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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 782

From जैनकोष



शीतांशुरश्मिसंपर्काद्विसर्पति यथांबुधि:।

तथा सद्वृत्तसंसर्गान्नृणां प्रज्ञापयोनिधि:।।

सत्संग से प्रज्ञा का विसर्पण- जिस प्रकार चंद्रमा की किरणों के संपर्क से समुद्र बढ़ता है उस ही प्रकार समीचीन चारित्र के धारण करने वाले संत पुरुषों के संसर्ग से मनुष्यों का प्रज्ञारूपी समुद्र बढ़ता है। निमित्तनैमित्तिक संबंधवश जैसे शुक्लपक्ष में चंद्रमा की शीतल किरणों के संपर्क से समुद्र में जलवृद्धि हो जाती है ऐसे ही समझिये कि सच्चरित्र पुरुषों के संसर्ग से मनुष्य का ज्ञानसमुद्र भी बढ़ने लगता है। आत्मा तो ज्ञानस्वरूप है ही, विकास की भी बात क्यों कही जाय। यह तो स्वयं ही ज्ञानरूप है, किंतु मोह रागद्वेष विकार परिणाम होने के कारण ज्ञानविकास रुका हुआ है। स्वयं यह ज्ञानमय है। ज्ञान को छोड़कर आत्मा का और स्वरूप क्या है? जो लोग आत्मा के अस्तित्व का निषेध करते हैं वे ऐसा ही तो समझना चाहते हैं कि जैसे खंभा, चौकी, पुस्तक ये पिंड पदार्थ समझ में आ रहे हैं ऐसा पिंडभूत कोई आत्मा होगा, और यों समझ में नहीं आता तो वे निषेध करते हैं, आत्मा कुछ चीज नहीं है। यदि इस दिग्दर्शन के साथ चलें कि जो ज्ञानप्रकाश है उस ही का नाम आत्मा है। इस दृष्टि से आत्मस्वरूप को समझाने के लिए बढ़ेंगे तो उन्हें आत्मा के अस्तित्व का परिचय नहीं हो सकता। लोग वह निरखना चाहते हैं इंद्रियों से। जैसे, आँखों से ये सब पदार्थ दिखते हैं ऐसे ही इन स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र आदि इंद्रियों के द्वारा इस आत्मतत्त्व को जानना चाहते हैं। जैसे हाथों से छूकर हम बता देते कि यह हाथ है, यह पैर है, यह अमुक चीज है इस तरह से इस आत्मतत्त्व को नहीं बताया जा सकता है। तब इस मार्ग से चलें कि जो जानते हैं उतने का ही नाम आत्मा है। ऐसा भी सोचने में गड़बड़ हो जाता है कि जिसमें ज्ञान है वह आत्मा है। क्योंकि ऐसा सोचकर वह ज्ञान से भिन्न किसी एक के निरखने का यत्न करेगा कि किसमें ज्ञान है। और सोचा तो यों विदित होगा कि देह में ज्ञान है। तो इतना भी घूमकर जतलाने का यत्न न करें, किंतु जो ज्ञानप्रकाश है, ज्ञानप्रकाश है वही आत्मा है, ऐसी दृष्टि लेकर जब कोई जाननस्वरूप को ही जानने में लग जायगा तो उसे ज्ञानप्रकाश का अनुभव होगा और उस अनुभूति के साथ-साथ अपरिमित निरपेक्ष शुद्ध आनंद का भी अनुभव होगा, और तब समझ लेंगे कि सर्व आनंदमय पूर्ण प्रकाशमय तो यह मैं स्वयं ही हूँ। ऐसा ज्ञानमात्र यह आत्मा है लेकिन अत्यंत भिन्न असार परवस्तुवों में जो झुकाव है, उलझन है, ममता है, रागद्वेष जगता है, इन विकारों के कारण यह ज्ञान का विकास रुका हुआ है। ज्ञान बढ़ाने के लिए साक्षात् उपाय यही होना चाहिए कि मोह रागद्वेष विकार हटें, गंदे विचार न जगें, विषयों के भोगने के भाव न बनें, लोक में सबका मैं नायक रहूँ इस प्रकार की वांछा न जगे, तृष्णा लालच परिग्रह का परिणमन न बने तो स्वयमेव की यह ज्ञानविकास को प्राप्ति हो जायगा। जिस किसी भी उपाय से हम ज्ञान बढ़ाना चाहते हैं उस उपाय में भी यह तरकीब छिपी हुई है कि मेरे मोह रागद्वेष हट जायें। तो मोह रागद्वेष दूर होने का एक सुगम उपाय है वृद्धसेवा। जो तपश्चरण ज्ञान संयम विवेक धैर्य में बढ़े चढ़े है ऐसे पुरुषों के निकट रहना, उनकी सेवा उपासना करना इससे तत्काल प्रभाव होता है और मोह रागद्वेष दूर होते हैं। इन विकारों के दूर होने पर यह ज्ञानविकास होने लगता है। तब समझ लीजिए कि जैसे चंद्रमा की शीतल किरणों के संसर्ग से समुद्र बढ़ा, ऐसे ही वृद्ध पुरुषों के संसर्ग से ज्ञान की वृद्धि होती है।

