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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:पुरुषार्थसिद्धिउपाय - श्लोक 39

From जैनकोष



चारित्रं भवति यत: समस्तसावद्ययोगपरिहरणात् ।

सकलकषायविमुक्तं विशदमुदासीनमात्मरूपं तत् ।।39।।

निष्पाप निष्कषाय आत्मस्वरूप की चारित्ररूपता―चारित्र तो सर्वप्रकार की पाप प्रवृत्तियों को दूर करने से होता है । पाप पांच प्रकार के हैं―हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह । पांच पापों का योग दूर हो तो चारित्र होता है । तो जहाँ चारित्र हे वहाँ पांच पापों की प्रवृति नहीं है । और सभी प्रकार की कषायें नहीं हैं । जितने अंश में कषायें दूर हैं उतने अंश में चारित्र समझिये । चारित्र कषाय रहित होता है और वह स्पष्ट है, आत्मा का सहजस्वरूप है । आत्मा ज्ञानमात्र है, आत्मा सर्वप्रदेशों में मात्र जानन का काम करता रहता है । ज्ञानमय ऐसा ज्ञानस्वरूप अपने आपका अनुभवन करना और स्थिरता से उसमें ही उपयोग बनाये रहना यह जो चारित्र है वह आत्मा का स्वरूप है । आत्मा को धर्म करने के लिये बाहर से कोई चीज लानी नहीं पड़ती । कोई कहता कि मेरे पास पैसा नहीं है, धर्म कैसे करूं, यात्रा कैसे करूं, यात्रा न कर सका तो धर्म कहां से हो? धर्म के लिये पैसे की अटक नहीं । धर्म के लिये तो सम्यक्त्व चाहिये, सम्यग्ज्ञान चाहिये और सम्यक्चारित्र चाहिये । ये जहाँ हो वही धर्मपालन है । लेकिन जब ऐसे धर्म का पालन नहीं हो पाता अपने आपमें अपने को तृप्ति नहीं जग पायी तो ऐसी स्थिति में भाव क्या होता है? यात्रा के, और भी वंदना आदिक करता है यह जीव, पर धर्म के लिये तो सम्यक्त्व की अटक है ꠰ सम्यक्त्व न हो तो धर्म नहीं है पर पैसों की अटक नहीं । कोई कहे मेरे पास कोई दूसरा साथी नहीं है, मैं धर्म कैसे करूं? तो धर्मपालन करने के लिये क्या साथी की या नौकर की आवश्यकता है? वह तो अपने उपयोग के स्वाधीन बात है । जब दृष्टिपात किया अपने सहज स्वरूप पर और मेरी स्वरूप में मग्नता जगे तो धर्म पालन हो गया । धर्म कहो, चारित्र कहो, समतापरिणाम कहो, कषायरहित आत्मा कहो सबका एक अर्थ है ꠰ चारित्र होता है समस्त सावद्य योगों के परिहार से । चारित्र होता है सर्वप्रकार के कषायों के अभाव से । चारित्र एक उत्कृष्ट चीज है और वह आत्मा का स्वरूप है । तो उस सम्यक्चारित्र की बात इस प्रकरण में कही जा रही है जहाँ मोह और क्षोभ नहीं है । क्षोभ का अर्थ है रागद्वेष । जहाँ मोह रागद्वेष नहीं हैं, वहाँ चारित्र है ꠰ और यह चारित्र निर्मल उदासीन आत्मा का स्वरूप है ।

