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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 781

From जैनकोष



अनुपास्यैव यो वृद्धमंडलीं मंदविक्रम:।

जगतत्त्वस्थितिं वेत्ति स मिमीते नभ: करै:।।

वृद्धमंडली की उपासना के बिना तत्त्ववेदन की असंभवता- कोई मनुष्य अल्पशक्ति वाला है और सत्पुरुषों की मंडली में रहे बिना ही, सत्संगति की उपासना किए बिना ही यदि वह जगत के तत्त्वस्वरूप को जानना चाहता है तो वह मानो हाथों से आकाश को मापना चाहता है। जैसे- हाथों से कोई आकाश को माप सकता है क्या? अरे हाथों की बात तो दूर रहो उसका हिसाब तो योजनों से भी नहीं है। अनंत योजन आकाश है। अथवा माप ही क्या आकाश का तो क्या कहीं अंत भी नहीं है ऐसे अनंत आकाश को कोई हाथों से मापना चाहे तो असंभव बात है। इसी प्रकार सत्पुरुषों की मंडली की उपासना किए बिना ही कोई अल्पशक्ति वाला पुरुष तत्त्वस्वरूप को जानना चाहे और उस मार्ग में लगना चाहे तो वह असंभव बात है। सत्पुरुषों की सेवा के बिना अल्पशक्ति वाले पुरुष को जगत की रीतिनीति का भी ज्ञान नहीं हो सकता है। लौकिक कलाकारों में भी देखा होगा जिस परंपरा में जिस कुल में परंपर्या बात चली आयी है किसी कला की, मान लो काष्ठकला की या स्वर्णकला की अथवा संगीतकला की तो उस कुल में उत्पन्न हुए मनुष्यों की वह कला बड़ी सुगमतया से अभ्यस्त हो जाती है। क्या किसी विद्यार्थी को ऐसा भी देखा है कि सत्संगति के बिना, गुरुवों की सेवा के बिना, गुरुवों के उपदेश शिक्षा पाये बिना स्वयं ही निपुण बन गया हो? ऐसा यदि कोई हो सकता है तो बिना सीखे ही विद्या का अधिपति हो जाय तो हो जाय, मगर स्वयं ही सीख कर विद्या का अधिपति नहीं बन पाता है। तीर्थंकर जैसे महापुरुष बिना सीखाये ही ज्ञाता बन जाते है वह तो अलग बात है किंतु किसी आधार के बिना स्वयं ही सीखकर कला का अधिपति बने यह बात कठिन है, फिर अध्यात्म की बात तो सत्संगति से इतना संबद्ध है कि कोई मंद बुद्धि वाला पुरुष अभिमान में आकर थोड़ा सा ज्ञान पाकर यह हठ करे, अभिमान न करे कि मैं तो स्वयं ही अपने बल पर कल्याण कर लूँगा। ज्ञान क्या करें? कुछ चारित्र भी तो चाहिए, संयम की प्रेरणा भी तो चाहिए। वह बात सत्संग से स्वयं सिद्ध होती है।

वृद्धसेवा से अनूठे अनुभवों की प्राप्ति- वृद्धसेवा का बड़ा महत्त्व है। जो जिस कार्य में अनुभवी है उस अनुभवी मनुष्य की संगति से उस कार्य की निपुणता प्राप्त हो सकती है। केवल शब्दों की जानकारी कर लेने मात्र से अथवा कुछ साहित्यकला याद कर लेने मात्र से तत्त्व का मर्म नहीं पाया जा सकता है । कोई एक सेठ था, उसने एक जगह धन गड़ा दिया और बहियों में लिख दिया कि ऐ पुत्रों ! तुम्हें कभी कठिन गरीबी आ जाय तो मंदिर की सिखर में बहुत धन गड़ा है उसे तुम माह सुदी पूर्णिमा के दिन 4 बजे शाम को निकाल लेना। सेठ तो गुजर गया। लड़के गरीब हो गए। वह बही उनके हाथ लगी। सोचा कि माह सुदी पूर्णिमा को 4 बजे शाम को इस सिखर में से धन निकालेंगे। वह चढ़ गया मंदिर पर उसी दिन पौने 4 बजे के करीब में और सिखर तोड़ने लगा तो नीचे से कोई बुजुर्ग जा रहा था। उसने पूछा- भाई तुम क्या कर रहे हो? बोला- इसमें पिताजी ने लिख दिया है कि माह सुदी पूर्णिमा को 4 बजे दिन को इस सिखर से धन निकाल लेना, सो मैं धन निकालने आया हूँ। वह वृद्ध पुरुष समझ गया, कहता है अरे मूर्ख नीचे उतर, हम तुझे बतावेंगे कि वह धन कहाँ है? वह नीचे उतरा तो वह बूढ़ा उसे उसके ही घर ले गया और जहाँ पर उस सिखर की छाया पड़ रही थी उस जगह खोदकर धन निकालने को कहा। जब उस जगह उसने खोदा तो वह धन निकला। तो देखो उन शब्दों को ही समझकर उन लड़कों ने अर्थ लगाया था, उनकी समझ गलत थी क्या? जैसा शब्दों में अर्थ लिखा हुआ था उसी के अनुसार ही तो काम कर रहे थे। कोई गलती तो नहीं की थी, पर उनके अनुभव न था। वे इस बात को न सोच सके कि यदि सिखर में धन होता तो यह समय क्यों निश्चित करते धन निकालने के लिए? वह तो किसी भी दिन किसी भी समय खोदा जा सकता था। लेकिन वह वृद्ध पुरुष अपने अनुभव से झट समझ गया। तो वृद्ध पुरुषों के सेवा बिना ये बातें प्राप्त नहीं होती।

