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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 137

From जैनकोष



मिच्छत्तछण्णदिट्टी दुद्धीए दुम्मएहिं दोसेहिं ꠰

धम्मं जिधपण्णत्त अभव्वजीवो ण रोचेदि ꠰꠰137꠰꠰

(535) अभव्य के जिनप्रज्ञप्त धर्म की अरुचि की संततता―जिनकी दृष्टि मिथ्यात्व से आच्छादित है ऐसे दुर्बुद्धि अभव्य जीव राग पिशाच से ग्रह जाने के कारण जिनप्रणीतधर्म की श्रद्धा नहीं करते, और जो कुवाद हैं, एकांत है उनकी रुचि बनाते हैं ꠰ जैसे एक दोहा है ꠰ “सांप डसा तब जानियो, रुचि सो नीम चबाय ꠰ मोह डसा तब जानियो, जिनवाणी न सुहाय ꠰꠰” जैसे सांप से डसा हआ मनुष्य बड़ी रुचि से नीम चबाता है ऐसे ही समझिये कि अज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव जिनवाणी से विरुद्ध बातों में बड़ी रुचि रखते हैं, जिनवाणी उन्हें नहीं सुहाती ꠰ जिनवाणी क्या ? जैन धर्म क्या ? रागद्वेष को जिसने जीता वह पुरुष कहलाता है जिन और उस जिनेंद्रदेव ने जो धर्म बताया उसे कहते हैं जैन धर्म ꠰ क्या बताया ? आत्मा का स्वभाव आत्मा का धम्र है ꠰ जो शाश्वत है, आनंदमय है, स्वरूप है, सहज सिद्ध है, उसे धर्म की जो दृष्टि करता है, उस धर्मरूप जो अपने को मानता है वह कर रहा है धर्म का पालन सो यह धर्म की बात अभव्य जीव को नहीं सुहाती ꠰ चाहे वह कितने ही शास्त्र पढ़ लो ꠰ जैसे उल्लू को दिन में न दिखेगा चाहे करोड़ों सूर्योदय आ जायें ꠰ एक का तो कहना क्या ? यद्यपि एक ही सूर्य उदय में है मगर उसकी प्रकृति बतला रहे हैं कि कितने ही सूर्य एक साथ उदय में हों, मगर उल्लू को दिन में नहीं दिखता ऐसे ही कितने शास्त्र पढ़ लिए जायें, जिनकी भीतर में उस कर्मविपाक में रुचि लगी है, इतना ही अपना सर्वस्व जानता है उसको यह जैनधर्म रुचता नहीं है ꠰

(536) अभव्य की अभव्यता का निर्देशन―अभव्य उसे कहते हैं जिससे रत्नत्रय के प्राप्त करने की योग्यता नहीं होती ꠰ जैसे एक कुड़रु मूंग होती है तो मूंग होकर भी उसे कितना ही पकाया जाये, पर नहीं पकती ꠰ अ देखिये मूंग का रूप तो उसमें पाया जाता है मगर योग्यता नहीं है पकने की ऐसे ही अभव्य जीव हैं ꠰ जाति तो जीव है जैसे भव्य है वैसे ह अभव्य हैं, जीव दोनों समान हैं और इसी जाति के कारण, केवलज्ञान का स्वभाव तो होता है, मगर केवलज्ञान व्यक्त करने की योग्यता नहीं होती ꠰ तो सदा मिथ्यात्व से आच्छादित रहने के कारण अभव्य की बुद्धि, विचार की शक्ति दूषित रहती है और सदा रागरूपी पिशाच में उसका चित्त ग्रस्त रहता है यही कारण है कि जिनेंद्र भगवान के द्वारा उपदिष्ट जैन धर्म की श्रद्धा उसे नहीं हो पाती ꠰ मैं हूं, दर्शन ज्ञान स्वरूप हूं, मेरे में आनंद सहज स्वभाव से है, मेरे को बाहर से कुछ नहीं मिलता, मेरे से बाहर कुछ टूट कर नहीं गिरता, मैं सदा पूरा हूं, अपने स्वभाव मात्र हूं ꠰ इस पूर्ण मुझको कर्तव्य ही क्या है बाहर ? हूं, पूरा हूं, निष्पन्न हूं ꠰ कुछ करना ही नहीं है बाहर ꠰ यही एक करना है, यही एक कोना है कि मैं अपने आपमें शुद्धज्ञान वृत्तियां करता रहूं और निराकुल बना रहूं, यह ही मात्र एक बात होने की है यहाँ ꠰ इसके ाद अन्य कुछ चाहिये ही नहीं ꠰ यह बात अभव्य की, अज्ञान की बुद्धि में नहीं आती ꠰


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