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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 140

From जैनकोष



सण्णाओ य तिलेस्सा इंदियवसदा य अत्तरुद्दाणि ।

णाणं च दुप्पउत्तं मोहो पावप्पदा होंति ।।140।।

भावपापास्रव का वर्णन―इस गाथा में पापकर्म के आस्रव का कारणभूत भावपापास्रव का वर्णन किया है । संज्ञायें आहार, भय, मैथुन और परिग्रह नामक 4 प्रकार की वासनाएँ और कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या―ये तीन लेश्याएँ इंद्रिय के विषयों के अधीन रहने का परिणाम चार प्रकार के आर्तध्यान और चार प्रकार के रौद्रध्यान तथा बहुत प्रकार से प्रयोग किए हुए उपयोग और मोह ये समस्त विभाव पाप को उत्पन्न करने वाले होते हैं ।

संज्ञाओं से पापास्रव―तीव्र मोहनीय कर्म के उदय से उत्पन्न हुई जो आहार, भय, मैथुन परिग्रह की संज्ञायें हैं ये पापभाव को उत्पन्न करती हैं । यद्यपि आहारसंज्ञा छठे गुणस्थान तक है, भय 8वें गुणस्थान तक है, मैथुन 9वें गुणस्थान तक है, परिग्रह संज्ञा 10वें गुणस्थान तक है, और इस दृष्टि से कुछ ऐसी आशंका हो सकती है, तब क्या मुनियों के भी पाप का बंध होता रहता है? इसके उत्तर में दो बातों पर ध्यान दीजिए विशेषतया । तीव्र मोहनीय कर्म के साथ ये संज्ञाएँ होती हैं तो पापबंध के कारण बनती हैं । दूसरी बात यह है कि संज्ञावों का जो स्वरूप है उस स्वरूपदृष्टि से देखा जाय तो उन मुनियों के ये संज्ञायें भी किन्हीं जघन्य अंशों में पायी जाती हैं और विशेष अंशों में शुभ परिणाम शुद्ध परिणाम वैराग्य भाव भी पाया जाता है । तब जितने अंश में संज्ञावों का कार्य है उतने अंश में पाप का बंध है और जितना यह विशाल क्षेत्र सम्वेग और वैराग्य का है उतना उनके पुण्यास्रव और सम्वर, निर्जराएँ चलती हैं, पर यह न कहा जायगा कि आहार संज्ञा पुण्यबंध कराती है या भय, मैथुन, परिग्रह संज्ञा पुण्यबंध का कारण है । भले ही 99 प्रतिशत पुण्यास्रव वाले के एक प्रतिशत पापास्रव हो तो कुछ मालूम न हो, लेकिन जिस भव की जो प्रकृति है उस भाव से उस ही प्रकार का कार्य होता है । तो ये संज्ञाएँ पापास्रव के कारणभूत हैं ।

अशुभलेश्याओं से पापास्रव―कृष्ण, नील, कापोत ये तीन लेश्याएँ तीव्र कषाय के उदय से अनुरंजित योग के प्रवर्तन में हुआ करती हैं, अतएव ये तीन अशुभ लेश्याएँ पापास्रव कराने वाली हैं । ज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव के भी पीतपद्मशुक्ल लेश्याएँ चल रही हों तो चूंकि वे शुभ लेश्याएँ हैं, शुभ परिणाम का संबंध है, उनके भी पुण्य का आस्रव हो जाता है और कदाचित् सम्यग्दृष्टि जीव के भी जैसे कि चतुर्थ गुणस्थान तक कृष्ण नील कापोत लेश्याएँ संभव हैं । ये लेश्याएँ हैं तो इसके कारण उनके भी पाप का आस्रव चलता है । लेकिन साथ में कर्मों का विध्वंस करने में समर्थ सम्यग्दर्शन का परिणाम होने से अन्य बातें भी, शुभ बातें भी अंत: बनी रहती हैं, अतएव उस पाप का प्राबल्य नहीं होता है । ये तीन लेश्याएँ पापास्रव के कारण हैं । यह आत्मतत्त्व कषाय और योग दोनों से शून्य है । न इसमें कषाय करने का स्वभाव है और न इसमें हलन-चलन करने का स्वभाव है । अतएव विशुद्ध चैतन्य प्रकाशस्वरूप है । उससे भिन्न और कषाय के उदय से रंजित योग प्रवृत्ति रूप ये तीन लेश्याएँ इस जीव के पापरूप हैं, पाप के कारण हैं और जीव के शुद्ध प्राणों का घात करने वाली हैं ।

