी पंचेंद्रिय तिर्यंचों और मनुष्यों के होता है ।

लब्धिप्रत्यय अवधिज्ञान के प्रकार ― लब्धिप्रत्यय अवधिज्ञान के 6 भेद हैं ― अनुगामी, अननुगामी, वर्द्धमान, हीयमान, अनवस्थित, अवस्थित । जिस भव में अवधिज्ञान हुआ है या जिस क्षेत्र में जिस स्थान पर अवधिज्ञान हुआ है उस भव के त्यागने के बाद भी उस स्थान से हटने के बाद भी अवधिज्ञान बना रहे ऐसे अवधिज्ञान को अनुगामी अवधिज्ञान कहते हैं । और क्षेत्रांतर में अवधिज्ञान मिट जाये ऐसे अवधिज्ञान को अननुगामी अवधिज्ञान कहते हैं । जिस डिग्री में अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ है उससे बढ़ता ही जाये उसे वर्द्धमान अवधिज्ञान कहते हैं और जिस डिग्री में अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ है उससे घटता ही जाये उसे हीयमान अवधिज्ञान कहते हैं । और जितने रूप में अवधिज्ञान प्रकट हुआ है उतनें में ही रहा करे उसे अवस्थित अवधिज्ञान कहते हैं और जो कभी घटे कभी बढ़े उसे अनवस्थित अवधिज्ञान कहते हैं । इस प्रकार लब्धिप्रत्यय अवधिज्ञान के 6 भेद हैं । सम्यग्ज्ञान के प्रकरण में प्रयोजनीभूत तो वस्तुस्वरूप का ज्ञान है, भेदविज्ञान है, तत्त्वज्ञान है फिर भी किसी भी ज्ञान की विशदता के लिए अनेक प्रकार के संबंधित ज्ञान भी हों तो उसमें स्पष्टता विशेष होती है । अधिक जानकर पुरुष छोटी से छोटी चीज का भी ज्ञान रखता है और कम जानकार पुरुष भी अपने प्रयोजन की बात का ज्ञान रखता है, फिर भी उन दोनों के ज्ञान की विशदता में अंतर है । ज्ञान कैसे होते, कितने होते, इसका स्वरूप, इसकी परिस्थितियाँ विज्ञात हों तो प्रयोजनीभूत ज्ञान की विशदता भी विशेष होती है, अतएव ये सब भेद प्रभेद यहाँ कहे जा रहे हैं ।


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