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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 140

From जैनकोष



पाखंडी तिण्णि सया तिसटि᳭ठभेया उमग्ग मुत्तूण ꠰

रुंभहि मणु जिणमग्गे असप्पलावेण किं बहुणा ꠰꠰140꠰꠰

(541) कुमार्गों को छोड़कर जिनमार्ग में प्रवर्तने का उपदेश―हे मुनि ! पाखंडियों के 363 उन्मार्ग हैं उन कुमार्गों को छोड़कर तू जैनमार्ग में अपना मन रख ꠰ बहुत बोलने से क्या लाभ ? तू एक ही निर्णय रख कि जिनेंद्रभगवान ने जो मार्ग बताया है हमें उस मार्ग से ही चलकर शांति मिलेगी ꠰ विषयों में आसक्ति और कषायों के आधीन होना ये ही दो कुमार्ग हैं ꠰ विषयों में आसक्ति के मायने विषय उपभोग तो कभी करने पड़ते हैं, किंतु उनमें आसक्त होना तीव्र मोह होना और उससे ही अपना महत्त्व मानना यह आसक्ति कहलाता है ꠰ जैसे एक सिनेमा देखने की ही बात ले लो, बहुत से लोग ऐसे मिलेंगे जो कि अत्यंत वृद्ध हो गए, मरने के दिन निकट आ गए फिर भी उससे सिनेमा देखे निा नहीं रहा जाता ꠰ प्राय: करके ऐसे लोग रईस घरानों में मिलते हैं, तो यह उनकी विषयों में आसक्ति हुई ꠰ भोजन की आसक्ति तरह-तरह के भोजन बनाना, तरह-तरह से तैयार करके रखना, यह शौक क्यों लगा ? यह इच्छा क्यों है कि उसमें आसक्ति है ꠰ तो ऐसे ही पंचेंद्रिय के विषयों में आसक्त होना यह कुमार्ग है ꠰ क्रोध, मान, माया, लोभ, विषयों में लीन रहना कुमार्ग है ꠰ इन कुमार्गों को छोड़ और जिनमार्ग को ज्ञान और वैराग्य से ग्रहण कर ꠰


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