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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 159

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चक्कहररामकेसवसुरवर जिणगणहराइसोक्खाइं ।

चारणमुणिरद्धीओ विसुद्धभावा णरा पत्ता ।।159।।

(591) सम्यग्दृष्टि के ही विशिष्ट पुण्यसंपदा का लाभ―विशुद्ध भावों के धारण करने वाले भव्य पुरुष जब तक उनका मोक्ष नहीं हुआ तब तक वे बड़े वैभव को प्राप्त होते हैं । और यह भी समय बहुत कम होता है जिसके बाद वे मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं । ऐसे ही जगत में वैभव क्या है? चक्रवर्ती का वैभव । जो दुनिया के सबसे ऊंचे वैभव हैं वे मिथ्यादृष्टियों को प्राप्त नहीं होते । हां इतनी बात जरूर है कि जब सम्यग्दृष्टि थे, विशिष्ट पुण्यबंध हुआ, बड़ा वैभव प्राप्त हुआ और अब मिथ्यादृष्टि हो गए, यह बात तो हो सकती है, मगर जो ऊंचे से ऊंचा वैभव है वह वैभव सम्यग्दर्शन हुआ हो तब ही प्राप्त हो पाता है । मिथ्यात्व के साथ इतना विशुद्ध भाव किसी के नहीं जग सकता है, जिसमें ऊंचा पुण्य का बंध हो सके । पुण्य बंध मिथ्यादृष्टि भी करते, मगर उत्कृष्ट पुण्यबंध मिथ्यादृष्टि नहीं करते । तो जो जिनभावना से सहित हैं ऐसे पुरुष उत्कृष्ट वैभव को प्राप्त करते हैं, चक्रवर्ती का वैभव प्राप्त करते हैं । भले ही कोई चक्रवर्ती मिथ्यादृष्टि हुआ है और नरक तक भी गया, मगर चक्रवर्ती ने जो कुछ कमायी की है वह चक्रवर्ती के भव में कमायी नहीं की । जैसे आपको जो कुछ वैभव प्राप्त है वह आपके इस भव के पुरुषार्थ का फल नहीं है, वह पूर्वभव के पुरुषार्थ का फल है । तो चक्री को जो वैभव प्राप्त हुआ है सो उसके पूर्वभव में कमाये हुए पुण्य का फल है । बलभद्र हुए नारायण हुए, इनके भी ऊंचे वैभव होते हैं । यह भी सम्यग्दर्शन के बिना इनका पुण्यबंध नहीं होता जैसा कि इनको वैभव मिला । बताया है कि नारायण अपने भव के बाद पाताल लोक की यात्रा करता है, अधोलोक में जाता है और मिथ्यादृष्टि भी हो गया, लेकिन यह सम्यग्दृष्टि जब था तब इसके ऐसा सातिशय बड़ा पुण्यबंध था कि जिसके कारण ये पद प्राप्त हुए । बलभद्र और नारायण ऊंचे स्वर्गों से अवतार लेकर यहाँ नारायण और बलभद्र बनते हैं । बात यह बतला रहे हैं कि सम्यग्दर्शन के साथ ही वह निर्मलभाव विशुद्धभाव बनता है कि जिससे विशिष्ट पुण्य का बंध होता है ।

(592) सम्यक्त्व का प्रताप―सम्यक्त्व का फल मोक्ष है, मगर जब तक मोक्ष नहीं मिला तब तक वह गरीबी से न रहेगा । सम्यक्त्व के साथ विशिष्ट पुण्य बंध होता है । देवेंद्र तीर्थंकर गणधर आदिक के जो आनंद हैं उन आनंदों को और मुनिपद में जो बड़ी-बड़ी ऋद्धियां प्राप्त होती हैं उन सबको ये सम्यग्दृष्टिजन प्राप्त करते हैं । ऋद्धियां ऐसा उत्कृष्ट फल बताने वाली हैं कि जिनको सुनकर लोग आश्चर्य करते हैं । उन सबमें प्रधान तो है केवलज्ञान ऋद्धि, जिसके समान अन्य कोई नहीं है । पर अन्य ऋद्धि भी तो देखो―जहाँ मुनि आहार कर जायें उस चौके से हजारों, लाखों, करोड़ो, चक्री की सेना भी भोजन कर जाये तो भी वहाँ आहार खतम नहीं होता । न जाने कैसी-कैसी आकाशगामी ऋद्धियां उनके जगती? ये सब बातें सम्यग्दृष्टि के ही संभव हो पाती हैं । तो यहाँ भावपाहुड़ ग्रंथ में सम्यक्त्व की महिमा बतायी है कि इसके पाये बिना मुक्ति नहीं और जब तक मुक्ति नहीं हो पा रही है और सम्यक्त्व मौजूद है तब तक इस लोक में वह अनेक वैभवों से संपन्न होकर रहेगा, कातर कायर बनकर न रहेगा । तो ऐसा सम्यक्त्व का प्रभाव जानकर और अपना पक्का साथी जानकर सम्यक्त्व की भावना आयें और अपने आप में यह मनन बनाये कि जो विकार हो रहा, जों गड़बड़ हो रही, क्षोभ हो रहा, सुख दुःख हो रहा, यह सब कर्मउपाधि की छाया माया है, यह मेरा स्वरूप नहीं है । मैं तो अविकार ज्ञानस्वभाव मात्र हूँ । मोक्ष में यह ज्ञानस्वरूप ही रह जाता है और अन्य सब उपाधियां दूर हो जाती हैं, ऐसा परभावों से निराला यह मैं ज्ञानस्वरूप हूँ, इस चिंतन में ज्ञानानुभूति बनेगी, आलौकिक आनंद जगेगा और मोक्षमार्ग के दर्शन प्राप्त होंगे ।


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