चारित्र की निष्कषायता का विवरण―समस्त कषायकों का अभाव होने से यथाख्यात चरित्र होता है, इससे पहले भी चारित्र नाम है । जब छठवें गुणस्थान में मुनि है, उस के यथाख्यात चरित्र तो नहीं है फिर भी चारित्रवान् होता है । लेकिन यहाँ संज्वलन कषाय का उदय है तो वहाँ वास्तव में सम्यक् चारित्र नाम नहीं बना परिपूर्ण दृष्टि से । जैसे वास्तव में तो औपशमिक चारित्र होता है 11 वें गुणस्थान में लेकिन 8वें गुणस्थान में औपशमिक भाव मानते हैं तो कारण यह है कि यहाँ कषाय के उपशमन का विधान शुरू कर दिया है ऐसा औपशमिक 8वें गुणस्थान में बताया है । वास्तव में चारित्र है यथाख्यात जहाँ वीतराग अवस्था है वहाँ है वास्तविक चारित्र, लेकिन उससे पहिले भी उसही चारित्र का ख्याल करके साधना की जा रही हो तो उसे भी सम्यक्चारित्र कहते हैं । स्वभाव चारित्र है कि नहीं? एक प्रसंग के निकट की यह चर्चा है । जिस समय यह जीव सामायिक छेदोपस्थापना आदिक चारित्रों में है । उस समय उसकी ओर उपयोग है वह विशुद्ध परिणाम से बढ़ा हुआ है और विशुद्धता मंदकषाय का नाम है । जितने अंश में कषाय मंद है उतने अंश में इसका चारित्र बढ़ा है । स्वभाव चारित्र का नाम पा रहा । चारित्र का नाम है रागद्वेष मोहरहित निर्विकार शुद्ध चैतन्य का, शुद्धपरिणाम का, किंतु उसके नीचे उसही के अर्थ जो प्रक्रिया बनायी जा रही है वह भी सम्यक्चारित्र नाम पाती है । देव, शास्त्र, गुरु, शील, तप, व्रत, संयम आदिक में जो अंतरड्ग प्रवृत्ति होती है वह तो मंदकषाय ही है । जब विषयों में प्रवृत्ति होती है तब में और जब व्रत आदि में प्रवृत्ति होती है तब में अंतर है । विषयकषाय आदि में प्रवृत्ति वाला राग मंदराग वाला नहीं है पर दान, पूजा व्रत शील आदि की इच्छा हो तो यह मंद कषाय है । तो दान पूजा आदिक प्रवृत्ति में क्रोध मान, माया, लोभ आदिक प्रवृत्ति नहीं है । करे वह अगर, तो दान नहीं है । कोई बुरे मार्ग में ही रहे और कषाय में आकर दान दे तो क्या वह दान हो गया? जो विशुद्धभाव सहित दान है उसमें क्रोध का नाम नहीं है, कोई अहंकार सहित दान दे तो उसने पैसा भी लुटाया और धर्म भी न हुआ । तो जो दान पूजा तप आदिक शुभ राग की परिणतियां हैं उनमें क्रोध, मान, माया, कषायें तो हैं नहीं । है जरा प्रीति की अपेक्षा लोभ । धर्मात्मावों में प्रीति है । दुःखीजनों में प्रीति है तो वह संसार का प्रयोजन लिये हुए नहीं है । दान पूजा करने में जो रागभाव आता है वह संसार का प्रयोजन लिए हुए नहीं है ।

