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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 138

From जैनकोष



कुच्छियधम्मम्मि रओ कुच्छियपासंडिभत्तिसुजुत्तो ꠰

कुच्छियतवं कुणंतो कुच्छियगइभायणो होई ꠰꠰138꠰꠰

(537) कुत्सित धर्मरत पुरुष की कुगतिभाजनता―जो खोटे धर्म का अनुरागी है वह खोटी गति का पात्र होता है ꠰ खोटा धर्म मायने जो जीव को अहिंसा भाव से अलग करे, जो आत्मस्वभाव के विपरीत बाह्य विषयों में अनुरक्ति बढ़ाने का उपदेश करे, ऐसा शास्त्र भी खोटा धर्म है ꠰ उन खोटे धर्म में जो अनुराग करे, जैसे भगवान का नाम ले लेकर चोरी सीखे, ऐसे मक्खन चुराया जाता या अन्य कुशील सीखे उनका उदाहरण ले लेकर विषयवासना में बढ़े तो वह खोटे धर्म को ही तो बढ़ाता है ꠰ तो जो खोटे धर्मों का अनुरागी है वह खोटी गति को ही प्राप्त करता है क्योंकि खोटे धर्म के अनुरागी को अपने आत्मा के सहज निज स्वरूप की सुध नहीं रहती ꠰ वस्तुत: क्या हूं मैं, यह उसके विचार में नहीं चलता है, इस कारण खोटे धर्म के अनुरागी पुरुष नियम से खोटी गति ही प्राप्त करते हैं ꠰

(538) कुत्सित पाखंडिभक्तियुक्त पुरुषों की कुगतिभाजनता―जो खोटे पाखंडियों की भक्ति से सहित हैं वे खोटी गति के पात्र होते हैं, क्योंकि जो आत्मज्ञान से परीचित नहीं, गांजा, चर्स, भाँग, आदि घोट पीकर और शिव का नाम लेकर एक विषयों का ही पोषण करें, एक दुनिया का आकर्षण बढ़ाने के लिए कमरे में रस्सी बांधकर भभूत लगाकर, बड़े-बड़े बाल रखाकर किसी भी ढंग से अपनी सेवा चाहे, ऐसे अनात्मतत्त्व के अनुरागी आत्मज्ञान से शून्य खोटे साधुवों की जो भक्ति में रहते हैं जो उन्हें हुक्का चिलम लगाकर देते हैं और अपने को उनका बड़ा सेवक समझते हैं ऐसे पुरुष खोटी गति में जन्म लेते हैं, क्योंकि आत्मा की सुध से रहित पुरुष जो-जो भी बाह्य धर्म के नाम पर क्रियायें करते वे पुरुष बाहर ही बाहर डोलते हैं और खोटी श्रद्धा पुष्ट कर करके अपने को पतित करते हैं ꠰ तो जो खोटे पाखंडियों की भक्ति से सहित हैं वे खोटी गति के पात्र होते हैं ꠰

(539) कुत्सित तप करने वालों की कुगतिभाजनता―जो खोटे तप करते हैं जैसे अग्नि तपना, उल्टे खड़ा हो जाना, समाधि ले लेना, एक पैर से खड़ा होना आदिक, ऐसे अनेक प्रकार के कुतप हैं उन तपों को तप करके कोई संतुष्ट रहें कि साधु हूं, गुरु हूं, मुझे मोक्ष मिलेगा, मोक्ष मिलने का यह ही उपाय है, यहाँ ही बाहर-बाहर जो बने रहते हैं और आत्मा का जो विशुद्ध ज्ञानस्वभाव है उसका अनुभव नहीं कर पाते हैं ऐसे पुरुष भी मिथ्यादर्शन प्रेरणा से खोटी गति को प्राप्त होते हैं ꠰ वह खोटी गति कौनसी है जिसमें ऐसे संन्यासीजन उत्पन्न होते हैं ? नरकगति ꠰ यह तो प्रकट है ꠰ तिर्यंच हो जाना भी खोटी गति हैं ꠰ भवनवासी व्यंतर ज्योतिषी हो जाना ये भी खोटी दशायें है ꠰ और स्वर्गों में भी उत्पन्न तो हो गए, मगर किल्विषिक, वाहन आदि जाति के देव बन गए तो ये भी खोटी दशायें हैं ꠰ तो ऐसे खोटे धर्म के अनुरागी, खोटे तप करने वाले ऐसे इन तुच्छ गतियों में उत्पन्न होते हैं, परिणाम यह होता कि फिर आगे खोटी गतियां मिलती हैं, जन्म मरण करते हैं और अनंत संसारी जीव बनकर रहा करते हैं ꠰ इससे जिनेश्वर देव के द्वारा जो मार्ग बताया गया है उस मार्ग की ही श्रद्धा करना, उस मार्ग पर शक्ति अनुसार चलना, यह है संसार के संकटों से छूटने का उपाय ꠰


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