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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 147

From जैनकोष



एवंविधमपरमपि ज्ञात्वा मुंचत्यनर्थदंडं य: ।

तस्यानिशमनवद्यं विजयमहिंसाव्रतं लभते ।।147꠰।

अन्य भी अनेक अर्थदंडों के त्याग का उपदेश―इसी प्रकार और भी कई अनर्थदंड होते हैं, उन्हें हर एक कोई जान भी जाता है कि यह अनर्थदंड है, इसमें हमारी कोई सिद्धि नहीं है और पाप का काम है, ऐसे समस्त अनर्थदंडों का परित्याग करना चाहिये । जो मनुष्य इन अनर्थदंडों का परित्याग करता है वही निरंतर अहिंसाव्रत का पालन करता है । हिंसा होती है अपने संक्लेश परिणाम से या रौद्रपरिणाम से । अपने आपके स्वरूप का घात करें उसमें हिंसा होती है । आत्मा तो आनंदमय है, इसे कोई क्लेश ही नही । स्वरूप देखें, स्वभावदृष्टि में लेवें तो इसमें किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं है । यह स्वरूप अनादि से ओतप्रोत है लेकिन मोहवश पर में दृष्टि लगाकर हमने अपने आनंद का घात किया है, तो क्या किया? हमने अपनी हिंसा की, अपना बिगाड़ किया, मोह रागद्वेष परिणाम से आत्मा के चैतन्यप्राण का घात होता है । अपने आपमें बसे हुए परमात्मा स्वरूप की हिंसा होती है, यह द्रव्यहिंसा, इसी भावहिंसा के कारण हिंसा कहलाती है । वास्तव में अपने ज्ञान दर्शन प्राण का घात करना सो हिंसा है लेकिन मोह करके बड़े राजी होते हैं, उन्हें यह पता नहीं है कि इस तरह राजी होने में हम अपने परमात्मा स्वरूप की हिंसा कर रहे हैं । मोह में होता क्या? कर्मबंध बाह्यदृष्टि । जन्म मरण करने में लाभ क्या मिला? जन्म मरण की परंपरा मिलती है मोह करने से । जो देह पाया है इस देह में यह मैं हूँ, ऐसा अभिमान बनाना मोह है । और फिर इस मोह के कारण शरीर का लोभ करना पड़ता है । शरीर का आराम बनाना पड़ता है, इंद्रिय की साधना बनानी पड़ती है, फिर तो बाहर में बहुत कुछ डोलता रहता है । मोह करने से अपने परमात्मस्वरूप की हिंसा है । यह मौज मानने की बात नहीं है, घर में रह रहे हैं, घर के अच्छे लोग हैं, खूब बढ़िया साधन हैं तो इसमें मौज मत मानो । इससे आत्मा का लाभ नहीं है । इसी से तो जगत को धोखा कहते हैं । लग तो रहा है अच्छा और हो रही हे बरबादी । जैसे मोह करने में लग तो रहा है अच्छा, उस समय दिल रागी हो रहा है मगर अपने आपके आत्मा की कितनी बरबादी हो रही है? इसका पता नहीं रखते । यह भी धोखा है । मोह रागद्वेष परिणाम ही हमारा बैरी है दूसरा कोई हमारा बैरी नहीं । खूब समझलो, कोई दूसरा मेरा अनर्थ नहीं करता । कैसे करेगा? दूसरा तो दूसरा ही है, दूसरे का परिणमन दूसरे में है, वे जैसी कषाय करें, जो इच्छा करें, जो भी परिणाम करें सो वे अपना परिणाम कर रहे हैं मेरा कुछ नहीं कर रहे, मैं अपने आपके मोह परिणाम से बरबाद हो रहा हूँ क्योंकि उस परिणाम में मुझे अपना पता नहीं रहता । बाह्य की ओर हमारा आकर्षण रहता है, यह ही अज्ञानभाव है । इस भाव में कर्मी का बंध है और हम भी स्वयं विभाव में जकड़ जाते हैं उसके कारण जन्म मरण शरीरं की परंपरा मिलना और शरीर की वेदना भूख प्यास नाना प्रकार के कष्ट होना―ये सब हमें मोह के कारण प्राप्त होते हैं । तो हमारा बैरी मोह भाव है ।

