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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 112

From जैनकोष



मूर्च्छालक्षणकरणात् सुघटा व्याप्ति: परिग्रहत्वस्य ।

सग्रंथो मूर्छावान् विनापि किल शेषसंगेभ्यः ।।112।।

मूर्छापरिणाम में परिग्रहत्व की व्याप्ति―परिग्रह का अर्थ है मूर्छा ꠰ बाह्यपदार्थ पास होने का नाम परिग्रह नहीं, भीतर में जो ममता परिणाम लगा है, बेसुधी है यह है परिग्रह । पर बाह्यपरिग्रह जो अपने साथ लिपटा है वह मूर्छा के बिना नहीं रह रहा । तो बाह्य पदार्थों में मूर्छा है इस कारण परिग्रह है । चाहे बाहर से कोई परिग्रह न दिख रहा हो, पर जिसके अंतरंग में मूर्छा परिणाम है उसके साथ तो परिग्रह लगा ही हुआ है । यह बाह्य परिग्रह तो अंतरंग मूर्छा का अनुमान कराता है कि इसके अंतरंग में मूर्छा है तभी तो देखो कितना परिग्रह लाते हैं । और जो दोष लगा हैं अंतरंग मूर्छा लगी है उसी से तो ये अंतरंग और बहिरंग परिग्रह इतने-इतने दिख रहे हैं । बाहरी चीज से अथवा दूसरे की प्रवृत्ति से आत्मा को दोष नहीं लगता, किंतु अपने आपका ही कोई अपराध हो तो उस अपराध से दोष लगता है । कोई पुरुष नग्नरूप धारण किए हो, बाहरी परिग्रह पास में न हो, पर अंतरंग में मूर्छा हो तो वह परिग्रही कहलायेगा । जहां-जहां मूर्छा होती है वहां-वहां परिग्रह होता है यह नियम है । तो जिसके अंदर मूर्छा है उसके नियम से परिग्रह है और अगर किसी के अंतरंग में मूर्छा नहीं है, नग्न स्वरूप है, उसके ऊपर कोई कपड़ा उड़ा दे तो वह परिग्रही न कहलायेगा । परिग्रह होता है जीव के अंतरंग मूर्छा परिणाम से ।


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