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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पंचास्तिकाय - गाथा 150

From जैनकोष



हेदुमभावे णियमा जायदि णाणिस्स आसवणिरोधो ।

आसवभावेण विणा जायदि कम्मस्स दु णिरोधो ।।150।।

कम्मस्साभावेण य सव्वण्हू सव्वलोगदरसी य ।

पावदि इंदियरहिदं अव्बाबाहं सुहमणंतं ।।151।।

भावमोक्षपद्धति―मोक्ष का परम उपाय है संवर, इसलिए मोक्ष की व्याख्या संवर से ही शुरू की जाती है । जब आसव के कारणभूत जीव के मोह रागद्वेष रूप हेतु नहीं रहे अथवा रागद्वेष का निमित्त पाकर निमित्त बनने योग्य उदयागत द्रव्यकर्म नहीं रहे तो ज्ञानी के रागादिक आस्रवों का निरोध हो जाता है और जब भावास्रव नहीं रहे तो मोहनीय आदिक चारघातिया कर्मों का भी निरोध हो जाता है । जब घातिया कर्मों का अभाव हो गया तब यह जीव सर्वज्ञ हो जाता है, सर्वदर्शी हो जाता है, अव्याबाध अनंत सुख को प्राप्त करता है । जहाँ इंद्रियों के व्यापार का संबंध नहीं है, यही है भावमोक्ष । इस ही का नाम है जीवनमुक्ति ।

भावमोक्ष का विवरण―अरहंत परमात्मा के यह भावमोक्ष प्रकट हो गया है अर्थात् भावों से छुट्टी मिल गई है । किन भावो से मुक्ति हो गई है? कर्मो के आवरण से आवृत्त इस चेतन के जो यह भाव निरंतर बना 'रहता था ज्ञप्तिपरिवर्तन का भाव, क्रम से प्रवर्तमान ज्ञप्ति की क्रिया का जो चंक्रमणरूप भाव रहा करता था वह भाव संसारी जीव की अनादि मोहनीयकर्म के बल से अशुद्ध था और द्रव्यकर्म के आस्रवण का कारण था वह ज्ञानी जीव के समाप्त हो गया है । इस प्रसंग में भी एक नवीन चर्चा आयी हैं । जानन का प्रवर्तन होता रहना यह भाव संसारी जीव के क्लेश का कारण है । इसमें रागद्वेष मोह सब बातें आ गयीं, पर कहा यों जा रहा है आत्मा के निकट होकर, आत्मा क्या कर रहा है जिससे यह बखेड़ा बना है? यह अपनी ज्ञप्तिक्रिया का विसदृश प्रवर्तन करता जा रहा है । जैसे जिस मनुष्य को चैन नहीं है वह कभी यहाँ बैठता, देर तक नहीं बैठ सकता, उठकर दूसरी जगह बैठता, कई जगहों में उछलकूद करता रहता है । ऐसे ही जब तक इस जीव को चैन नहीं है तब तक यह अपने जाननरूप कार्य में उछल-कूद चंक्रमण करता रहता है । और यह ज्ञप्ति परिवर्तनरूप क्रिया पृथक्त्ववितर्कवीचार नामक शुक्लध्यान तक चलती है, कहीं टिकाव नहीं होता । ऐसा आत्मबल नहीं प्रकट हुआ कि ज्ञप्तिपरिवर्तन को रोक दे । यदि यह जीव ज्ञप्तिपरिवर्तन को रोक देगा तो इसके बाद नियम से केवलज्ञान ही प्रकट होगा । तो ऐसा जो भाव इस जीव के अनादिकाल से चला आ रहा था उस भाव से मुक्ति मिली है अब केवलज्ञान अवस्था में ।

