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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 38

From जैनकोष



न हि सम्यग्व्यपदेशं चरित्रमज्ञानपूर्वक लभते ।

ज्ञानानंतरमुक्तं चारित्राराधनं तस्मात् ꠰꠰38।।

अज्ञानपूर्वक चारित्र में समीचीनता का अभाव―जो अज्ञानपूर्वक चारित्र है वह सम्यक् नाम नहीं पाता । चारित्र संयम आदि धारण कर रहा तो उसका सम्यक नहीं है, चारित्र सही चारित्र नहीं है, सही संयम नहीं, इसी कारण से सम्यग्ज्ञान के पश्चात् चारित्र का आराधन बताया । पहले सम्यग्दर्शन की आराधना, फिर सम्यग्ज्ञान की आराधना, फिर सम्यक्चारित्र की आराधना का जो क्रम से प्रतिपादन है । उसका तथ्य यह है कि सर्व प्रथम सम्यक्त्व चाहिये ꠰ सम्यक्त्व के बिना मोक्षमार्ग का प्रारंभ नहीं है । किसी भी काम में यदि विश्वास नहीं है तो उस काम को पूरा कर नहीं सकता । रसोई लोग बनाते हैं तो पूरा विश्वास है कि इह तरह से बनाया जाता है और बन जाता है । आटे से रोटी बन जाती है और विश्वास भी होता । कहीं ऐसा तो नहीं कि कभी यह ख्याल करें कि आज कहो धूल से रोटी बने । तो सबसे पहिले विश्वास की आराधना बतायी है और सम्यक्त्व के होते ही जो ज्ञान था वह सम्यक् बन जाता है । सो सम्यग्ज्ञान सम्यग्दर्शन के साथ ही होता किंतु सम्यग्दर्शन है कारण और सम्यग्ज्ञान है कार्य । जैसे दीपक जब जलाया जाता तो दीपक का जलना और प्रकाश होना ये दोनों एक साथ होते हैं । फिर भी दीपक तो कारण है और प्रकाश कार्य है इसी तरह सम्यक्त्व के होते ही ज्ञान सम्यग्ज्ञान होता है लेकिन ज्ञान सम्यग्ज्ञान क्यों हो गया । उसका कारण यह बताया जायेगा कि सम्यग्दर्शन हो गया । इस कारण ज्ञान भी सम्यग्ज्ञान है । तो सम्यक्त्व कारण है, इससे सम्यक्त्व की आराधना पहिले हैं । सम्यग्ज्ञान कार्य है तो सम्यग्ज्ञान की आराधना को इसके बाद बताया है और सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान न हो तो चारित्र सम्यक्चारित्र नहीं होता । वे दोनों कारण हैं सम्यक्चारित्र होने में । अत: सम्यक्चारित्र की आराधना को पीछे बताया है । तो सम्यग्ज्ञान न होवे और कोई पुरुष पांच पापों का त्याग करे, गुप्ति समिति महाव्रत जो भी संयम बताये हैं उनका भार धारण करे तो भी वह चारित्र भार है, सम्यक्चारित्र नहीं है, क्योंकि करना क्या था, अपना उपयोग अपने आत्मा में मग्न हो जाये, मोक्षमार्ग में इतना ही काम करने को है किंतु जहाँ ज्ञान नहीं है अपना, तो मग्न होवे कहां? जब आत्मा का भान ही न हो तो उपयोग जमेगा कहां? जव उपयोग आत्मा में जम नहीं सका तो जो चारित्रपालन है वह भार है । जरा-जरा सी बात पर क्रोध आता, अहंकार बसा रहता, मैं मुनि हूं, तपस्वी हूँ, इस प्रकार के भाव उठते हैं ।

पर्यायबुद्धि में चारित्र की भाररूपता―जिसको यह भान हो गया कि मैं एक विशुद्ध ज्ञानानंद का पिंड हूँ, जिसका कोई नाम नहीं और अगर नाम धर दे तो वही नाम सबका है । यदि एक ही नाम सब का हो तो फिर नाम की किसे पड़े? आत्मा का तो कोई नाम ही नहीं है और नाम कोई रखा जाए तो वह नाम सब आत्माओं का एक समान है । जब सब एक नाम वाले हैं अर्थात नामरहित हैं तो ऐसा ज्ञान करने वाले जो पुरुष हैं वह विषय कषायों के जाल में नहीं फंसते और दूसरों से किसी भी प्रकार की शंका और आशा नहीं रखते । पर जिन्हें आत्मा का बोध नहीं है उनका चारित्र तो भार है अर्थात् अंतरड्ग में तृप्ति न जगे और चारित्र व्रत कार्य पालन का खेद अनुभव करे तो वह चारित्र भार है । जैसे बिना जाने कोई औषधि का सेवन करे तो उसका मरण संभव है । इसी तरह बिना ज्ञान के चारित्र का सेवन करे तो संसार की वृद्धि होना संभव हैं । मान लो कभी कुछ पुण्य कार्य भी बन गया तो उसका पुण्य कार्य कितना? देव गति में उत्पन्न हो जाये फिर आगे रहा क्या? रहा, तो संसार में ही । जब तक इस शरीर में जीव है तब तक नाक, आंख, कान ये सब कार्य करते हैं और जब जीव निकल गया तो ठीक वह सब ढांचा है मुर्दा में । वही नाक आंख कान वे ही सब हेर फेर के साथ, पर वे सब इंद्रियां बेकार हैं । देखो मनुष्यों का या किसी भी जीव का प्रेम है किससे? परिवार से मित्र से जिससे भी प्रेम किया जा रहा है यह तो पूछो कि यह प्रेम किससे किया जा रहा है? जीव से किया जा रहा है या शरीर से किया जा रहा है । जीव से तो किया नहीं जा रहा है क्योंकि जीव अमूर्त है । केवल ज्ञानानंद स्वरूप मात्र है । उस चैतन्यस्वरूप की दृष्टि है कहां? जीव को लक्ष्य में रखकर कोई प्रेम नहीं जता रहा और शरीर से प्रेम करता कौन? जीव निकल जाता तो शरीर तो वही है, मरने के बाद यही पड़ती है कि इसे जल्दी यहाँ से उठा ले जायें । घर के लोग भले ही मुर्दा को रोकते हैं, अरे न ले जावो और पंच लोग अगर यह कह दे कि अच्छा धरा रहने दो यहीं, हम लोग जाते हैं तब फिर वे ही घर के लोग हाथ जोड़कर कहते हैं कि अच्छा भाई इसे जल्दी यहां से ले जावो । जीव के निकल जाने के बाद मृतक शरीर से कोई प्रीति नहीं करता । न कोई जीव से प्रेम करता, न कोई शरीर से प्रेम करता । बात तो यह है कि आत्मा में राग का उदय आया, उस उदय की प्रेरणा में इससे नहीं रहा जाता और राग करता है तो जिसका सही ज्ञान है उसकी प्रवृत्ति तो सही रहती है । सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान है तो चारित्र सम्यक्चारित्र है अन्यथा सम्यक᳭चारित्र नाम नहीं हो सकता ꠰


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