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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 783

From जैनकोष



नैराश्यमनुबध्नाति विध्याप्याशाहविर्भुजं।

आसाद्य यमिनां योगी वाक्पथातीतसंयमम्।।

सत्संग में नैराश्यामृत के पान का अवसर- संयमीजनों की संगति से योगी आशारूपी अग्नि को बुझाकर निराशा का आलंबन करते हैं। भाव दो प्रकार के हैं- एक आशा रूप भाव, दूसरा नैराश्यभाव। जिस परिणाम में किसी परवस्तुविषयक आशा लगती है उस परिणाम का नाम है आशा और जहाँ समस्त विकारों से रहित चैतन्यमात्र निज अंतस्तत्त्व का अनुभव होता है उस परिणाम को कहते हैं नैराश्य। इस जीव पर संकट अज्ञान का छाया है। अज्ञान न हो फिर जीव पर कोई विपदा ही नहीं है। अज्ञान की दो धारायें निकलती हैं- एक तो परवस्तु को यह मैं हूँ, इस प्रकार मानना और दूसरी धारा है परवस्तु को मेरी है यों मानना। इनका नाम है अहंकार और ममकार। ममकार भाव से भी अहंकार भाव विकट होता है। यह वस्तु मेरी है, ऐसा कहने में इतनी तो फिर भी बात आयी कि मैं मैं हूँ, यह यह है और यह मेरा है। इसमें कुछ थोड़ा सा फर्क आया। अज्ञान तो बराबर है लेकिन परवस्तु को यह मैं हूँ ऐसा मानना यह कोरा अज्ञान है, अहंकार है। अहंकार और ममकार इन दोनों के संबंध से आत्मा में आशा विकार का उदय होता है। आशारोग से ग्रस्त यह मोही प्राणी कहीं भी अपने उपयोग को स्थिर नहीं कर पाता है, इसका कारण है कि पर तो पर ही है।

सत्संग में शांतिलाभ का अवसर- संसार में प्रत्येक जीव शांति चाहता है। जैसे मनुष्यों की आकृति उत्पत्ति प्रकार आदिक सब एक समान है, चाहे वह भारतदेश का हो, चाहे विदेश का हो, ऐसे ही समझिये कि देह में जो जाननहार आत्मा है जीव है तो जितने भी जीव हैं उन सब जीवों का स्वरूप एक प्रकार का है, इसी कारण किसी जीव से किसी जीव में कुछ अंतर नहीं है और उपाधि के भेद से जो अंतर आया है ऐसा भेद और अंतर भी एक समान प्रकार का है, विधिवत् है। जीव में खोटे परिणाम आने का साधन एक ही तरह का है। कर्मों का उदय हुआ, संसार के ये पदार्थ सामने हुए कि जीव को क्रोध आने लगता है। चाहे वह किसी भी देश का जीव हो, क्रोध आने की सामान्यपद्धति भी समान है, इसी तरह मान, माया, लोभ की भी पद्धति सबकी एक समान है। संसार के सभी लोगों को देखो- दुकानदार, नौकरी करने वाले, रिटायर लोग सभी एक ढंग से दु:खी होते हैं। सबके दु:ख के मूल में मोह रागद्वेष पड़ा हुआ है। जो भी जीव दु:खी है वे मोह के कारण से दु:खी हैं। मोह में जीव चाहता तो शांति है पर इस अशांति के काम में शांति कैसे मिले? खून के दाग को क्या खून से ही साफ किया जा सकता है? नहीं किया जा सकता। यों ही मोह से उत्पन्न हुई इस अशांति को क्या इस मोह से दूर किया जा सकता है? जिन्हें शांति चाहिए उन्हें सर्व पर से न्यारे निज ब्रह्मस्वरूप का दर्शन करना चाहिए, यह तो है साक्षात् साधन और बाहर में जो इस प्रकार के ज्ञानी विरक्त संयमी साधु हों उनकी संगति करना चाहिए। संयमी मनुष्यों की संगति से आशा नष्ट हो जाती है और निराशा प्रकट होती है, शांति प्रकट होती है। जहाँ आशा नहीं रहती है ऐसे पुरुषों के समीप बैठें, जहाँ पाप नहीं है ऐसे मनुष्यों के समीप बैठें तो वहाँ पुण्य और शांति प्राप्त होती है। ऐसे ही पुरुषों का नाम है वृद्ध। अवस्था में वृद्धता की बात नहीं कह रहे, जो ज्ञान में बढ़े हैं, तपस्या में बढ़े हैं, जिनके गंभीरता है, जो सभी जीवों को निरखकर समानता का बर्ताव करते हैं ऐसा जिनके ज्ञान है ऐसे पुरुषों का नाम है वृद्ध और उन सज्जनों की सेवा करने से सर्व क्लेश दूर होते हैं और शांति निराकुलता प्रकट होती है।

