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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 148

From जैनकोष



रागद्वेषत्यागान्निखिलद्रव्येषु सांयमवलंब्य ।

तत्त्वोपलब्धिमूलं वहुश: सामायिकं कार्यम् ।।148।।

सामायिक शिक्षाव्रत नामक चतुर्थशील का वर्णन―अहिंसाव्रत की रक्षा के लिए 7 शील बताये गए थे तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत । उनमें 3 गुणव्रत का तो वर्णन हो चुका, अब शिक्षाव्रत का वर्णन कर रहे हैं, जिन व्रतों के पालने से मुनिधर्म की शिक्षा मिले उसे शिक्षाव्रत कहते हैं । प्रथम शिक्षाव्रत का नाम है सामायिक, दूसरा शिक्षाव्रत है प्रोषधोपवास, तीसरा शिक्षाव्रत है भोगोपभोग परिमाण और चौथा शिक्षाव्रत है अतिथिसम्विभागव्रत । तो चार व्रतों से मुनिधर्म की शिक्षा मिलती है । सामायिक का अर्थ है समतापरिणाम बनाना । गृहस्थ अपनी कुछ सामायिक की क्रिया से कुछ समाधि के पाठ स्तवन से सामायिक में किए जाने वाले चिंतन से समताभाव ग्रहण करने का उद्योग करता है और समता मुनिधर्म है । मुनि और किसका नाम है? जिस आत्मा में रागद्वेष न हो, पक्षपात न हो, केवल एक अपने आत्मतत्त्व की धुन बनाये हुए जो समस्त आरंभ परिग्रहों से निवृत्त हो गया हो उसे मुनि कहते हैं । मुनि समता के पुंज होते हैं, उनके शत्रु तथा मित्र दोनों में समता का भाव रहता है ।

