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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 785

From जैनकोष



सुलभेष्वपि भोगेषु नृणां तृष्णा निवर्तते।

सत्संसर्गसुधास्यंदै: शश्वदार्द्रीकृतात्मनाम्।।

सत्संगसुधास्यंद से तृष्णादाह का शमन- सज्जन पुरुषों के संसर्ग से ऐसी अमृत की झरना प्रकट होती है कि जिस अमृत के झरने से भीगा हुआ पुरुष इतना शांत हो जाता है कि उसे भोगों में तृष्णा का भाव नहीं रहता है। सबसे बड़ी ज्वाला है तृष्णा। तृष्णा को सभी जानते। तृष्णा कहो, लोभ कहो, लालच कहो, अपने आपके इंद्रियविषयों की मूर्ति के लिए जो भी बाह्यवस्तुओं का संचय किया जाय उसका नाम तृष्णा है। तृष्णा एक कठिन ज्वाला है, तृष्णा करने वाला पुरुष रात दिन बेचैन रहता है। शरीर की वेदना में तो उसे सहनशीलता हो जाती है, पर तृष्णा की वेदना जगे तो निरंतर आकुलता रहती है। एक मनुष्य बाजार में चला, उसे थी एक नारियल की जरूरत। तो बाजार में उसने पूछा कि नारियल क्या भाव दोगे? दुकानदार बोला- 8 आने में देंगे। तो वह कहता है कि 4 आने में न दोगे? दुकानदार बोला- अगर चार आने का चाहिए तो नागपुर चले जावो, वहाँ चार आने का मिलता है। उसने नागपुर जाकर पूछा- नारियल कितने में दोगे?...बोला चार आने में। ...दो आने में न दोगे? ...दो आने का चाहिए तो बंबई चले जावो। उसने बंबई जाकर पूछा नारियल कितने में दोगे? बोला दो आने में। एक आने में न दोगे? ...एक आने का लेना हो तो पास के देहातों में चले जावो। वहाँ जाकर पूछा- नारियल कितने में दोगे? बोला एक आने में देंगे। आध आने में न दोगे?...अरे आध आना भी क्यों खर्च करते हो, पास में वे पेड़ खड़े हैं तो जितने चाहो तोड़ लावो। वह पास के पेड़ों में पहुँचा, चढ़ गया, पर ऊपर उसके पैर फिसल गए, सो एक डार पकड़कर लटक गया। अब वह सोचता है कि हम तो बिना मौत मरे। तृष्णा न करते तो यह हाल न होता। इतने में निकला एक हाथी वाला। उसने कहा भाई तुम हमें उतार लो तो हम तुम्हें 500) रु. देंगे। वह हाथी पर खड़ा होकर उसको पकड़कर उतारना चाहता था पर उस तक पहुँच न पाता था, करीब एक हाथ ऊपर था सो उचककर ज्यों ही उसके पैर पकड़ा त्यों ही हाथी खिसक गया। वह भी उसी में लटक गया। इतने में एक ऊँट वाला निकला सो वे दोनों कहते हैं कि हम दोनों को उतार लो, तुम्हें पाँच पाँच सौ रुपया देंगे। सो जब वह उन्हें उतारने चला तो वह भी पहुँच न सका, ज्यों ही उचककर पेड़ पकड़ा ज्यों ही ऊँट खिसक गया और वह भी उसी में लटक गया। अब इतने में निकला एक घोड़ा वाला, उससे वे तीनों कहने लगे कि हम तीनों को उतार लो, तुम्हें पाँच पाँच सौ रुपये देंगे। वह भी जब उतारने को हुआ तो घोड़े के खिसक जाने से उसी में लटक गया। तो यह एक तृष्णा की बात बताई जा रही है। तृष्णा करने से बड़ी-बड़ी विडंबनाएँ बन जाती हैं। ऐसे तृष्णा दहन का शमन सत्संगसुधा के झरने में स्नान किये बिना कैसे हो सकता हैं?

सत्संग में तृष्णाविनाश से शांतिलाभ का अवसर- तृष्णा के अनेक रंग होते हैं, उनसे ठगाया गया यह प्राणी आपत्तियाँ ही पाता है। कभी कोई सब्जी खरीदने आप बाजार जायें तो अगर सस्ती चीज खरीदना चाहो अथवा कुछ तृष्णा करना चाहो तो उसमें चीज रद्दी ही मिलती है। वह चीज बेकार हो जाती है। जैसे सेब कई किस्म के होते हैं कुछ 12 आने सेर के मिल जायेंगे और कुछ चार रुपये सेर के मिलेंगे। तो तृष्णा करके अगर कोई 12 आने सेर वाले सेब खरीद ले तो उसके वे सेब ही बेकार हो जायेंगे। बल्कि अच्छे वाले सेब अगर सेर भर की जगह एक पाव ही ले आता तो वह उन्हें प्रेम से खाता तो। तो यह तृष्णा करना योग्य नहीं है। इस तृष्णा के फल में अशुभ समय देखना पड़ता है। यह तृष्णा इस जगत के जीवों को परेशान किए हुए है। तो भोगों की तृष्णा ज्ञानी जीवों के नहीं रहती। वे भोग सुलभ भी हैं, अनायास प्राप्त होते हैं, पुण्य का उदय है तिस पर भी जिसे सच्चा ज्ञान जग गया कि इस जगत में सारभूत कुछ नहीं है। अपने आत्मा का सच्चा ज्ञान बने और इसमें ही अपना आचरण करें तो यही सारभूत चीज है। हमारे साथ रहने वाली समता है, और बाह्य में तो यह समस्त पदार्थ लुभाने वाले हैं, ये सब अनर्थ करने वाले हैं। तो जिनका आत्मा सज्जन पुरुषों की संगति से अमृत के झरने से गीला हो गया है अर्थात् ज्ञान की चर्या और चिंतन करने से जिनका हृदय योग्य बन गया है ऐसे पुरुषों को सुलभ भोगों में भी तृष्णा नहीं जगती है। जितना भी क्लेश है वह तृष्णा का है। तृष्णा दूर हो तो अवश्य शांति होगी। इन सब बातों के लिए हमें चाहिए कि हमें सत्संग मिलता रहे, दुष्ट पुरुषों का संग न करें। सत्संगति में रहने से यह जीवन भी सुखपूर्वक व्यतीत होगा और अगला जीवन भी सुखपूर्वक व्यतीत होगा।


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