धर्मपालन की पात्रता के भाव―धर्मपालन करना हे तो सबसे पहिले यह दृष्टि डालें कि हे नाथ ! मेरा यह मोह परिणाम दूर हो और मैं कुछ नहीं चाहता । मोह भाव दूर हो गया तो सब शांति मिल चुकी, फिर कोई कष्ट नहीं है, कष्ट तो मोह का है और व्यर्थ का मोह । कोई जीव कही से आया, कुछ दिन के लिए संयोग मिला, अंत में वियोग होना ही पड़ता है सबसे बिछुड़ना पड़ता है । जो अपने घर में गुजर गए हैं उनसे ही शिक्षा ले लो, उन्होंने भी बहुत-बहुत मोह किया, घर बसाया, व्यवस्थायें बनायी, अब उनका क्या रहा? जिन-जिनसे भी उन्होंने ममता की थी स्त्री, पुत्रादिक से, उनमें से कोई रह गया क्या? जितने दिन उनमें ममता की उतने दिन अपनी बरबादी कर ली और चल बसे । संसार का यही खेल चल रहा है, मोह करना और अपनी बरबादी करना । मर जाना, आगे फिर कष्ट पाना, मोह करना बरबादी करना, यही दो काम इस संसारी जीव को ये बड़े-बड़े राजमहल, बड़े-बड़े ठाठबाट जो दिखने में आ रहे हैं उनसे यह ही तो शिक्षा मिलती है कि ये लोग कैसे मस्त हो रहे पुण्य के ठाठ में, किस किसमें उन्होंने अपनी बढ़वारी समझी, कैसे-कैसे ठिकाने बना गए, क्या किया? मोह किया अपनी बरबादी की, चल बसे । तो मोह रागद्वेष के सामन अपना कोई बैरी नहीं है, यह अपने में निश्चय रखो । जब कभी भी दुःखी हों तो यह निर्णय रखें कि मुझमें मोह और राग बसा है इसलिये दुःखी हैं । भाई ने यों किया इस कारण दु:खी हैं यह बात गलत है । घर के किसी ने यों व्यवहार किया इससे मुझे दुःख हुआ यह बात गलत है । कोई दूसरा आदमी चाहे कुटुंब का हो, चाहे बाहर का हो हमको दुःखी नहीं कर सकता । हमारे में मोह बसा हे, राग बसा है, अपनाते हैं इसलिए दुःखी होते हैं । दु:ख का कारण हमारा मोहरागद्वेष परिणाम है अन्य कोई नहीं । इस दुःख के मिटाने का उपाय है―निज को निज पर को पर जानना । बस जान लें कि देह से भी निराला केवल ज्ञानानंदमात्र जो चैतन्यप्रकाश है वह मैं आत्मा हूं । वह तो मैं हूँ और उस भाव को छोड़कर अन्य जो कुछ भी तत्त्व हैं, शरीर हे, रागादिक भाव हैं, कर्म हैं, विभाव हैं वे सब परतत्त्व हैं । अपने आपके स्वरूप को जानकर उसमें ही यह मैं हूँ इस प्रकार की अपनी प्रतीति बने तो दुःख दूर हो जायेगा । जब भी संसार के संकट दूर होंगे तो इसही उपाय से हो सकेंगे । अब इस काम को चाहे अभी कर लें चाहे अन्य किसी भव में, पर जितना जल्दी हो सके यही उपाय बना लें अन्यथा जो यहाँ के समागम की सुविधा से चूके तो पता नहीं कि कितने समय बाद अवसर मिल सकेगा? यह बहुत बड़ा संसार है जिसे हमआप एक मूली गाजर की तरह खतम कर रहे हैं । अपने आपकी सुध नहीं ले रहे हैं । अरे भाई अपनी प्रतीति रखें और परिस्थितिवश कुछ कार्य करना पड़े तो विवेक सहित तो करें । जिसमें अपनी इंद्रिय के विषयों में आसक्ति न बने, अपने में विषय कषाय न जगें, अपने कारण दूसरों को कष्ट न पहुँचे ऐसी प्रवृत्ति, बनावें और अन्य सब अनर्थ के काम है जिनसे अपनी कोई सिद्धि नहीं है । उन कामों का परित्याग कर दें । तो यह गुणव्रत में भी तीसरा गुणव्रत अनर्थदंडविरति व्रत चल रहा है । अनर्थदंडविरति व्रत का पालन करने से ही बुद्धि ठिकाने रह सकेगी । जो जुवा खेलना, खोटा बोलना और व्यर्थ के प्रमाद के काम करना ऐसी बातों में अपना उपयोग लगाते हैं वे आत्मा की ओर टिक नहीं पाते । जो पुरुष इन सब प्रकार के अनर्थों का त्याग करता है वह पुरुष अहिंसाव्रत का पालन करता है अर्थात् अपने आपके स्वरूप की रक्षा करता है ।


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