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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:ज्ञानार्णव - श्लोक 813

From जैनकोष



स्मरभोगींद्रदुर्वारविषानलरालितम्।

जगद्यै: शांतिमानीतं ते जिना: संतु शांतये।।

जगज्जयी जिनेंद्रदेव से शांतिकामना- यह इस प्रकरण का अंतिम श्लोक है। कामरूपी सर्प के दुर्निवार विषरूपी अग्नि की ज्वाला से जाज्वल्यमान इस जगत को जिन महात्मावों ने शांतरूप किया वे जिनेंद्र, वे योगीश्वर शांति करने वाले हों अथवा मुख्यतया शांतिनाथ, जितेंद्रनाथ का स्तवन कर लो। शांतिनाथ का दूसरा नाम है जगन्नाथ। और, यह नाम क्यों प्रसिद्ध हुआ कि शांतिनाथ भगवान कामदेव थे, चक्रवर्ती थे, 6 खंड के अधिपति थे और तीर्थंकर भी थे। तो किसी दृष्टि से 6 खंड के अधिपति होने से बड़े नाथ कहलाये और तीर्थंकर होने से तो तीन लोकों के नाथ कहलाये। शांतिनाथ की जगन्नाथ के नाम से भी प्रसिद्धि चली आयी है। जैसे चंद्रप्रभु का दूसरा नाम है सोमनाथ। सोमवार अर्थात् चंद्रवार। यह चंद्रवार सोमवार का पर्यायवाची शब्द है। यहाँ शांतिनाथ भगवान का स्तवन किया जा रहा है कि हे शांतिनाथ भगवान आपने स्वयं अपने आपका परम आनंद पा लिया है। अतएव अब आपके स्मरण से दुर्धर कामविषज्वाला से जलित ये समस्त जगत विकार आपके स्मरण के प्रसाद से दूर हों। यह ग्रंथ ध्यान का है, इसमें ध्यान का वर्णन किया गया है कि कैसा जीव आत्मा का ध्यान कर सकेगा उसे आगे कैसी तैयारी करना चाहिए, किस प्रकार का उपाय करना चाहिए, ध्यान के संबंध में करीब 2 हजार से भी अधिक श्लोकों में इस ग्रंथ में वर्णन किया गया है। लोक में एक आत्मध्यान ही शरण है। दृष्टि पसारकर चारों ओर निरख लो कोई भी वस्तु, कोई भी कुटुंबी, कोई भी जीव इस जीव का शरण नहीं बन सकता। शरण तो क्या जितना स्नेह दिखाया उतना ही यह रीता होता गया, वहाँ से धोखा मिलता गया। तब खूब भटककर भी समझ लो कि बाहर में अपना कोई शरण नहीं है, अपना शरण एक अपने आत्मस्वरूप का ध्यान है।

आत्मध्यान के प्रसाद से शाश्वत शांति के लाभ लेने में परमकल्याण- ध्यानों में ध्यान आत्मध्यान ही है। वह आत्मध्यान कैसे प्राप्त हो? आत्मध्यान का पात्र कौन होता है, इन सबका वर्णन किया गया था। और, ध्यान के साधनों में मुख्य तीन बातें बताई गई हैं। वे तीन बातें हैं- प्राणायाम, धारणा और प्रत्याहार। यम नियम आदिक बताये गए हैं ना, उनसे भी अधिक उपयोगी तीन साधन है- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र। अरे ध्यान करना है ना आत्मा का तो पहिले यह आत्मतत्त्व का विश्वास तो बना लें कि यह मैं क्या हूँ, क्या विश्वास के बिना भी किसी पदार्थ में चित्त एकाग्र हो सकता है? तो पहिले आत्मतत्त्व का विश्वास बनायें इस ही का नाम है सम्यग्दर्शन। क्या है आत्मा का स्वरूप, इसका पूर्णरूप क्या अर्थात् रूप क्या? अद्वैतरूप क्या, इसके प्रदेश गुण पर्याय सबके बारे में यथार्थ ज्ञान बनायें और फिर इस ही प्रकार का ज्ञान बनाये रहने के लिए बाह्य में सम्यक्चारित्ररूप प्रवृत्ति करें। उस सम्यक्चारित्र में पंचमहाव्रतों का वर्णन किया जा रहा था, उसमें यह चतुर्थव्रत ब्रह्मचर्यमहाव्रत का वर्णन है। जो पुरुष ब्रह्मचर्यव्रत की दृढ़ साधना रखते हैं उन मुनिराजों के निकट रहकर जो कोई सेवा करें उनका भी ब्रह्मचर्य दृढ़ होता है, और इस ब्रह्मचर्य के प्रसाद से उत्तरोत्तर ज्ञानविकास करके यह मुमुक्षु परमार्थ ब्रह्मचर्य की साधना कर लेता है। इसी कारण इस ब्रह्मचर्यव्रत का एक विशेष वर्णन के साथ वर्णन किया गया है। इसमें अनेक बातें बारबार कही गई हैं। तो जो हितरूप बात है उसके बारबार कहने पर भी पुनरुक्ति दोष नहीं आता हैं, ऐसा इस परमब्रह्मचर्यव्रत के संबंध में आचार्यदेव ने सविस्तार वर्णन किया। हम इन पंचव्रतों में शक्ति के अनुसार अपनी शक्ति न छुपाकर अधिकाधिक यत्न करें और यह लक्ष्य रखें कि मेरे जीवन का उद्देश्य आत्मध्यान का है, मैं इस आत्मा को पहिचानूँ और उसमें ही लीन रह सकूँ, ऐसे उस निर्दोष उद्यम को करें, इससे ही अपने जीवन का उद्धार है।

।।ज्ञानार्णव प्रवचन दशम भाग समाप्त।।


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