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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 149

From जैनकोष



हेदू चदुव्वियप्पो अट्ठवियप्पस्स कारणं भणिदं ।

तेसिं पि य रागादी तेसिमभावे ण बज्झंति ।।149।।

कर्मबंंधव्यवस्था―आठ प्रकार के कर्मों के बंध का कारण चार प्रकार का द्रव्यप्रत्यय है और उन चोर प्रकार के द्रव्य प्रत्ययों का भी कारण रागादिक विभाव हैं । उन रागादिक विभाव भावों के अभाव होने पर फिर कर्म नहीं बँधते । ऐसी प्रसिद्धि है कि कर्मबंध का कारण जीव के रागादिक भाव हैं । यह एक सुगम कथन है । वस्तुत: वहाँ बात क्या होती है कि नवीन कर्मबंध का कारण उदय में आये हुए कर्म हैं, रागादिक नहीं है, और उदय में आये हुए कर्मों में नवीन कर्मबंधन का निमित्तपना आ जाय, इसमें निमित्त हैं रागादिक भाव । इसी कारण सीधा कथन प्रसिद्ध हो गया कि रागादिक भावों के कारण कर्मबंध होता है । इस कथन में अनेक मर्म पड़े हुए हैं । प्रथम तो मूर्तिक पुद्गल कर्मों के बंध का कारण सीधा कुछ मूर्तिक पदार्थ होना चाहिए । इसकी पुष्टि इसमें हो जाती है तथा इसका भी समर्थन इस पद्धति में हो जाता है कि उदय में आये हुए द्रव्य कर्म में नवीन कर्मबंध का निमित्तपना आये तभी ना कर्म बँधेगा, तो ऐसा निमित्तपना आने में कारण हैं रागादिक भाव । तब यह संभावना की जा सकती है कि कभी ऐसी स्थिति आ जाये कि द्रव्यकर्म तो उदय में आ रहे हैं और रागादिकभावों का सहयोग न मिले तो वे द्रव्यप्रत्यय बंध के कारण नहीं हैं ।

रागादि के अभाव में द्रव्यप्रत्यय की बंधाहेतुता―अब इस प्रसंग में इस बातपर विचारकरना है कि क्या ऐसी भी स्थिति आ सकती है कि द्रव्यकर्म तो उदय में हों और रागादिकभाव न होते हों? ऐसी स्थिति की संभावना एक दो स्थलों में हो सकती है । जैसे दशम गुणस्थान में द्रव्य मोहनीयकर्म का उदय है, संज्वलन सूक्ष्म लोभ का उदय है, पर मोह बंध के योग्य रागादिक भाव नहीं हैं । इस कारण से वहाँ मोहनीय कर्म का बंध नहीं होता । दूसरी स्थिति विचारिये । कभी निषेकों के क्रम में ऐसा निषेक पुंज आ जाय जिसका अनुभाग मंद हो और उस उदयागत कर्म का आश्रयभूत नोकर्म का समागम न मिले तथा यह ज्ञानी जीव अपनी उस समय की योग्यता के पुरुषार्थ से कुछ आत्मचिंतन की ओर लगे तो ऐसी स्थिति में जहाँ कि ये दो-चार बातें हुई हैं, उदयागत द्रव्य प्रत्यय में निमित्तपना का निमित्त न आयगा कुछ इस विषय को समझने के लिए एक दृष्टांत लें ।

बंधहेतुहेतुत्व का स्पष्टीकरण―जैसे किसी मालिक के साथ कुत्ता भी जा रहा है, सामने से कोई एक विरोधी पुरुष आये तो मालिक ने कुत्ते को सैन दी, छू, और उस कुत्ते ने उस पुरष पर आक्रमण कर दिया । मालिक की बुद्धि के सामने कुत्ते में तो कोई बुद्धि नहीं है । तो ऐसा अबुद्ध कुत्ता उस विरोधी के संघर्ष में आया है, किंतु उस कुत्ते में संघर्ष करने का बल आ जाय इसका कारण मालिक की सैन है । यों ही इस रागी जीव के साथ प्रदेशों में कर्मों का उदय चल रहा है, उदयागत इन कर्मों का साक्षात् संघर्ष नवीन कर्मों के साथ होता है बंधन के लिए, किंतु उदयागत द्रव्यकर्म में ऐसा बंध निमित्तपना आये उसके लिए सैन मिली है इस रागी जीव की विकारपरिणति की । इस रागी जीव के राग की सैन को पाकर उदयागत द्रव्यकर्मों में नवीनकर्म बंध का कारणपना आया । बात बहुत सूक्ष्म है यहाँ यथार्थ निमित्तनैमित्तिकपना बतलाने के प्रसंग में ।

