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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 141

From जैनकोष



इंदियकसायसण्णा णिग्गहिदा जेहिं सुट्ठमग्गम्मि ।

जावत्तावत्तेहिं पिहियं पापास्रवं छिद्दं ।।141।।

संवर पदार्थ का आख्यान―अब सम्वर पदार्थ का व्याख्यान हो रहा है । आस्रव पदार्थ के वर्णन के समय 2 प्रकार के आस्रव कहे गए थे―एक पापास्रव और एक पुण्यास्रव । इनमें से पुण्यास्रव का तो वर्णन पहिले किया था और पापास्रव का वर्णन बाद में किया गया था, ऐसा वर्णन करने का एक व्यावहारिक कारण यह हो सकता है कि सबसे पहिले इन जीवों मे पुण्यास्रव की बात सुनायें और जिसमें कुछ चित्त लगे । जिस बात को सुनते हैं उस तरह का उपयोग भी तो कुछ-कुछ बनाना पड़ता है । तो पुण्यास्रव की ही बात जब पहिले बतायी गयी है तो उस तरह का कुछ अपना दिमाग भी बनाया गया था और उस स्थिति में विशुद्ध भाव, संतोष भाव, धर्म की प्रीति ये सब बातें उत्पन्न हुई हैं । फिर पापास्रव त्यागने योग्य है, इस बात का वर्णन किया है ।

पापास्रव के संवर की प्राथमिकता―अब संवर पदार्थो के वर्णन के प्रसंग में सबसे पहिले पापास्रव का संवर बतला रहे हैं । इसमें भी यह कारण हो सकता है कि इस गाथा से पहिले चूँकि पापास्रव का वर्णन है तो अनंतर होने के कारण पाप का ही संवर एकदम बता दिया गया है । दूसरा कारण यह है कि पाप का संवर प्रथम ही होना जरूरी है । इससे पाप संवर को प्राथमिकता दी गई है । पापकर्म रुके तो सद्बुद्धि जगे और यह धर्मपथ में आगे चले तो फिर आगे पुण्य का भी संवर कर के यह शुद्धमार्ग में एकदम बढ़ जायगा । और उपदेश भी यही है कि पाप को पहिले रोको और बाद में स्वाधीन होकर दृढ़ बनकर फिर पुण्य को भी रोके और यों पाप पुण्य दोनों से रहित होकर शुद्ध आनंद का अनुभव करो ।

संवरपद्धति―पाप और पुण्य दोनों को एकदम रोकने को किसी भी प्राथमिक प्राणी को उपदेश नहीं किया गया है । कुछ समझ तो बने, कुछ पाप तो मंद हो, उस पुण्य पवित्र क्रिया के प्रसाद से ये पातक तो कम हों, फिर पाप पुण्य दोनों का भी संवर करो और किसी को ऐसा भी नहीं कहा गया कि पहिले पुण्य का तो संवर कर लो, पीछे पाप को रोकना । ऐसा तो कहा ही नहीं जा सकता । वहाँ लग रहा है बड़ा अच्छा । पुण्य का रोकना बड़ा आसान लग रहा है । पहिले पुण्य को खतम करो, पाप को पीछे देखना । यह तो सब जीवों को आसान लग ही रहा है । यह कोई सिद्धि की बात नहीं है । इन्हीं सब कारणों से इस गाथा में प्रथम ही पाप के संवर का वर्णन किया गया है ।

पापास्रव छिद्र का निरोध―जिन प्राणियों ने इंद्रिय मन कषाय और संज्ञा―इन सबको इस संवर मार्ग के लिए अथवा संवर मार्ग में रोक दिया है तब उनके पापास्रवरूपी छिद्र आच्छादित हो गया है, ऐसा समझिये । मार्ग तो यह संवर है । उस संवरभाव का निमित्त क्या है? जितने अंशों में जितने काल तक ये इंद्रियां कषायें संज्ञायें रुद्ध हो जाती हैं इनका निग्रह हो जाता है उतने अंश में उतने काल तक पापास्रव का द्वार बंद हो जाता है । इंद्रियाँ 5 हैं और एक मन अंतरंग की इंद्रिय हैं, इन 6 का विषय कई बार वर्णन में आ चुका है । क्रोधादिक कषायें, आहार आदिक संज्ञाएँ ये भाव पापास्रव हैं और ये द्रव्य पाप के आस्रव के कारण हैं । जब यह भाव पाप रुक गया तो द्रव्यपाप कहाँ से आयगा? जैसे नाव में छिद्र है जिससे नाव में पानी भर रहा है तो सबसे पहिले छिद्र रोका जाता है, फिर पानी उलीचा जाता है । तो इस भावपाप का निरोध कर देना यही है भावसंवर । यह संवर द्रव्यपाप प्रकृतियों के संवर का कारणभूत है । कर्तव्य बताया गया है इसमें कि तुम ऐसा ज्ञान बनावो जिससे यह भाव पाप समाप्त हो जाय । इस संवर के मार्ग से ही हम आपको शांति की प्राप्ति होगी ।


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