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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:परमात्मप्रकाश - गाथा 87

From जैनकोष



अप्पा बंभणु वइसु णवि णवि खत्तिउ णवि सेसु ।

पुरिसु णउंसउ इत्थि णवि णाणिउ मुणइ असेसु ।।87।।

ज्ञानी ऐसा समझता है कि आत्मा न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न वैश्य है और न शेष अन्य है । न पुरुष है, न स्त्री है, नपुंसक है, ऐसा ज्ञानीपुरुष मानता है । ऐसी बात पहले भी आ गई है । अज्ञानी की मान्यता में, इनकी विविधरूप में और उसी बात को फिर आचार्यदेव ज्ञानी की मान्यता इनके प्रतिषेधरूप में बता रहे हैं, या दुहरा तिहरा कर भी कह रहे हैं तो इसमें कोई दोष नहीं समझना । क्योंकि आचार्यदेव शायद दूसरी बार या तीसरी बार कह रहे हैं । आप तो हजारों बार वही दाल रोटी खाते हैं, आचार्यदेव ने तो दो-तीन ही बार कहा । जो चीज रुचिकर है उसे तुम तो

रोज-रोज खाते हो यह तो आचार्यदेव अध्यात्म की बात दुबारा या तिबारा ही कह रहे हैं । इससे नहीं अघाना, वही चीज चल रही है । फिर नई बात और है कि उस बात को पहले समझ लिया था, लेकिन बीच में रागद्वेष हो जाने से, उपयोग के अन्यत्र लग जाने से वे सब बातें भूल गये । तो भूले हुए पुरुष को वही बात कहें हैं अत: नई बात है । इसलिए अध्यात्म के कथन को कितने ही प्रकार कहा जाय तो कुछ दोष नहीं है और यह ज्ञान बहुत-बहुत कष्ट उठाकर भी किसी क्षण अनुभव में आ जाय तो आत्मा का कल्याण है ।

भैया ! धन, कन, कंचन राजसुख ये कुछ भी शरण नहीं होंगे । ‘धन, समाज, गज, वाजि, राज तो काज न आवे । ज्ञान आपका रूप भये फिर अचल रहावै ।’ ये कोई काम नहीं आवेंगे । काम आना तो दूर रहा, ये सब क्लेश देने के लिए है । रंक से लेकर राजा तक, उनको कहाँ सुख है? सुखी केवल वह है जो सर्व परवस्तुओं से त्यागकर चुका है, अपने शुद्ध ज्ञानस्वरूप में रमना चाहता है । देखो इस आत्मतत्त्व को । यह आत्मा न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न वैश्य है और न शूद्र है । वह तो एक चैतन्यसत् है । इस पर्यायभेद के कारण जिसने पर्याय की प्रधानता रखी है वह मोक्षमार्ग की कला को नहीं जान सकता । जिसने अपने आत्मतत्त्व का परिचय नहीं पाया है उस पर इन बातों का असर नहीं हो सकता । जगत् में देखो, सैकड़ों आए और चले गये । सब अपनी-अपनी करामात दिखाते चले गए । कौन रहा है? राम के समय, कृष्ण के समय, वीर के समय तथा ऋषभदेव के समय कैसा समारोह छाया हुआ होगा; पर ऐसे महापुरुष भी नहीं रह सके तो फिर और अपन सबकी तो बात ही क्या है? ये सब व्यवहार की बातें हैं । यह आत्मा का सारभूत तत्त्व नहीं है।

ज्ञानी के उपयोग में ज्ञानस्वरूप आत्मा है । वह क्या करता है? समस्त वस्तुस्वरूप को मात्र जानता रहता है । जानना तो आत्मा का स्वभाव है, वह जायगा कहाँ? और जानेगा भी यह अपने आपके परिणमन को । ज्ञानी अपने आपके शुद्धस्वरूप का निश्चय कर चुका, इस कारण वह ज्ञानी सर्व वस्तुसमूह को जानता है । यह व्यवहार से भेद लगा है कि मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं वैश्य हूँ, मैं शूद्र हूँ । निश्चय से उस आत्मा का क्या स्वरूप है; इस पर दृष्टि देने पर यह भेद नजर आता है । इस भेद की तो बात छोड़ो । गोरा, काला, मोटा, दुबला यह भी भेद नहीं नजर आता है । उस शुद्ध आत्मतत्त्व की दृष्टि हो । सर्वपदार्थों से भिन्न और अपने आपमें अभिन्न, ऐसे आत्मतत्त्व को जो नहीं देखता है उसके निरंतर कर्मबंध चलता है । यह हेयभूत है । विषयकषाय, रागद्वेष, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र; ये शुद्ध निश्चय से हेयभूत हैं । अर्थात् इनकी दृष्टि से आत्मा में लाभ नहीं है । यह बहिरात्मा सहज वीतराग निर्विकल्प समाधि से च्युत होता हुआ इन सब वर्णादिक को; रागादिक को अपने आप में लगाता है । किंतु अंतरात्मा इन सब दृश्यमान पदार्थों से विलक्षण आत्मा का शुद्धस्वरूप जो अंतरात्मत्व है उस, अपने स्वरूप को स्वयं शुद्ध आत्मा का स्वरूप जानता है ।

अब आगे और भी बतलाते हैं कि यह ज्ञानी जीव अपने आपको किस-किस रूप नहीं मानता है?


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