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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 150

From जैनकोष



इय घाइकम्मुकको अट᳭ठारहदोसवज्जिओ सयलो ꠰

तिहुवणभवणपदीवो द्देउ ममं उत्तम बोहिं ꠰꠰150꠰꠰

(568) सकलपरमात्मा की अष्टादश दोषवर्जितता के प्रकरण में जन्मदोषरहितता का वर्णन―इस प्रकार ये चार घातियाकर्म से रहित हुए और 18 दोषों से रहित हुए ये तीनों लोक के प्रदीप हो जाते हैं ꠰ तो ऐसे सकल परमात्मा मुझको उत्तम ज्ञान प्रदान करें ꠰ वे 18 दोष कौनसे हैं, इसका वर्णन समंतभद्राचार्य ने किया है और हिंदी में भी इससे संबंधित दो निम्नलिखित दोहे हैं―जन्म जरा तिरषा क्षुधा विस्मय आरति खेद, रोग शोक मद मोह भय निद्रा चिंता स्वेद ꠰ रागद्वेष अरु मरणजुत ये अष्टादश दोष, नाहि होत अरहंत के सो छवि लायक मोष ꠰ जन्म नहीं, जन्म होना बहुत डा दोष है ꠰ मूल से देखो तो इस जीव को अपना जन्म पसंद नहीं, कोई उमंग नहीं ꠰ जन्म समय उसे बड़ा दु:ख होता है ꠰ उसे तो कुछ खबर ही नहीं ꠰ जो जन्मता है उस मनुष्य को जन्म समय में खुशी बिल्कुल नहीं होती, यह खुशी तो आप लोग ही मानते हैं ꠰ पुरुष के जन्म का एक बड़ा समारोह करते हैं और उस जन्म लेने वाले बेचारे बच्चे को कुछ भी सुध बुध नहीं ꠰ उसमें तो कुछ भी उमंग नहीं होती, किंतु वह जीव दु:ख मानता है और दूसरे के जन्म को सुनकर वह सुख मानता है ꠰ जन्म तो दोष है, पर यह स मोह की लीला है ꠰ आत्मा का सिवाय आत्मस्वरूप से अन्य कुछ नहीं है ꠰ कर्म लिपटे कैसे है ? ये मोह से ꠰ न जाने किन-किनको यह जीव अपना मानता है, यही तो मेरे खास हैं ऐसा समझता है ꠰ ऐसी श्रद्धा बिगड़ी हो वहाँ कष्ट है ꠰ गुजारा करने के लिए राग करना और बात है और भीतर में उनको अपना समझना यह बड़ा कलंक है ꠰ यह जीव पक्षी की भांति आज यहां है, कल कहीं है, इसका क्या रखा है बाहर ? हां गुजारा करने के लिए व्यवहार और राग किया जाता है किंतु उनको अपना सर्वस्व मान लेना―यह एक कलंक है, जिसके कारण इस जीव को अज्ञान अँधेरा छाया है, संसार में जन्म मरण के दु:ख पाता है ꠰ तो जन्म एक बड़ा दोष है ꠰ जन्म के बाद किसी का कल्याण नहीं होता, बल्कि मरण के बाद कल्याण होता है ꠰ अरहंत भगवान के मरण को लोग निर्वाण कहते हैं ꠰ वह शरीरसहित परमात्मा हैं ꠰ उनके आयु का उदय है ꠰ जिस समय आयु पूरी होती है अरहंत भगवान की तो उनको मोक्ष मिलता है ꠰ तो मरने के बाद कल्याण तो मिल गया, मगर जन्म के बाद तुरंत कल्याण किसको मिला ? तीर्थंकर ही जन्मे, पर जन्म के बाद वह पवित्र तो नहीं हुए, अष्ट कर्म रहित तो नहीं हुए, बच्चे हैं रहते हैं, तीर्थंकरों की शादी भी होती है, तीर्थंकरों के पुत्र भी होते हैं, राज्य भी होता है तो यह कोई कल्याण की बात नहीं ꠰ भले ही वे मोक्ष जायेंगे, भगवान बनेंगे, सो हम उनके जन्म के भी गुण गाते हैं, पर यदि आगे ये भगवान न बनते तो जन्म के गुण कैसे गाये जाते ? जैसे अनेक जीव जन्म लेते वैसे ही उन्होंने भी जन्म ले लिया ꠰ तो जन्म के बाद कल्याण किसी का नहीं होता, मरण के बाद कल्याण हो सकता है ꠰ एक बात, दूसरी बात यह कि जन्म के समय समतापरिणाम किसी ने भी नहीं रखा है, और कोई ज्ञानी हो तो मरण के समय समतापरिणाम रख सकता है, समाधिमरण कर सकता है ꠰ पर समाधिजन्म किसी का नहीं होता ꠰ तो जब जन्म के समय समतापरिणाम होता नहीं किसी के तो समता का ही तो नाम कल्याण है ꠰ रागद्वेष न रहना इसे कल्याण कहते हैं ꠰ जन्म के समय रागद्वेष का अभाव किसी के नहीं होता ꠰ मरण समय में रागद्वेष न करें, इस पर कुछ बल चलता है, गुरुजन भी उपदेश करते हैं, उससे वह अपना ज्ञानबल संभालता है ꠰ तो यहां यह बात बतला रहे हैं कि मरण से जन्म बुरा है ꠰ यह बात उसकी कह रहे जो अपना कल्याण करेगा ꠰ हां इस जिंदगी में जीकर वह अपने कल्याण का उपाय बना सकता, मगर कल्याण अभी नहीं हो पाया ꠰ मोक्ष मिलेगा उसे आयुक्षय के बाद ꠰ जब तक आयु का उदय है तब तक जीवन को मोक्ष नहीं मिलता ꠰ तो यहां यह बतला रहे कि जन्म एक दोष है ꠰