आत्मदृष्टि का अनुरोध―भैया ! इस जीव पर जो वास्तव में आपदा आ रही है उस पर तो यह मोही प्राणी दृष्टि नहीं देता और जिन पदार्थों से रंच भी संबंध नहीं है उन बाह्यपदार्थों के रहने या न रहने को विपदा मानता है । और ऐसी मुग्ध दशा में फिर उन विपत्तियों से बचने का जो भी उपाय करता है वह उल्टा ही करता है । किसी क्षण अपने स्वरूप की खबर लो । जैनशासन पाने का तो यही लाभ है । रोज-रोज 24 घंटे में 10-5 मिनट विशुद्ध हृदय से सम्यग्ज्ञान का प्रयोग करते हुए अपने आपके आनंदघन निर्बाध कल्याणमय परमात्मतत्त्व की सुध ले लिया करें, इससे बढ़कर अन्य कुछ समृद्धि नहीं है । इसकी सुध बिना कषायों के तीव्र उदय से जो प्रवृत्तियाँ होती हैं उन प्रवृत्तियों से पाप का आस्रव होता है ।

विषयाधीनता से पापास्रव―पंचेंद्रियों के विषयों के अधीन बन जाना यह भी पापास्रव का कारण है । आत्मा की शुद्ध परिणति तो अतींद्रिय आनंद का स्वाद लेते रहें इस प्रकार की है और यह आनंद स्वाधीन है । वह आनंद है क्या? जो दुःख होते हैं उन दुःखों को न करें, आनंद तो हाजिर ही है । जो केवल दुःख के कारण हैं, दुःख स्वरूप हैं, ममता और मोह से मिले हुए हैं उन परिणतियों से हट जाय, आनंद तो स्वयमेव बना ही हुआ है । स्वाधीन अतींद्रिय आनंद की परिणति में बाधा देने वाली यह पंचेंद्रिय के विषयों की अधीनता है वह पापकर्मों का आस्रव कराती है । इंद्रिय विषयों की लीनता आसक्ति चाह स्वयं पापपरिणाम है और ऐसे पापपरिणाम के समय पापप्रकृतियों का ही बंध होता है ।

आर्तध्यान से पापास्रव―इष्टवियोगज, अनिष्टसंयोगज, वेदनाप्रभव और निदान ये 4 प्रकार के आर्तध्यान ये शुद्ध चैतन्य की भावना का विनाश करने वाले हैं । कल्याणार्थी पुरुषों को चाहिए तो यह कि अपनी भावना निर्दोष इच्छारहित ज्ञायकस्वरूपमात्र की बनाएँ । इस ही में परमकल्याण है । उस भावना का एकदम घात कर देने वाले ये 8 प्रकार के ध्यान है―4 आर्तध्यान और 4 रौद्रध्यान । जिस समय इष्ट के वियोग हो जाने पर उस इष्ट भूत परपदार्थ की ओर चित्त का आकर्षण रहता है उस आकर्षण के समय इस विशुद्ध चैतन्य की भावना कहाँ रह सकती है? किसी अनिष्ट का संयोग हुआ हो अथवा किसी बैरी पुरुष का समागम हुआ हो तो उस कलामें' कितनी अंतरंग में बेचैनी रहती है? इसका कैसे शीघ्र विनाश हो, कैसे टले, उसके वियोग की भावना जहाँ बनी रहती हो वहाँ शुद्ध चैतन्य की सुध करने का कहाँ ख्याल रह सकता है? शारीरिक रोग होने पर उस रोग पर ही दृष्टि रहे, यह और बढ़ न जाय, यह रोग मिटेगा कि नहीं, हाय ! मुझे बड़ी पीड़ा हो रही है, मैं बरबाद हो रहा हूँ, मैं बहुत दुर्बल हो गया, यों इस देह के प्रति भावना रहे तो ऐसे ख्याल के समय विशुद्ध चैतन्य की भावना कैसे हो सकती है, और निदान जो आर्तध्यान का सबसे खोटा ध्यान है, जब किन्हीं इंद्रिय विषयों के उपभोग की आकांक्षा रहती है तो उस चाह के समय में चैतन्यस्वरूप की भावना कहाँ रह सकती है? निदान नामक आर्तध्यान एक दुष्ट आर्तध्यान है और यह पंचम गुणस्थान तक ही बनाया गया है । छठे गुणस्थान में निदान का अंश नहीं रहता और पंचम गुणस्थान में शुभरूप से निदान चलता है । मुझे परभव में भी धर्म का समागम मिले, अच्छी जाति कुल में उत्पन्न होऊँ, इस धर्म का वियोग न हो, ऐसे शुभ ध्यान होते हैं उन्हें भी निदान ही बताया है । ये भी करने योग्य नहीं कहे गए हैं । ये 4 प्रकार के आर्तध्यान पापास्रव के कारणभूत हैं ।

