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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 113

From जैनकोष



यद्येवं भवति तदा परिग्रहो न खलु कोऽपि बहिरंग: ।

भवति नितरां यतोऽसौ धत्ते मूर्छानिमित्तत्वम् ꠰।113।।

बाह्मपरिग्रह का मूर्छापरिणाम में निमित्तत्व―मूर्छा ही परिग्रह है । निश्चय से तो बाह्यपरिग्रह कुछ भी परिग्रह नहीं होगा? उत्तर―एकांतत: ऐसा नहीं है, क्योंकि यह बाह्य परिग्रह मूर्छा का निमित्त तो बनता है । कोई कहे कि बाहरी परिग्रह रखने से कोई दोष भी नहीं आता आत्मा में, तो रखे जावो बाह्य परिग्रह सो यह बात नहीं है, क्योंकि बाह्य परिग्रह जो रख रहा है उसके मूर्छा परिणाम है और मूर्छा परिणाम से परिग्रह का दोष है । परिग्रह दो प्रकार का है―एक अंतरंग परिग्रह और दूसरा बाह्य परिग्रह । तो बाह्य परिग्रह अंतरंग परिग्रह का विषय है । जैसे किसी को ममता जगी तो किसी पदार्थ का नाम लेकर ही तो जगेगी । तो जिस पदार्थ को हमने अपने उपयोग में लिया है वही पदार्थ बाह्यपरिग्रह है । तो बाह्य परिग्रह का ख्याल कर करके यह जीव ममता किया करता है । इस तरह से बाह्य परिग्रह मूर्छा परिणाम रूप अंतरंग परिग्रह का कारण है । यह मूर्छा परिणाम अंतरंग परिणाम से संबंध रखता है । इस मूर्छा की उत्पत्ति में ये बाह्यपदार्थ कारणभूत है । तो कारण में कार्य का उपचार किया अर्थात् बाह्यपदार्थों में मूर्छा नामक परिग्रह का उपचार किया तो वहाँ भी यह बात बनी कि मूर्छा है इसी का नाम परिग्रह है बाह्य पदार्थों में ममत्व किया उसी के मायने मूर्छा है । मूर्छा का अर्थ उदासीन नहीं । मूर्छा का अर्थ है अपने आपकी सुध खो बैठना और बाह्य पदार्थों में अपनी दृष्टि लगाना इसी का नाम मूर्छा है । तत्त्वार्थसूत्र में भी लिखा है कि―‘मूर्छा परिग्रह:’ । मूर्छा का नाम परिग्रह है यह बात बिल्कुल युक्त है । बाह्य परिग्रह होते हुए परिग्रह का जो दोष लगा है वह बाह्य पदार्थों के निकट होने के कारण नहीं लगा किंतु अपने अंतरंग में मूर्छा रहे उसके कारण इसे दोष लगा है । तो मूर्छा नाम का जो परिग्रह है वह भी पाप है क्योंकि उसमें भी अपने प्राणों का घात है और उस वैभव की प्रीति के कारण दूसरे जीवों में जो विशद बनता है उनके प्राण घाते जाते हैं तो उन जीवों की भी हिंसा हो गयी । मुख्यत: तो अपने चैतन्यप्राण को हिंसा है । अपना जो ज्ञान दर्शन है उसके विकास को रोक दे, उस वैभव प्रीति के कारण आकुलता बनी रहती है, यह अपने आपकी बड़ी भारी हिंसा है । तो परिग्रह से अपने प्राणों की हिंसा हो गई, अत: यह भी अधर्म है ।


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