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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 149

From जैनकोष



णाणी सिव परमेट᳭ठी सव्वण्हू विण्हु चउमुहो बुद्धो ꠰

अप्पो विय परमप्पो कम्मविमुक्को य होइ फुड़ं ꠰꠰149꠰꠰

(565) ज्ञानी शिव परमेष्ठी―उस सहज ज्ञानानंद स्वभाव के आलंबन से जो भीतर पवित्रता बनी है उस पवित्रता के कारण चार घातिया कर्मों का नाश होने पर प्रभु भगवान बन जाते हैं ꠰ इसका नाम है सकल परमात्मा ꠰ स मायने सहित, कल मायने शरीर शरीरसहित परमात्मा ꠰ ये कई नामों से पुकारे गए ꠰ 1008 नाम सहस्र नाम में प्रसिद्ध ही हैं ꠰ यहां भी ये कुछ नाम कह रहे हैं ꠰ प्रभु ज्ञानी हैं, मायने ज्ञान ज्ञान ही है, ज्ञानसिवाय अन्य कुछ नहीं रहा ꠰ जैसे संसार अवस्था में उस ज्ञान में कुछ कमियां थी, दोष था, रागसहित थे, अब ये कोई विरोध न रहे, सिर्फ ज्ञानमय ही हैं ꠰ ये प्रभु शिव हैं ꠰ शिव कहते हैं कल्याण को अथवा शिवति गच्छति तो सबसे ऊपर गया है उसको कहते हैं शिव ꠰ कल्याण मय है ꠰ आत्मा अपने सही स्वरूप में रहे वहाँ सब कल्याण ही कल्याण है ꠰ प्रभु परमेष्ठी हैं, परम पद में स्थित हैं ꠰ अरहंत से बड़ा पद इस लोक में कोई नहीं है ꠰ प्रभु हैं, भगवान हैं, सिद्ध भगवान ये अपनी इस दुनिया में नहीं हैं ꠰ ये लोक के अग्रभाग पर स्थित हैं ꠰ ये अपने को दिखते हैं, हैं ये लोक में ही, पर यहां मनुष्यों को किसी को मिल जायें, दिख जायें ऐसा नहीं है ꠰ तो लोक का उत्तम पद है अरहंत भगवान का ꠰ हम आप स्वयं यह आत्मा अपने सहज स्वरूप को देखे तो यहां ही बात समझ में आयेगी कि ये अरहंत सिद्ध होना योग्य है ꠰ यहां हम आप स्वरूप में सिद्धस्वरूप हैं, पर आवरण होने से संसार में रुलते हैं ꠰ प्रभु अरहंत देव परमपद में स्थित होने से परमेष्ठी है ꠰

(566) सर्वज्ञ विष्णु चतुर्मुख―अरहंत भगवान सर्वज्ञ हैं, जो भी सत् है सबके जाननहार हैं ꠰ ज्ञान का स्वभाव ही ऐसा है कि जो है सो ज्ञान में आ जाये और ये सभी पदार्थ प्रमेय कहलाते ꠰ चूंकि सत् हैं इसलिए नियम से भगवान के ज्ञान में ज्ञेय हैं ꠰ जो भगवान के ज्ञान में ज्ञेय ही नहीं वह है ही नहीं ꠰ जो है वह नियम से भगवान के ज्ञान में ज्ञेय है, इस कारण प्रभु सर्वज्ञ हैं ꠰ अरहंत को विष्णु कहते हैं ꠰ जो ज्ञान द्वारा समस्त लोकालोक को व्याप डाले उसे कहते हैं विष्णु सो प्रभु का ज्ञान सारे लोक को जानता, अलोक को जानता, ज्ञानमुखेन इतना बड़ा विस्तार है प्रभु का ꠰ इस कारण प्रभु विष्णु है ꠰ प्रभु का नाम है चतुर्मुख ꠰ धर्मसभा में चारों ओर श्रोतागण बैठते हैं ꠰ उनके बारह सभायें गोल-गोल बनी हुई हैं, तो किसी भी ओर श्रोता हो उसे भी भगवान का मुख दिखेगा ꠰ सामने हो उसे भी दिखेगा, पीठ पीछे हो उसे भी दिखेगा, भगवान के चारों ओर बैठे हुए जीवों को भगवान का मुख दिखता है ꠰ इसी कारण भगवान चतुर्मुखी कहलाते हैं ꠰ चारों ओर उनका मुख है अथवा उनके ज्ञान का मुख चारों ओर है ꠰ सब ओर के पदार्थों को वे जानते हैं ꠰

(567) बुद्ध कर्मविमुक्त परमात्मा―निज सहज स्वभाव के आलंबन के प्रसाद से आत्मा में बसा हुआ अतुल वैभव प्रकट हो जाता है और बाह्य पदार्थों में लगाव और आशा रखने के कारण उपयोग मलिन रहता है, कर्मबंध करता है और संसार में रुलता है ꠰ तो जिन भव्य जीवों ने निज सहज स्वभाव का आलंबन लिया वे पुरुष परमेष्ठी हुए वे बुद्ध हैं ꠰ पूर्ण बोध है उन्हें ꠰ केवलज्ञान के द्वारा समस्त लोकालोक के जाननहार हैं ꠰ ऐसे ये परमात्मा कर्मविमुक्त होते हैं ꠰ जो शेष रहे अघातिया कर्म हें वे भी यहां दूर हो जाते हैं, केवल आत्मा की आत्मा रह जाये यह है पूज्य आत्मा ꠰ जिसका स्वभाव अपराध का नहीं है और वह देह के जाल में पड़ा हुआ है, कर्म की कैद में बसा हुआ है ꠰ जिस क्षण यह देह की कैद से छूटता है तो उसे अतुल वैभव प्रकट हो जाता है ꠰ ऐसे चार घातिया कर्मों के नष्ट होने पर ये आत्मा प्रभु होते हैं ꠰


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