(569) जरा तृषा क्षुधा विस्मय का प्रभु में अभाव―जरा (बुढ़ापा) यह बड़ा दु:खमय है ꠰ शरीर शिथिल हो गया, इंद्रियां शिथिल हो गई, कोई परवाह नहीं करता, तो वह एक दोष है, तृषा-प्यास लगना दोष है ꠰ प्यास लगे बाद जब पानी मिलता तो आनंद तो मानता यह जीव, मगर वह आनंद कहां ? उस दु:ख की थोड़े समय की शांति है, फिर दु:ख हो जायेगा ꠰ और, ऐसा पानी मिलने से क्या लाभ कि पहले तड़फे फिर पानी मिले, फिर कल्पना करे, सुख मिले, फिर प्यासे हो जाये, फिर पानी ढूंढ़ें तो यह दोष है ꠰ सिद्ध भगवा नके शरीर नहीं है ꠰ सारे दोष उनके दूर हो गए, भूख क्षुधा, खाने की इच्छा यह भी दोष है ꠰ अरहंत भगवान के 18 दोष नहीं हैं, यह बात बतला रहे हैं ꠰ अरहंत भगवान न प्यासे होते, न भूखे होते, कितनी एक विलक्षण बात है कि शरीर बना हुआ है और करोड़ों वर्षों तक अरहंत भगवान बिना खाये पिये विहार करते हैं, दिव्यध्वनि खिरती है, उपदेश होता है ꠰ तो बात यह जाने कि खाने से ही जीवन टिकता है यह नियम न रहा ꠰ आयु का उदय बना रहने से जीवन टिकता है ꠰ अब इसे लोग अपने ऊपर घटाते हैं, सो ऐसा लगता है कि खाये बिना कोई शरीर में कैसे रहेगा ? तो यह अपनी निगाह से परखने की बात है, किंतु अरहंत भगवान जिनका शरीर निर्दोष हो गया उनके क्षुधा तृषा की पीड़ा नहीं होती ꠰ विस्मय आश्चर्य भी नहीं होता ꠰ आश्चर्य उन्हें होगा जो जानते नहीं है, और कोई बात विलक्षण दिख गई तो आश्चर्य होता है ꠰ भगवान तो सब जान रहे हैं ꠰ जब सब ज्ञात हो गया है तो किसी बात पर भी उन्हें आश्चर्य नहीं हो सकता ꠰