लक्ष्य और लक्ष्यप्रगति में प्रवर्तन―लक्ष्य हमारा विशुद्ध है और जिस लक्ष्य के लिए हम बढ़ते हैं? उस मार्ग में देव शास्त्र गुरुता का प्रकरण और प्रसंग आता है । कोई सा भी काम आप करें, आपको तीन बातें आवश्यक होंगी । एक आदर्श रूप काम में जो हो उसका ख्याल रहेगा और उस काम को बनाने वाली वचन विधि भी काम आयेगी और मौके पर निकट जो समझदार पुरुष मिले जिससे सीखा जाये तो वह गुरु भी काम आयेगा । तो जब मोक्ष मार्ग में हम चल रहे हैं संसार के संकटों से सर्वथा छूटने का उपाय रच रहे हैं तो हमें सही मायने में देव शास्त्र गुरु का परिचय करना चाहिये और उसकी उपासना में लगना चाहिये । देव वह है जो निर्दोष हो और सर्वज्ञ हो और जिसके राग लगा है और इसी कारण वह सब जान नहीं पाता और न पदार्थों को ही जान सकता वह जीव देव नहीं है । अरहंत सिद्ध प्रभु आदि में निःशंक रुचि रखना और उसके स्वरूप का विचारकर अपने आपमें उस स्वरूप का अनुभव करना यह तो देवपूजा है । इसमें राग जरूर है पर राग अच्छे की ओर है बुरे की ओर नहीं है । यह पद्धति है जैन शासन में कि पहिले तो अशुभोपयोग छूटता है, शुभोपयोग रहता है और साथ ही यह भी जानें कि चाहे हम अव्रती हों, चाहे अणुव्रती हों, महाव्रती हों, सर्वत्र लक्ष्य हमारा एक विशुद्ध होना चाहिए । यद्यपि परिस्थिति ऐसी नहीं है कि गृहस्थ अपने आत्मा के धर्म की दृष्टि बहुत देर तक निभा सके और जिसने गृह का परित्याग कर दिया, मोह ममता नहीं रही वह इसमें बढ़ता है, पर लक्ष्य सबका एक है । चाहे अणुव्रती श्रावक हो, चाहे महाव्रती हो, लक्ष्य एक है । हम आगे बढ़ें अर्थात् आत्मा के चैतन्यरस का स्वाद लें यही लक्ष्य है सबका, पर परिस्थिति ऐसी है कि गृहस्थ सब कामों में लग नहीं पाता । जो साधुजन हैं वे ही इस शुद्धोपयोग के अधिकारी हैं । तो ज्ञानी पुरुष के जो कि देवपूजा, वंदना, स्तवन, दान, संयम, व्रत आदिक पाल रहा है उसकी मंद कषायें हैं, विषय कषायों में लगे हुए मनुष्यों की तरह अटपट नहीं है । तो इन शुभोपयोग के कार्यों को करके धर्ममय तो है नहीं पर कुछ रागरूप लोभ है । ज्ञानी पुरुष रागभाव से प्रेरित होकर शुभ मार्ग में लगा है, किंतु इस राग से हमें मुक्ति मिलेगी ऐसी श्रद्धा नहीं कर रहा है । भगवान् का पूजन करता है मगर भगवान का ऐसा पूजन करते हुए उसका ऐसा भाव है कि मैं अशुभ राग को छोड़कर रहूं इसके लिये यह पूजन किया है । इस ज्ञानी के अशुभ राग नहीं है । अशुभ राग का तीव्र बंध होता है । न्याययुक्त व्यवहार होना चाहिये, अन्याययुक्त व्यवहार रखते हुए मान लो तीर्थयात्रा ही कर रहे हो तो वह यात्रा सफल यात्रा नहीं है । अन्याय सहित कुछ भी धर्मकार्य किया जाता हो तो वह सफल कर्तव्य नहीं है । यदि ज्ञानी जीव राग से प्रेरित लगा तो है दान आदिक कार्यों में, पर उस शुभ राग को उपादेय है ऐसी श्रद्धा नहीं करता, बल्कि अपने शुद्धोपयोगरूप चारित्र की मुख्यता का ही कारण है यों जानता है जब, तब यह शुभ राग भी रहेगा तब तक शुद्धोपयोग का विकास नहीं है । यह है कि उसके चित्त में क्योंकि कोई वश नहीं है, जब राग का उदय जगा तो राग तो उठा ही । अब इस राग को हम किस जगह पटकें, इसका विवेक तो होना चाहिये । जिन विषयों में, भोगों में कामों में राग को पटक दिया तो अहित ही है । सावधानी भी न रही । सम्यक्त्व के उल्टे चल बैठे । यदि इस शुभ राग को दान पूजा आदिक कार्यों में लगा दिया जाये तो इसे आत्महित का मार्ग मिलता है । सावधानी मिल सकती है तो ज्ञानी जीव शुभ राग करता है, पर उसे उपादेयरूप से श्रद्धा नहीं करता । उसे भी चरित्र कह सकते हैं, क्योंकि वहाँ तीव्र कषाय नहीं है । इस अपेक्षा से हम शुभोपयोग को भी चारित्र कह सकते हैं ।


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