असत्संग की अहितकारिता- असत्संग के समान लोक में कोई विडंबना नहीं है। लोक में एक टूटी फूटी संस्कृत में कहावत है कि पंडित, शत्रु भलो न मूर्ख: हितकारक:। अगर समझदार है, पंडित है, ज्ञानी है और किसी प्रसंग में उससे कुछ विरोध हो गया है तब भी वह भला है, और कोई पुरुष मूर्ख है, बुद्धि प्रतिभा कुछ नहीं है, सही अर्थ भी नहीं लगा सकता ऐसा मूर्ख पुरुष चाहे हार्दिक मित्र हो तो भी वह हितकारी नहीं है। अपने अपने जीवन प्रसंग में कुछ न कुछ सभी ने अनुभव कर भी लिया होगा। मूर्खों का संग भी हो तो वहाँ अनेक विडंबनाएँ भोगनी पड़ती हैं। वह मूर्ख यद्यपि मित्र के भले के लिए कुछ करना चाहता है किंतु उसके ही किए जाने से मित्र का अनर्थ हो जाता है। तो असत्संग से बढ़कर और विडंबना की बात क्या हो सकती है और सत्संग से बढ़कर लाभ की बात और क्या हो सकती है? जितने भी निसंग तत्त्व में लाभ होते हैं वे सब सत्संग के आधार से पुष्ट होकर हुआ करते हैं। जिन्हें बचपन में ही सत्संग बन जाय तो उनकी भावना उच्च बनती है और भावना में ही समृद्धि है, उनके फिर सही चारित्र के कारण ये लोक के और परलोक के लाभ मिल जाते हैं और जिन्हें बचपन में असत्संग मिला उनकी असद्वृत्ति और प्रकृति बन जाती है। अंत में उन्हें दु:ख भोगना पड़ता है। सभी की यही बात है। जवानी अवस्था में तो ज्ञानी संत पुरुषों का समागम प्राप्त होता रहे तो उससे मन काबू रहता है, मन सत्पथ पर चलता है। एक तो वैसे ही विडंबना की जड़ जवानी है और फिर मिल जाय असत्संग तो वे शीघ्र पतन की ओर चले जाते हैं। वृद्धसेवा का बड़ा महत्त्व है। सत्संग के प्रताप से मनुष्य का ज्ञान समुद्र यों बढ़ता है जैसे चंद्रमा की शीतल किरणों के संसर्ग से समुद्र वृद्धि को प्राप्त हो जाता है। हमें अपनी ज्ञानोन्नति के लिए यह कर्तव्य करना चाहिए कि हम ज्ञानी, तपस्वी, संयमी, विवेकी, धीर संत पुरुषों का समागम करते रहें और लाभ उठायें।


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