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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 111

From जैनकोष



या मूर्छा नामेयं विज्ञातव्य: परिग्रहो ह्येष:।

मोहोदयादुदीणों मूर्छा तु ममत्वपरिणाम: ।।111।।

मूर्च्छा लक्षण व मूर्छा की परिग्रहरूपता―जो मूर्छा नाम का परिग्रह है वह क्या हैं? मोह के उदय से उत्पन्न हुआ ममत्व परिणाम । मोहकर्म दो प्रकार का है, एक दर्शन मोह और एक चारित्र मोह । दर्शन मोह के उदय से आत्मा की दृष्टि विपरीत हो जाती है । है तो परपदार्थ और मानता है कि यह मैं हूँ, यह विपरीत दृष्टि हुई । है तो यह भिन्न और मानता कि यह मेरा पदार्थ है तो इस तरह ममत्व परिणाम और अहंकार परिणाम होते हैं वे सब पाप हैं । चारित्र मोह के उदय से तो ममता जगती है और दर्शन मोह के उदय से पर को यह मैं हूँ इस तरह का परिणाम होता है, यही मूर्छा है । मूर्छा मायने बेहोशी । बेहोशी का अर्थ है अपनी सुध न रहना । मैं क्या हूँ, मेरा स्वरूप क्या है, मेरा कर्तव्य क्या है इसकी सुध न रहने और अटपट क्रिया चले उसी के मायने मूर्छा है । जैसे कोई शराब पीने वाला अपनी सुध नहीं रखता और वह अटपट क्रिया करता है तो उसे लोग बेसुध कहते हैं । अब जरा इसी बात को आत्मपरिणाम में देखो । जो आत्मा अपनी सुध नहीं रख सकता, मैं आत्मा ज्ञान दर्शन स्वरूप हूँ, निराकुल हूँ, जो सिद्ध का स्वरूप है उस तरह के स्वरूप वाला हूँ, दुःख का कहीं काम नहीं । आनंद ही इसका स्वरूप है । ऐसी अपने आत्मा की तो सुध न हो सके और बाह्यपदार्थों के प्रति मूर्छा का परिणाम जगे तो यह जो ममत्व परिणाम है उस ममत्व परिणामों से अपने आत्मा की, समयसार की परमात्मस्वरूप की बहुत-बहुत हिंसा है इसी कारण यह आत्मा अपनी अनाकुलता से मिल ही नहीं सकता है । तो ऐसा जो मूर्छा का परिणाम है वह भी हिंसा ही है । इसी को परिग्रह कहते हैं । तो परिग्रह के संचय में, परिग्रह की तृष्णा में, परिग्रह की दृष्टि में आत्मा अपने चैतन्य प्राण का निरंतर घात करता जा रहा है और इस बात का यह पता भी नहीं करता कि इससे मेरा कितना घात है, मेरी कितनी बरबादी है? होड़ लगाये जाते हैं बाह्य परिग्रहों के जोड़ने में हजारपति हैं तो लखपति होने की बात मन में है लखपति हैं तो करोड़पति तथा करोड़पति हैं तो अरबपति बनने की बात मन में बनी रहती है ।

व्यर्थ का मूर्च्छाभाव―भैया ? व्यर्थ का मूर्छा परिणाम इस जीव के साथ लगा है । है यहाँ किसी का कुछ नहीं, सभी यहाँ के प्राप्त समागम छूट जायेंगे, लेकिन उस वैभव में मूर्छा बनी है । अपनी सत्ता, धन वैभव, परिजन, मित्रजनों से मानता है । कुटुंबीजनों के लिये तो अपना सर्वस्व ही अर्पण करने को तैयार रहते हैं । अपने कुटुंबीजनों के अलावा दूसरे लोग भी कोई जीव नहीं हैं, उनके लिये यह कुछ भी त्याग करने को राजी नहीं होता, तो यह कितनी बड़ी भारी मूर्छा है । जैसे गैर आत्मा हैं वैसा ही तो इन कुटुंबी जनों का आत्मा है । वे भी उतने ही भिन्न है, जितने कि अन्य सब जीव भिन्न हैं लेकिन ऐसा मूर्छा का परिणाम इन जीवों के साथ लगा है कि जिन्हें अपना स्वीकार किया है उनके पीछे तो अपना सर्वस्व अर्पण कर देते हैं और बाकी जीवों लिये चित्त में कोई कृपा का स्थान नहीं है और कुछ स्थान बाकी लोगों के लिये भी है तो वह अत्यंत थोड़ा है । जैसा परिणाम घर वालों के प्रति जगता है उसकी तुलना में गैरों के प्रति तो न कुछ के बराबर है । तो यह बेहोशी नहीं है तो और क्या है? कोई कहे कि गृहस्थावस्था में तो ऐसा करना पड़ता है और न करें तो क्या धन लुटा दें? लेकिन यह पता नहीं कि धन आता कैसे है ? यह जीव तो जानता है कि मेरी कला से, मेरे मन वचन काय के व्यापार से, मेरी युक्ति से धन आता है, लेकिन जिसके पुण्य का उदय सही है उसके धन आता है और उदय नहीं है तो नहीं आता है । यदि गैरों की रक्षा करे, यहाँ चित्त दे तो उसके कहीं कमी नहीं आती है, सिर्फ एक विचार, ही संकुचित बना लिया गया, फिर इतनी हिम्मत रखे कि जब तक हैं तब तक उदारभाव का सर्वत्र उपयोग करें और उसके फिर जो भी हमारे ऊपर परिस्थिति आये हम उसी में राजी हैं । क्या करना है इस बात को सोचकर कि मैं दूसरों के लिये दया का परिणाम रखूंगा नहीं । दूसरों के प्रति भी दया का परिणाम जगे तो इसमें कौनसी कमी आती है? मैं आत्मा अपने गुणों से संपन्न हूँ, इन ही गुणों के वैभव से मैं वैभववान हूँ । परपदार्थों के कारण वैभववान नहीं हूँ । तो मूर्छा नामक जो परिणाम है वह इतना बेवकूफी भरा परिणाम है कि उसमें अपने परमात्मस्वरूप की हिंसा होती है ।


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