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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 139

From जैनकोष



चरिया पमादबहुला कालुस्सं लोलदा य विसयेसु ।

परपरितावपवादो पावस्स य आसवं कुणदि ।।139।।

पापास्रव का व्याख्यान―पुण्यास्रव के साधन का वर्णन करने के बाद इस गाया में पापास्रव का स्वरूप बताया जा रहा है । प्रमाद बहुल चर्या कलुषता की वृत्ति, विषयों में आसक्ति की परिणति और दूसरे जीवों का संताप उत्पन्न करने का परिणमन―ये सब अशुभ भाव हैं । ये पापकर्म का आस्रव किया करते हैं । ये अशुभभाव स्वयं पापरूप हैं । इनको यों निरखिये कि इस ध्रुव आत्मा से ये पापभाव निकले हैं और इस ध्रुव आत्मा से एक उपाधि के संबंध से पापभाव निकलकर ये इस जीव के उपयोग में आये हैं । यों इस पापभाव का इस जीव में आस्रवण होता है और इस भाव का निमित्त पाकर जो पापप्रकृतियों का बंधन होता है वह है द्रव्य पापास्रव ।

प्रमादबहुल चर्या―प्रमाद नाम है उसका जो भी परिणति आत्मा के शुद्धस्वभाव को ढकने वाला हो । एक जगह पड़े रहना, लेटे रहना इसका नाम इस प्रकरण में प्रमाद नहीं है किंतु आत्मा का जो चैतन्य चमत्कार परिणमन है वह शुद्ध ज्ञाताद्रष्टा रहे इस प्रकार का विशुद्धपरिणमन हैं उसका प्रतिबंध करने वाला जो विभाव है उसका नाम प्रमाद है । उस विभाव के वश होकर जो कुछ इस जीव की परिणति बनती हैं, मिथ्याचारित्र बनता है, विपरीत आचरण बनता है ये सब पापभाव हैं और द्रव्य पापकर्म का आस्रव करने का कारण है । मोक्षमार्ग में अनुत्साह होने का नाम प्रमाद है । जो जीव का विशुद्ध कर्तव्य है, कार्य है, सात्विक भाव है, उस भाव में आलस्य होना इसका नाम प्रमाद है । तो मोक्षमार्ग के कार्यों में अनुत्साह रहने का नाम है प्रमाद ! प्रमाद से पाप का आस्रव होता है।

विषयलौल्य और कालुष्य भाव―विषयों में आसक्ति का परिणाम होना विषय लोलुपता है जो कि आत्मसुख के सम्वेदन से अत्यंत विरुद्ध है । विषय प्रवृत्तियों में किसी भी जीव ने सुखसाता नहीं पायी । विषयों से अतीत होकर ही आत्मा को वास्तविक आनंद प्राप्त होता है । शुद्ध ज्ञाता द्रष्टा रहे इस स्थिति में ही उसे विशुद्ध आनंद प्राप्त होता है । उस आनंद से प्रतिकूल विषयों की लीनता का परिणाम हो तो यह विषय लोलुपता का परिणाम स्वयं पापरूप है और द्रव्य पापकर्म के आस्रव का कारण है चित्त में कलुषता का होना, जिसका विशेष वर्णन पूर्व गाथा में आया है ।

परिताप व अपवाद―पापास्रव के परिणाम आत्मस्वभाव से अत्यंत प्रतिकूल है । आत्मा का स्वभाव तो कलुषता रहित जैसा स्वयं सहज अपने आप स्वभाव पड़ा हुआ है, चैतन्यभाव है, उस चैतन्यभाव में चैतन्यभाव का परिणमन होना, विशुद्ध चमत्कार होना अर्थात् केवल जाननहार रहना, इस स्थिति से अत्यंत विपरीत भाव है । यह कलुषता का परिणाम पापभाव है और द्रव्य पापास्रव का कारण है । यों ही दूसरे जीव का अपवाद करना, दूसरे जीव का परिताप करना―ये दोनों भी जीवस्वभाव से अत्यंत विपरीत हैं । आत्मा का स्वभाव निरपवाद है, अपने आपके अनुभव करने का है, उसमें विशुद्ध आनंद है । उससे उल्टा जो भी भाव है यह सब भाव अशुभ है । स्वयं पापरूप है और द्रव्य पाप के आस्रव का कारण है ।


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