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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 86

From जैनकोष



अप्पा गोरउ किण्हुणवि अप्पा रत्तु ण होइ ।

अप्पा सुहुमुवि थूलु णवि णाणिउ जाणें जोइ ।।86।।

आत्मा न गोरा होता है, न काला होता है, न लाल होता है न सूक्ष्म होता है और न स्थूल होता है । ऐसा ज्ञानी जीव अपने ज्ञान के द्वारा मान रहा है आत्मा सफेद नहीं है, आत्मा तो अमूर्त

है । उसमें रूप का कोई सवाल ही नहीं है, और न यह काला है । गोरा तथा काला, ये रूप की जातियां हैं और ये केवल पुद्गल द्रव्यों में होती है । यह जीव अपनी जैसी दृष्टि बनाता है वहाँ ही उसे अच्छा-भला नजर आता है । कोई पुरुष बड़े दुःख में दुःखी हो तो उसे सर्वत्र दुःख ही दुःख नजर आता है । कोई हँस भी रहा हो तो वह यों जानेगा कि यह जबरदस्ती हँस रहा है । गान, तान व बाजे; ये सब राग भी उसे भद्दे मालूम होते हैं । उनमें कोई रस नहीं जंचता है और जो जीव सुख में होता है,उसे सर्वत्र सुख ही सुख नजर आता है । हालांकि सभी जीव प्राय: दुःखी हैं, पर जो सुख में मस्त है उसे सर्वत्र सुख ही सुख नजर आता है । इसका कारण क्या है कि खुद के परिणमन से ही यह जीव अपना ही अनुभव करता है । बाहरी पदार्थों से यह अनुभव नहीं करता है । खुद तो है सुखी, सो उसे सुख ही सुख सब जगह नजर आयगा ।

सावन के अंधे को सब जगह हरा-हरा दिखता है । एक कहावत ऐसी कहते हैं । सावन में सब जगह हरियाली छा रही थी । हरियाली के बीच में कोई पुरुष अंधा हो जाय तो उस अंधे को वही दृश्य जीवन भर नजर आयेगा । जो सुखरूप परिणमता है उसे सर्वत्र सुख नजर आता है । और जो दुःखरूप परिणमता है उसे सर्वत्र दुःख ही नजर आता है । जिसकी दृष्टि ज्ञान और वैराग्य से ओतप्रोत है उसे सर्वत्र ही सारे दृश्य असार नजर आते हैं । जिस रूप को देखकर कामी पुरुष अपना सर्वस्व न्यौछावर, समर्पण कर देता है, वह रूप, वह आकार सब कुछ ज्ञानी पुरुष को विडंबनारूप दिखता है । कहाँ तो शुद्ध ज्ञानस्वरूपी आत्मप्रभु और कहाँ लिपट गया यह मांस का लोथड़ा? कामीपुरुष एवं रागीपुरुष को यह चाम रंग इष्ट नजर आता है तो ज्ञानी की दृष्टि में इस चाम के भीतर जो कुछ अशुद्ध है? हडि्डयों के ढांचे का जो आकार है वह नजर आता है ।

अज्ञानी जीव मानता है कि मैं गोरा हूँ । मैं काला हूँ । जैसा भी शरीर मिला उसी शरीर में इसका प्रेम हो जाता है । अभी किसी वृद्ध पुरुष से कहकर तो देख लो कि तुम्हारा शरीर तो अब बिल्कुल शिथिल हो गया है, हडि्डयां निकल आयी हैं, आखें धंस गई हैं, हिम्मत नहीं रही है । बच्चे यदि अंधेरे में तुम्हें देख लेवें तो भूत समझकर डरकर भाग जावेंगे । ऐसी स्थिति हो गई है, पर तुम अपने शरीर से ही बड़ा प्रेम करते हो । देखो यह लड़का कितना चंगा है, हष्ट पुष्ट है, तुम्हारे शरीर से हजार गुना अच्छा इसका शरीर है । तुम इससे प्रेम करो ना? तो क्या वह उससे प्रेम कर लेगा? नहीं । जिसको जो पर्याय मिली है, चाहे कैसी भी स्थिति हो, उसको उसमें ही अनुराग रहता है । यह आत्मा न सफेद है, न काला है । सफेद और काला तो पुद्गल की परिणति है । शरीर में जो रंग प्रकट होता है वह इस पुद्गल के नाते ठीक है, मगर इसमें मुख्य कारण रूपनामक नामकर्म का उदय है । देखो तो मनुष्य-मनुष्य में प्राय: एकसा ढंग देखा जा रहा है । रूप का एक ढंग देखा जा रहा है । क्या किसी मनुष्य का रूप घोड़े और गधे जैसा भी होगा? चाहे कोई मनुष्य श्याम हो, कृष्ण हो, गौर हो; पर मनुष्य का रूप मनुष्य जैसा ही हुआ करता है । ऐसा जो प्रतिनियतरूप पाया जाता है इसका कारण नामकर्म का उदय है ।

आत्मा न गौरवर्ण का है, और न कृष्णवर्ण का है । और वर्णों की भी बात देख लो । श्यामवर्ण का हो तो क्या, गौरवर्ण का हो तो क्या, ऐसा भी तो हो सकता है कि गौरवर्ण का शरीर रोगी हो व दुर्गंधित हो और श्यामवर्ण का शरीर कम दुर्गंधित हो । कितनी ही अटपटी बातें हो जाती हैं । उनमें से कोई वर्ण रुचिकर हुआ, कोई वर्ण अरुचिकर हुआ, ये सब अज्ञान की बातें हैं । आत्मा न श्वेत है, न काला है, न लाल है न सूक्ष्म है और न स्थूल है । अज्ञानी के ऐसी भी कल्पना होती है कि मैं दुबला हो गया, मैं मोटा हो गया । आत्मा कहाँ तो दुबला और कहाँ मोटा है; वह तो एक ज्ञानप्रकाश है । बड़े शरीर में विशाल ज्ञान से ओर छोटे शरीर में सूक्ष्म ज्ञान हो, ऐसा कुछ नहीं है । उस शरीर का आत्मा से क्या संबंध है? सूक्ष्म और स्थूलपना पुद्गलद्रव्यों की व्यंजन पर्याय में है । अनेक परमाणुओं में मिलकर जो परिणमन होता है उसमें अपेक्षाकृत दुबला और मोटापन होता है । यह आत्मा तो केवल ज्ञानमय है । जो ज्ञानी ऐसे अपने आपको जानता है वह ही महान योगी है।

ये कृष्ण व गौर वर्ण व्यवहार से जीव के साथ संबद्ध हैं, लेकिन शुद्ध आत्मा से अत्यंत भिन्न हैं, कर्मजनित हैं, हेय हैं । उनको ज्ञानीपुरुष, वीतराग निजस्वरूप का संवेदन करने वाले पुरुष अपनी दृष्टि में, आत्मतत्त्व में नहीं लगाते हैं, संबद्ध नहीं कराते हैं । मैं अमुक हूँ, मैं अमुक हूँ । जो मैं मैं करता है वही पिटता है । जो बकरी मैं मैं करती है वह अपना गला कटाती है । जो मैं ना, मैं ना करती है वह मैना सोने के पिंजड़े में पाली जाती है और कोई यथार्थ लक्ष्य से ‘मैं न’ इसको अनुभव में उतार ले तो फिर उसके आनंद का क्या ठिकाना है? अब आगे और किस-किस प्रकार से यह अज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव अपने आत्मा को समझता है? इसका वर्णन करते हैं ।


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