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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 812

From जैनकोष



यदि विषयापिशाची निर्गता देहगेहात्

सपदि यदि विशीर्णो मोहनिद्रातिरेक:।

यदि यदि युवतिकरंके निर्ममत्वं प्रपन्नोझगिति ननु विधेहि ब्रह्मबीथीविहारम्।।

विषयपिशाच से दूर होकर ब्रह्मवीथी में विहार करने का अनुरोध- हे आत्मन् ! यदि तेरे देहरूपी घर से विषयरूपी पिशाचिनी निकल गई हो तो तू ब्रह्म की गली में यथेष्ट विहार कर, तुझे किसी भी प्रकार का विघ्न न होगा। कोई अटपट बोले तो उसे निरखकर लोग कहा करते हैं कि इसके पिशाचिनी लग गयी, भूत लग गये। और, आजकल तो यह बात बहुत देखने सुनने में आने लगी है कि जिस चाहे के भूत लग जाता है। और भूत लगने के साधनभूत हैं ऐसे कुछ तीर्थक्षेत्र। वे भूत लगवाते रहते हैं, किस तरह यह बात फैल गई कि वहाँ जावोगे तो भूत मिट जायेगा, तो पहला भूत तो यह मन में आ गया और फिर जरा सी अटपट बात बनी तो फिर उस पर भूत का संदेह हो जाता है। और, यह दिल का रोग ऐसा होता है कि झट इस बात पर दृष्टि जाती कि अरे भूत लग गया। और, भूत लगता अधिकतर किन्हें? महिलावों के। ऐसे सुनने में आया है कि पुरुषों के तो यह भूत कम लगता, पर महिलावों के ज्यादा लगता है। महिलावों के भूत लगने का कारण शायद यह हो कि देवरानी जेठानी को छकाने का उपाय बना लेती हो। भूत लग गया, अटपट बोलने लगी, लो देवरानी जेठानी सभी हाथ जोड़कर सामने बैठ जायेंगी। अरी तू कौन देवी है, बता तो सही, तू कैसे मेरा पिंड छोड़ेगी। तो शायद इस बात के लिए भूत सवार हो जाता हो। और, कुछ वह दिल का रोग इस किस्म का होता है कि उसे कुछ नहीं सुहाता, भौचक्का सा हो जाता है। कुछ ऐसी परिणति हो जाती कि जरा-जरा सी बात में इस इस तरह के भूतों का संदेह लोग बना लेते हैं। पर असली पिशाचिनी कौन है? वह है विषय। पंचेंद्रिय और मन का जो विषयभाव जगता है पिशाचिनी तो वह है। यदि यह पिशाचिनी इस आत्माराम से निकल गई है, देहरूपी घड़े से निकल गई है तो हे आत्मन् ! अब ब्रह्मचर्य अंगीकार करने में ढील मत कर। ब्रह्मचर्यरूपी किले में विहार कर अर्थात् ब्रह्म मायने आत्मा में आत्मस्वरूप में तू अपने उपयोग को निर्विघ्न होकर लगा, तेरे ध्यान की सिद्धि होगी। यदि मोहरूपी निद्रा का व्यतिरेक दूर हो गया हो तो तू इसके स्वरूप में विहार कर।

मोहनिद्रा भंग करके ब्रह्मवीथी में विहार करने का अनुरोध- जब तक मोह लगा रहता है तब तक जीव बेसुध रहता है। वह अपने में आया कहाँ से? मोह में बुद्धि भ्रष्ट सी हो जाती है, न्याय और अन्याय का कुछ विवेक नहीं रहता। मोह नाम है पदार्थ की स्वतंत्रता नजर में न आये और एक दूसरे का कुछ है, हितकारी है, इस प्रकार का संबंध समझ में आये, उस संबंध को ही तथ्यभूत मानना ऐसे परिणाम का नाम है मोह। मोह और राग में यही अंतर है। यद्यपि लगता ऐसा है कि किसी चीज में राग अधिक हो गया तो वह है मोह और राग कम है तो वह है राग, पर राग का स्वरूप और मोह का स्वरूप जुदा-जुदा है। पदार्थ जिस भाँति का है उस भाँति बोध न होना इसका नाम है मोह और प्रेमरूप परिणाम जगे तो उसका नाम है राग। अथवा यों कह लीजिए कि राग में भी राग जगे, राग को हटाने का भाव मन में न आये, उस राग को ही अपना स्वरूप माने उसका नाम है मोह। मोह न हो और राग रहे ऐसी भी स्थिति हो सकती है और मोह रहे, राग रहे ऐसा तो होता ही है। सम्यग्दृष्टि पुरुष ज्ञानी गृहस्थ, उसके भी राग है कि नहीं? अरे घर में रहे, घर के सारे व्यवहार करे, बोलचाल करे, तो राग तो है पर मोह नहीं है। मोह का संबंध अज्ञान से है। राग का संबंध प्रीति से है। कोई रईस पुरुष बीमार हो गया, बुखार आने लगा तो उसके आराम के लिए कितने-कितने उपाय रचे जाते हैं- अच्छा कोमल बिस्तर मिले, समय पर औषधि मिले, मित्रजन खूब दिल बहलायें, नौकर-चाकर बड़ी सेवा करें, डाक्टर भी बड़ी देखरेख करते हैं, बड़े आराम के साधन जुटाते हैं, यदि समय पर दवा न मिले तो वह बीमार पुरुष झुँझलाता भी है, कितना राग है उसे उस औषधि से? पर जरा सोचो तो सही कि क्या वह चाहता है कि मुझे सदा ऐसी औषधि का सेवन करने को मिले? क्या वह चाहता है कि इसी प्रकार आराम से हम रहें? अरे वह तो चाहता है कि कब ये सारे झंझट छूटें और मैं दो चार मील रोज रोज घूमूँ। तो उस बीमार पुरुष को उन सारी चीजों में मोह नहीं है, हाँ रागांश अवश्य है। ऐसे ही जो निर्मोह गृहस्थ हैं उनके भी परिस्थितिवश राग लगा रह सकता है और यह राग भी उसके सूखने के लिए रहता है, राग बढ़ाने के लिए वह राग नहीं करता। ज्ञानी गृहस्थ को तो राग कभी करना ही पड़े तो करता है राग, पर वह अंदर में ऐसा भाव रखता है कि हे भगवन् ! कब इस झंझट से मुझे छुटकारा मिले। वह तो उस राग से निवृत्त होना चाह रहा है। वह राग करते रहने के लिए राग नहीं करता बल्कि राग से निवृत्त होने के लिए राग करता है। तो हे आत्मन् ! यदि तेरे मोहनिद्रा की तीव्रता विपीर्ण हो गयी हो तो तू अब ब्रह्मवीथी में विहार कर। और, देख यदि युवती के शरीर में तू निष्पृहा को प्राप्त होता है तो शीघ्र ही इस ब्रह्मचर्य की गली में विहार कर। यदि इस तरह की तेरी तैयारी है, तेरे हृदय में स्वच्छता हुई है तो तू परमब्रह्मचर्य का पात्र है। अपने आत्मस्वरूप में मग्न होकर समस्त संकटों को दूर कर ले।


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