आस्रवों की चतुर्विकल्पता―अन्य सिद्धांत ग्रंथों में अष्टकर्मो के बंध के हेतुभूत चार प्रकार के भाव कहे गये हैं―मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग । इस मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योग को आप दो भेदों में रख लीजिए । द्रव्यमिथ्यात्व, भावमिथ्यात्व, द्रव्यअविरति, भावअविरति, द्रव्यकषाय, भावकषाय, द्रव्ययोग, भावयोग । जो इन चार प्रकार के जीवों में हरकतों का कारणभूत कर्म है वह तो है द्रव्यमिथ्यात्व, द्रव्यअविरति, द्रव्यकषाय और द्रव्ययोग । और जीव में जो इस प्रकार का परिगमन हो रहा है वह है भावमिथ्यात्व, भावअविरति, भावकषाय और भावयोग । तो कर्मबंध के कारणभूत वे चार द्रव्यभूत प्रत्यय हैं, उनमें बंधहेतुता आ जाय उसका हेतु है जीव के परिणमन रूप रागादिक भाव । क्योंकि रागादिक भावों का अभाव होने पर द्रव्यमिथ्यात्व, द्रव्यअविरति, द्रव्यकषाय और द्रव्ययोग का सद्धाव होने पर भी जीव बँधते नहीं हैं । इसका एक अर्थ तो अभी बताया ही है । दूसरी बात यह समझो कि सत्ता में पड़े हुए ये द्रव्यकर्म हैं, सद्भाव तो इनका है, पर उस-उस योग्य इस समय रागादिकभाव नही हैं, इसलिए जीव बँधता नहीं है ।

द्रव्यप्रत्यय में बंधहेतुता का काल―इस संबंध में समयसार में एक दृष्टांत दिया है । किसी बड़ी उम्र वाले पुरुष का अत्यंत कम उमर वाली बालिका के साथ विवाह हो जाय, जैसे बहुत पहिले उद्दंडता चलती थी, तो वह छोटी बालिका बंध के योग्य नहीं है क्योंकि उस बालिका में अभी विकारों का सद्भाव नहीं आया । समय पाकर राग विकार आ जाय, उस समय में ये पुरुष और स्त्री बंध जाते हैं । ऐसे ही बंधन तो हो गया कर्म का, पर अपनी उमर पर जब तक ये कर्म विपाक में न आयें, जब तक ये कर्म अपनी आखिरी स्थिति पर न आयें तब तक ये बंधन के कारण नहीं बनते, यों ही पड़े रहते हैं । जब ये कर्म अपनी स्थिति पर आते हैं, उदय को प्राप्त होते हैं तब कर्मबंध के कारण होते हैं ।

बंधप्रसंग में रागादि की अंतरंगहेतुता―इस कथन में सारभूत बात यह लेनी कि निश्चय से बंधन का अंतरंग कारण तो रागादिक भाव हैं, किसी तरह से सही । चाहे सीधी नाक पकड़ो और चाहे एक तरह का प्राणायामसा हो तो पीछे से हाथ डाल कर नाक पकड़ो, पकड़ी गई नाक ही । चाहे उसे सुगम सिद्धांत में बतायी गई पद्धति से कहो और चाहे सूक्ष्म विश्लेषण करके कहो, फल यह निकला कि रागादिक भाव हों तो जीव को बंधन है, रागादिक न हों तो जीव का बंधन नहीं होता ।

गुणस्थानों में प्रत्ययविभाजन―बंध के कारण जो ये चार उपाय कहे हैं उनमें से मिथ्यात्व तो केवल पहिले गुणस्थान में है, अविरति पहिले गुणस्थान से लेकर चतुर्थगुणस्थान तक है और कषाय पहिले गुणस्थान से लेकर दशम गुणस्थान तक है और योग पहिले गुणस्थान से लेकर 13वें गुणस्थान तक है । पंचमगुणस्थान में अविरतिभाव नहीं है, किंतु संयमासंयम हं । इस कारण अविरतिभाव चतुर्थ गुणस्थान तक ही समझना है, । यों इस गुणस्थान में इन-इन प्रसंगों के कारण अपनी-अपनी योग्यतानुसार बंधन होता रहता है । बंध पदार्थ का यहाँ व्याख्यान समाप्त हुआ, अब मोक्ष पदार्थ का व्याख्यान किया जा रहा हे ।


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