रौद्रध्यान से पापास्रव―हिंसानंद, मृषानंद, चौर्यानंद, विपयसंरक्षणानंद नाम के 4 रौद्रध्यान ये क्रूर चित्त में उत्पन्न होते हैं । भला कोई किसी को मार रहा है और उस हिंसा को देखकर आनंद माने अथवा स्वयं हिंसा करता हुआ आनंद माने यह कितनी क्रूरता की बात है? किसी की झूठ चुगली करके, झूठ बोलकर, झूठी गवाही देकर आनंद मानना, जिसके प्रति झूठ बोला गया है उसका चित्त किसी प्रकार विह्वल हो रहा, इसकी ओर सुध नहीं है, बल्कि उसकी विवशता निरखकर और आनंद मानता है, ऐसे झूठ में जिससे आनंद माना है उस जीव का कितना क्रूर चित्त है, इसी प्रकार चोरी की प्रवृत्ति, चाहे मजाक समझ लीजिये या कुछ सत्य का प्रतीक समझ लीजिए, लोग इस धन को 11वां प्राण कहा करते हैं । प्राण तो 10 ही होते हैं । धन कोई प्राण नहीं है, मगर 11वां प्राण बता दिया । ऐसे परधन को कोई चुराये, उसके चुराने का उपाय बताये और इसमें ही रुचि रहा करे, ऐसे चौर्यानंद रौद्रध्यान वाले का चित्त कितना क्रूर है, और विषयसंरक्षणानंद की बात देखिये―अपने इंद्रिय के विषयभूत पदार्थों के संरक्षण करने में जो आनंद मानता है उसने दूसरे को तो ओझल ही कर दिया है, खुद की ही गरज निभानी चाही है, अपने-अपने ही मतलब का जो विषयसंरक्षण किया जा रहा है उसमें भी चित्त क्रूर रहता है । इस क्रूर चित्त में उत्पन्न हुआ यह 4 प्रकार का रौद्रध्यान पापकर्मों के आस्रव का कारण है और यह स्वयं भाव पापरूप आस्रव है । यह क्रूर परिणाम इस निर्दोष शुद्ध आत्मानुभूति की भावना नहीं करने देता।

दुःप्रयुक्त ज्ञान से पापास्रव―आस्रव पदार्थों के प्रकरण में पुण्यास्रव ही का पहिली गाथावों में वर्णन करके इसके पूर्व गाथा में और इस गाथा में पापास्रव का वर्णन किया जा रहा है । शुभ और अशुभोपयोग को छोड़कर अन्य साधनों में इष्ट भावों में या हुआ जो ज्ञान है उसे कहते हैं दुःप्रयुक्त ज्ञान । मिथ्यात्व और रागादिक भावों के अधीन होने से जो खोटे विषयों में ज्ञान उलझता है वहाँ उपयोग का आकर्षण रहता है अर्थात् अशुभोपयोग रहता हैं, वह अशुभोपयोग स्वयं पापरूप है और पापप्रकृति के आस्रव का कारण है । अशुभोपयोग पापरूप है, शुभोपयोग पुण्यरूप है और शुद्धोपयोग पाप-पुण्य से रहित अशुद्ध वर्तनारूप है । दुष्प्रयुक्त ज्ञान में शुद्ध तत्त्व की दृष्टि नहीं और शुभ कार्य की भी प्रवृत्ति नहीं । वहाँ तो विषयकषायों के अधीन होकर यह कुमार्ग में लगा रहता है । यह अशुभोपयोग पाप को उत्पन्न करने वाला है ।

मोह से पापास्रव―मोह दो प्रकार का होता है―एक दर्शनमोह और एक चारित्रमोह । दर्शनमोह के उदय से तो दृष्टि का व्यामोह हो जाता है, शुद्ध परख नहीं रह पाती । 'मैं क्या हूँ’ इसकी वास्तविक सुध नहीं है । पर को मैं माने और मैं की सुध नहीं रहे, ऐसी कुदृष्टि दर्शनमोह में हो जाया करती है । यह दर्शनमोह पाप को ही उत्पन्न करने वाला है । चारित्रमोह अनेक प्रकार के विकल्प उठते हैं, अनेक विभिन्न आचरण होते हैं । यह चारित्रमोह भी स्वसम्वेदन का विनाश करने वाला है । ये दोनों प्रकार के मोह पापपरिणाम को उत्पन्न करने रूप हैं और पापप्रकृतियों को उत्पन्न करते हैं । यह सब विभाव परिणामों का समूह पापों को उत्पन्न करने वाला है । इस प्रकार पापास्रव के प्रकरण में इतनी बातों को इस गाथा में कहा है । संज्ञायें, अशुभलेश्या, इंद्रियवशता, आर्तध्यान, रौद्रध्यान, अशुभविकार, दर्शनमोह, चारित्रमोह―ये पापपरिणाम को उत्पन्न करते हैं ।


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