(570) प्रभु के पीड़ा, खेद, शोक, मद, मोह भय का अभाव―प्रभु को किसी प्रकार की खेद पीड़ा नहीं ꠰ आनंद से अप्रीति नहीं है, अनिष्ट ही कुछ नहीं है ꠰ सबके ज्ञाता दृष्टा हैं, रोग नहीं, शोक नहीं, घमंड नहीं, मोह नहीं, ऐसा जो यह चारित्र संबंधी दोष है वह भी नहीं, शरीरसंबंधी दोष है वह भी नहीं ꠰ देखो मुनि अवस्था में शरीर में निगोदिया जीव बहुत रहते थे ꠰ जैसे कहते हैं ना कि आलू शकरकंदी में निगोदिया जीव हैं और हम आपके शरीर में भी अत्यंत निगोदिया जीव हैं ꠰ तो जो मुनि हैं उनके शरीर में भी निगोदिया जीव हैं ꠰ पर उन मुनियों के जब समाधि साधना के बल से मोहनीय कर्म दूर हो जाते हैं, 12वें गुणस्थानों में आ जाते हैं तो उनके शरीर में निगोदिया जीवों का जन्म होना बंद हो जाता है ꠰ जो रहे हैं वे सब चले जाते हैं ꠰ और इसीलिए बतलाया कि भगवान का शरीर पवित्र है स्फटिक मणि की तरह ꠰ उनके शरीर की छाया नहीं पड़ती ꠰ जैसे―स्फटिक मूर्ति की छाया नहीं पड़ती, कांच की छाया नहीं पड़ती ꠰ दोनों ओर से साफ कांच हो और धूप में रख दिया जाये तो कहां छाया पड़ेगी ? मानो थोड़ीसी छाया पड़ भी गई हो, मगर भगवान के शरीर की छाया नहीं पड़ती, उनका देह स्फटिक मणि की तरह हो जाता है ꠰ निगोदिया जीव समाप्त हो जाते, धातु उपधातु भी सही शुद्ध रूप से हो जाते ꠰

(571) प्रभु के निद्रा चिंता स्वेद राग द्वेष मरण का अभाव―प्रभु के नींद नहीं, पलक नहीं झपकती, करोड़ों वर्ष भी वे अरहंत अवस्था में रहते हैं, मगर निश्चल होती उनकी पलक, जैसा कि अर्द्ध उठा सूर्य रहता है ꠰ कितना उनका अनंत बल है ꠰ अब यही देख लो, किसी से कहें कि तुम अपनी आंखों की पलक न भांजो, न उठाओ, न गिराओ, ज्यों की त्यों रखो तो भले ही कोई इस तरह से करने की कोशिश करे मगर वह सफल नहीं हो सकता हां कोई समर्थ पुरुष हो तो वह जरा देर तक एक पलक से देख सकेगा, मगर फिर त्यों का त्यों, और कमजोर पुरुष तो तुरंत ही पलक भांज लेगा ꠰ पर भगवान के नेत्र अर्द्धमीलित निश्चल रहते हैं ꠰ भगवान के निद्रा का दोष भी नहीं होता, पसेव (पसीना) भी उनके शरीर से नहीं निकलता ꠰ उनके मोहनीय कर्म नष्ट हो गए इसलिए रागद्वेष भी उनमें नहीं होता और उनके मरण भी नहीं ꠰ यद्यपि आयु कर्म के क्षय का नाम मरण है और उसे कहते हैं पंडितपंडितमरण ꠰ अरहंत भगवान मोक्ष जाते हैं तो उसे चाहे यह कहो कि उनका निर्वाण हो गया, चाहे कहो पंडित-पंडितमरण हो गया, दोनों का एक ही अर्थ है, पर चूंकि हम आप लोग मरण शब्द को बुरा समझते हैं, सो अरहंत भगवान के नाम में मरण शब्द नहीं जोड़ना चाहते ꠰ किसी निर्वाण शब्द से कहते हैं, पर मरण लोकव्यवहार में उसे कहते हैं कि जिसके बाद जन्म हो वह मरण ꠰ प्रभु का आगे जन्म तो होगा नहीं, इसलिए उनके इस मरण को निर्वाण कहते हैं अथवा जो मरण के बाद जन्म हो ऐसा मरण नाम का दोष अरहंत भगवान के नहीं होता ꠰ इस प्रकार 18 दोषों से रहित ये अरहंत भगवान तीनों लोक के भवन के प्रदीप हैं अर्थात् तीनों लोक के ज्ञाता है, सो उनके गुणों के स्मरण के प्रसाद से मेरे को उत्तम बोधि प्राप्त हो ꠰ मेरे को वह कुंजी रूप बोध मिले जिसके प्रसाद से यह केवलज्ञान अवस्था प्रकट होती है ꠰ वह क्या है ? आत्मा के सहज ज्ञानस्वरूप का बोध होना ꠰


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