वृद्ध सेवा में वृद्धों के अनुभव से लाभ उठाने का अनुरोध- एक कथानक है कि कोई एक बारात कहीं से आनी थी। तो लड़की वालों ने कहला भेजा कि हमारे यहाँ बारात में सारे जवान लोग आयेंगे, कोई बूढ़ा न आयगा। इस बात पर बुजुर्गों ने सोचा कि हम लोगों को बारात में जाने के लिए क्यों मना किया गया है? न ज्यादा खाते, न किसी को सताते, न हमारे ज्यादा इच्छायें पर हमें क्यों मना किया गया है? सो एक बूढ़े ने किसी जवान से कहा कि एक संदूक ऐसी लावो जिसमें सांस लेने के लिए छेद हो, उसमें हमको बंद कर देना और वही बारात में लिए चलना, पता नहीं, कहो जवानों को तंग करने के लिए ऐसा किया हो। सो बारात में सभी जवान पहुँच गए। वह संदूक भी पहुँच गया। जब नाश्ता करने का समय आया तो लड़की वाले ने पूछा कि कितने बाराती कुल आये हैं? बताया मानो 25 बराती कुल हैं। तो लड़की वाले ने करीब तीन तीन पाव की 25 भेली उनके सामने रख दी और कह दिया कि ये सब भेलियां एक-एक तुम सबको खानी पड़ेगी। इस बात को सुनकर सभी हैरान हो गए। सोचने लगे की यह तीन तीन पाव के करीब की भेलियां एक-एक जवान कैसे खा पायेगा? बाद में उसी वृद्ध पुरुष से जाकर कुछ जवानों ने उस समस्या को रख दिया। तो वृद्ध पुरुष ने बताया कि तुम लोग ऐसा करना कि चलते-फिरते, खेलते-कूदते, हँसते-बतलाते सभी भेलियों में से थोड़ी-थोड़ी नोच नोचकर खाना तो खा डालोगे, नहीं तो एक एक भेली नहीं खा सकते। तो उन सब जवानों ने वैसा ही किया। सारी भेलियां थोड़ी ही देर में खा गए। तो वृद्ध पुरुषों के अनुभव कुछ विलक्षण ही किस्म के होते हैं। और, अनुभव होने का कारण भी यही है कि सारी जिंदगीभर ये खेलतमाशे देखते रहते हैं। सब परिस्थितियों का अनुभव कर डाला है तो उन्हें अनुभव तो होगा ही। ऐसे ही आत्मज्ञान और आत्मध्यान के संबंध में जिन वृद्धों ने सब तरह की स्थितियों का मुकाबला किया और आत्मध्यान के योग्य अनेक वातावरण बना-बनाकर प्रयोग किया तो उन्हें सब स्थितियों के सब उपायों का अनुभव हो जाता है, ऐसे अनुभवी साधु संत पुरुषों के निकट बैठकर उनके जो उपदेश सुने उसे थोड़ी ही देर में सारभूत तत्त्व की परख आ जाती है। जो पुरुष मंद विक्रमी है, जिसके बल ज्ञान के, शरीर के कम हैं ऐसा पुरुष चाहे कि वृद्ध मंडली की उपासना न करके, उनके निकट न रहकर, उनको अपना चित्त न सौंपकर जगत के तत्त्वस्वरूप को जानना चाहे तो उसका कार्य ऐसा है जैसा कि वह हाथों से आकाश का माप करे। तत्त्व के यथार्थ परिज्ञान के लिए आवश्यक है कि हम ज्ञानी, तपस्वी, अभ्यस्त पुरुषों की सेवा में अधिकाधिक रहे।


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