किस भाव से छुटकारा―देखिये बात सीधी-सादी है, पर विश्लेषण सहित बात कहि जाय तो, वह एक नई बात, नई चर्चा बनती है । जैसे पहिले बताया था कि रागादिक भावों के कारण कर्मबंध होता है यह बात एक सुगम है, उसके विश्लेषण में एक नई बात मिली थी, ऐसे ही यह कहा कि रागद्वेष मोह भावों से छुटकारा होने का नाम भावमोक्ष है। यह बात सुगम है, पर यहाँ और भी अंत: प्रवेश करके देखो तो जीव में जो यह दुर्बलता पड़ी है कि यह सदृश ज्ञान, स्थिर सही ज्ञान नही कर पा रहा है और अपने जानन के काम में अनेक परिवर्तन बनाये हुए है, टिकाव नहीं है, ऐसी ज्ञप्ति परिवर्तनरूप जो जीव का भाव है उस भाव से अब मुक्ति मिली है, यही है जीव का भावमोक्ष ।

संसरण का निजी अंतरंग: हेतु―यह ज्ञप्तिपरिवर्तनरूप भाव रागद्वेष मोह की प्रवीणता के साथ-साथ नष्ट होता है । जब यह आस्रवभाव दूर हो जाता है तो जब आस्रवभाव ही नहीं रहा तो मोह का अत्यंत क्षय होने से अत्यंत निर्विकार चैतन्यस्वरूप के आलंबन के प्रसाद से अब ये भावकर्म दूर हो गए हैं । जीव का भावकर्म क्या है? मोटे रूप से यह बताया है रागद्वेष मोह ये भावकर्म हैं । ये तो कुछ भिन्न और पररूप मालुम हो रहे हैं। जीव में निजी कला क्या है और उस निजी कला से संबंधित भावकर्म क्या है―इस पर दृष्टि डाले' तो मालूम पड़ेगा आपको भावरूप यह कर्म कि जाननरूप क्रिया में कर्म की परिणति होना यही है इसका भावकर्म । अरे अभी इसे जान रहे, सब कुछ जानने में नहीं आ रहा । अब इसका जानना छोड़ा अब इसको जानने लगे । जानना छोड़-छोड़कर नई-नई बात जानते हैं यही है जीव को भावकर्म । जैसे कोट में जेब लोग लगाते हैं, बास्कट में जेब लगाते हैं, कोई जेब बाहर की है, कोई भीतर की है और कोई जेब अत्यंत गुप्त है । हैं वे उस बास्कट की ही जेबे । ऐसे ही जीव में ये सब भावकर्म हैं । हैं वे । रागद्वेष मोह भावकर्म हैं । ये बहिरंग दृष्टि से जीव के अंत: भावकर्म हैं और ज्ञप्तिक्रिया में परिवर्तन होना इसमें जो कुछ अंत: श्रम हो रहा है वह है इसका अंतरंग दृष्टि से भावकर्म।

भावमोक्ष में विकास का रूप―अनादि काल से जो अनंत चैतन्यस्वरूप आत्मवीर्य दबा हुआ था अब शुद्ध तत्व की जानकारी रूप क्रिया के द्वारा उस दुर्बलता को अंतर्मुहूर्त में खतम होकर, एक साथ ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अंतराय का क्षय होते ही इस ज्ञान में कथचित् कूटस्थता आ जाती हे । सूक्ष्मदृष्टि से देखो तो केवल ज्ञान के समय में भी प्रति समय का केवलज्ञान परिणमन जुदा-जुदा है, लेकिन वह जुदा क्या? जो ज्ञान पहिले जिसे जानता था, सभी ज्ञान, सभी केवलज्ञान प्रति समय ठीक वैसा का ही वैसा जानते हैं, न कुछ कम, न कुछ ज्यादा तो वहाँ परिवर्तन क्या मालूम होगा? विषय की दृष्टि से केवलज्ञान कूटस्थ है और जीव में प्रतिसमय का वह परिणमन चल रहा है इस दृष्टि से प्रतिसमय का परिणमन जुदा-जुदा है । ऐसा यह केवलज्ञान कूटस्थता को प्राप्त होना हुआ प्रकट हो रहा है । अब ज्ञप्तिपरिवर्तनरूप भावकर्म नष्ट हो गए हैं । अब प्रभु सर्वज्ञ सर्वदर्शी हुए, इंद्रिय व्यापारों से रहित हुए, निर्वाध अनंत सुखमय हुए । इस प्रकार भावकर्म मोक्ष की पद्धति बताई, द्रव्यकर्म से मुक्ति का करण बताया और परमसम्वर के परमउपकार का वर्णन किया ।


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