क्षणमात्र भी परमार्थ सत्संग से अलौकिक लाभ की संभूति- कोई साधु जंगल से जा रहा था नगर में चर्या करने, तो एक लकड़हारा, जिसके पास एक पतली धोती भर थी वह साधु के पीछे लग गया यह देखने के लिए कि यह नग्न भेष वाला साधु देखें कहाँ जाकर क्या करता है? जब साधु नगर में पहुँचा तो वहाँ लोग बड़ा स्वागत करने लगें। कुछ और निकट चलकर लकड़हारे ने साधु महाराज का वह स्वागत देखा। लोगों ने साधु महाराज को विधिपूर्वक आहार कराया और यह जानकर कि इनके साथ में यह कोई ब्रह्मचारी होगा उस लकड़हारे को भी आहार कराया। अब वह लकड़हारा सोचता है कि यह तो बड़ा अच्छा काम है, इनके साथ ही हमें रहना चाहिए। सो उनके साथ ही वह जंगल में चला गया। साधु महाराज ने तो एक दो दिन का उपवास किया। सो लकड़हारा कहता है, महाराज कल की तरह आज फिर नगर चलो। साधु महाराज बैठ गये अपने ध्यान में। वह बोला कि यदि आप नहीं जाते तो अपना पिछी कमंडल दो मैं जाता हूँ। पिछी कमंडल उठाकर वह नगर में पहुँचा। नगर में लोगों ने देखकर उसका बड़ा स्वागत किया, पड़गाहकर जब आहार करने ले गए तो उस दिन उसने विशेष स्वागत पाने की खुशी में अल्प आहार किया। लोगों ने सोचा कि आज शायद कोई विधि बिगड़ गई है इससे आहार कम किया है। दूसरे दिन फिर उस लकड़हारे ने वैसा ही किया। साधु महाराज का पिछी कमंडल लेकर नगर पहुँचा। उस दिन करीब 50 चौके लगे थे, उस दिन के स्वागत की खुशी में उसने भोजन ही न किया और जंगल में साधु के पास आकर बैठ गया। मुनि महाराज ने अपने ज्ञान से जाना कि यह बड़ा भव्य पुरुष है, मंदकषायी है और निकट ही इसका मोक्ष होगा, इसको उपदेश देना चाहिए। साधु ने कहा- अरे भव्य तेरे दो तीन दिन और शेष रह गए हैं, अब तू अपने भव्य परिणाम कर। समता से रह और साधुव्रत अंगीकार कर। तो उसने वहाँ साधु दीक्षा ली और फिर सोचा कि अब दो दिन की आयु हमारी शेष है तो दो दिन के लिए हमारा आहार का त्याग है। यों चार-पाँच उपवास उसने साधुव्रत में किये, यों मरकर वह स्वर्ग में उत्पन्न हुआ। तो थोड़ी सी सत्संगति का यह परिणाम हुआ। सत्संगति में रहने से सभी काम स्वत: बन जाते हैं। जो कुसंगति को छोड़कर सत्संगति में रहता है वृद्ध पुरुषों की सेवा उपासना करता है उसको बाह्यसमागमों की इच्छा नहीं रहती। सत्संगति का प्रभाव ही ऐसा है। सत्संगति को पाकर बड़े-बड़े राजा महाराजा भी साधुव्रत को लेकर आत्मकल्याण करते हैं। यों संयमी पुरुषों की संगति में रहने से अशांति दूर हो जाती है, सत्संगति में रहकर अपना भी अभ्यास कर लिया जाता के मैं आत्मा क्या हूँ, क्या करना चाहिए, वह सब भी उसे भान हो जाता है तो उसे वास्तविक शांति प्राप्त होती है।


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