मुनिराज की परमसामायिक का एक दृष्टांत―जब श्रेणिक राजा ने ईर्ष्या करके एक जंगल में जाकर मुनि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया सांप डालकर आये तो श्रेणिक ने रानी को चिड़ाना शुरू किया, और फिर बताया कि हम तुम्हारे साधु के गले में सांप डालकर आये हैं । रानी चेलना बोली कि तुमने जो कुछ किया वह अपनी बुद्धि के अनुसार ठीक किया लेकिन यदि वह हमारे साधु हैं तो उस स्थान से चिगे न होंगे, वे उसी मुद्रा में वहीं विराजमान् होंगे । राजा श्रेणिक बोला―अरी बावली दो तीन दिन हो गये, वे तो कही के कहीं चले गए होंगे, सांप को हाथ से पकड़कर फेंक दिया होगा । तो चेलना बोली―नहीं ऐसा नहीं हो सकता, चलो उनके दर्शन करने चलें । जब उस जंगल में दोनों गए तो देखा कि वे मुनिराज उसी मुद्रा में बैठे थे, दो तीन, दिन हो गए थे, सांप गल गया था, चींटियां चढ़ गई थीं । उस दृश्य को देखकर श्रेणिक राजा को बड़ा पश्चाताप हुआ, सोचा, अहो ! मैंने ऐसे ज्ञानी योगी पर उपसर्ग किया । श्रेणिक सांप को हटाने लगा तो चेलना ने रोक दिया, कहा रुको, इस तरह सांप को नहीं हटाया जा सकता । ऐसा करने में इन चींटियों को बाधा होगी । सो थोड़ी-सी शक्कर नीचे डाल दी, सारी चींटियां उतर आयीं तब बड़ी सुकुमाल वृत्ति से उस सर्प को गले से निकाला । उपसर्ग दूर हुआ । उपसर्ग दूर होने पर ज्यों ही साधु की आँख खुली और देखा तो ये शब्द निकले उन मुनिराज के मुख से―उभयो धर्मवृद्धिरस्तु । दोनों को धर्मबुद्धि हो । ये शब्द सुनकर श्रेणिक के चित्त में और अधिक परिवर्तन हुआ । धन्य हैं ये मुनिराज । मैं तो उपसर्ग करने वाला पापी और यह रानी चेलना शुद्ध सम्यग्दृष्टि, धर्मात्मा, दोनों को देखकर भी मुनि के चित्त में यह बात न आयी कि यह तो धर्मात्मा है मित्र है, उपसर्ग हटाने वाली है और यह उपसर्ग करने वाला है, शत्रु और मित्र का परिणाम इन महाराज के नहीं है । तब और अधिक पछतावा हुआ, ओह ! मैंने कितना अनर्थ किया, अपने को उसने बहुत धिक्कारा और यह निर्णय किया कि अपनी ही तलवार से मैं अपना सिर उड़ा दूं । अब जीने का क्या काम है? तब मुनिराज ने कहा कि हे श्रेणिक ! तुम क्यों आत्मघात का विचार कर रहे हो? श्रेणिक ने सोचा―ओह ! यह तो हमारे मन की भी बात जान गए । इतना विशिष्ट ज्ञान है । और अधिक प्रभाव पड़ा, उस समय जो पछतावा किया तो समझिये कि उपसर्ग किया, उससे तो 7वें नरक का बंध हुआ था और अब जो निर्मल परिणाम हुआ पछतावा हुआ तो उसमें इतना विशुद्ध परिणाम हुआ कि पहले नरक की ही स्थिति रह गई । अब आप समझें कि शायद 80-84 हजार वर्ष की स्थिति रह गयी । 7वें नरक की 33 सागर की आयु के सामने ये हजार लाख वर्ष क्या गिनती रखते हैं? कितना बड़ा सागर होता है, उसको उपमा में आचार्य ने बताया है । गणना तो हो ही नहीं सकती थी । कल्पना करो कि दो हजार कोश का लंबा, चौड़ा, गहरा कोई गड्ढा हो और उसमें कोमल बालों के छोटे-छोटे टुकड़े, जिनका दूसरा टुकड़ा न हो सके, उन्हें खूब दबाकर भर दिया जाये और उस पर हाथी चलवा दिया जाये ऐसा ठोस भरा जाये, फिर प्रत्येक 100 वर्ष बाद एक बाल निकाला जाये, यों जितने वर्षों में वे सब बाल के टुकड़े निकल आयें उतने समय का नाम है व्यवहारपल्य । व्यवहारपल्य से असंख्यातगुणे काल के होते हैं उद्धारपल्य और उससे असंख्यात गुणे काल के होते हैं, अद्धापल्य । एक करोड़ अद्धापल्य में एक करोड़ अद्धापल्य का गुणा करके जो आवे उसका नाम है एक कोड़ाकोड़ी अद्धापल्य―ऐसे ऐसे 10 कोड़ाकोड़ी अद्धापल्य का एक सागर होता है, ऐसे ऐसी 33 सागर की आयु बंधी थी श्रेणिक राजा की, लेकिन गुरुभक्ति के प्रसाद से, गुरु के गुणों में तीव्र अनुराग होने के प्रसाद से सारी स्थिति कम हो गई केवल कुछ ही हजार वर्ष की स्थिति रह गई, आप सोचिये कि मुनि समता के पुंज होते हैं ।

सामायिकव्रत की शिक्षाव्रतरूपता―सामायिक व्रत में समता की शिक्षा मिलती है इसलिए सामायिक व्रत का नाम शिक्षाव्रत में रखा गया है । रागद्वेष का त्याग होने से समस्त इष्ट और अनिष्ट समता भावों को अंगीकार करके सामायिक करना चाहिए । यह सामायिक आत्मतत्त्व की प्राप्ति का मूल कारण है । सामायिक के प्रयत्न से यह गृहस्थ आत्मतत्त्व का अनुभव कर सकता है । सामायिक में प्रथम तो चारों दिशावों के पूज्य पुरुषों को नमस्कार किया गया, फिर बैठकर परमेष्ठी का स्मरण करना, बारह भावनाओं का चिंतन करना और कुछ समय ऐसा भी बिताना कि सर्व चिंतन रोककर परमविश्राम से रहना । ऐसी सामायिक की क्रिया में आत्मतत्त्व के अनुभव का अवसर मिलता है । समता परिणाम जागृत होता है, ऐसा सामायिक नामक शिक्षाव्रत गृहस्थ को अहिंसाव्रत की रक्षा के लिए नियम से पालन करना चाहिए ।


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