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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 160

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सिवमजरामरलिंगमणोवममुत्तमपरमविमलमतुलं ।

पत्ता वरसिद्धिसुहं जिणभावणभाविया जीवा ।।160।।

(593) जिनभावनाभावित मुनिवरों को अतुल आनंद का लाभ―जो सम्यक्त्व से सहित हैं वे जीव सिद्ध भगवान के सुख को प्राप्त करते हैं । सम्यग्दर्शन का अर्थ है अपने आत्मा का सच्चा दर्शन, श्रद्धान होना । यह आत्मा इस शरीर से निराला है या एकमेक है? जब यह जीव शरीर से निराला है, लोग सब समझते हैं, शरीर को जला डालते हैं, जानते हैं कि शरीर में जीव नहीं है, जीव शरीर से निकल गया । तो जो निकल गया वह जीव जो निकल जायेगा वह जीव । अभी भी जीव इस शरीर से अलग स्वरूप रखता है, पर दोनों का एक जगह बंधन है, इस कारण से मेल हो गया कि यह मैं हूँ । वस्तुत: यह शरीर मैं नहीं, और जिसको यह भेदविज्ञान दृढ़ हो जाता उसकी चाहे गीदड़ी खा रही, सिंहनी खा रही फिर भी वह आत्मा यह जान रहा है कि मैं तो अमूर्त हूँ । मेरा तो कोई दखल नहीं दे सकता, उनको वेदना का भी अनुभव न था । किसी को हो वेदना का अनुभव तो उसको अभी राग है । जिसके राग नहीं रहा और बिल्कुल निराला अपना आत्मतत्त्व ध्यान में आ गया उसको शरीर के जलने से भी वेदना का अनुभव नहीं होता । भेदविज्ञान की दृढ़ता का कितना माहात्मय है, और यहाँ तो खटमल भी बर्दाश्त नहीं कर सकते । तो यह जानना चाहिए कि हमको शरीर में राग भी है, मोह भी है और जब तक रागमोह है तब तक सब आपत्ति है । तो जिन जीवों ने सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लिया वे आसन्नभव्य जीव जन्म जरा मरण से रहित हो जाते हैं, मायने शुद्ध हो जाते हैं । आत्मध्यान और बढ़ायेंगे, मुनिपद पायेंगे, निर्ग्रंथ दिगंबर रहकर आत्मा की उपासना रखेंगे तो वे भी उत्कृष्ट शुद्ध सुख को प्राप्त होते हैं । वह भगवान का सुख कैसा है? अनुपम । प्रभु के सुख की उपमा यहाँ के किसी के सुख से नहीं दे सकते । भले ही बतलाते हैं ऐसा कि तीनों लोक के जो सबसे बड़े जीव हैं, इंद्र हैं, चक्रवर्ती हैं उन सबके सुखों को जोड़ लें, उससे भी अनंतगुणा, सुख भगवान के हैं । मगर यहाँ के सुख तो इंद्रियजंय सुख हैं । उनके जोड़ने से क्या होता? उनके तो अलौकिक अतींद्रिय सुख है, सर्वोत्तम आनंद प्रभु का आनंद है । जहाँ आकुलता रंच नहीं है वही वास्तविक आनंद है । उस आनंद में किसी भी प्रकार की मलिनता नहीं । यहाँ के इंद्रियजंय सुख में मलिनता बसी हुई है, पवित्रता नहीं है, किंतु भगवान का आनंद पवित्र है, उसके साथ मल रंचमात्र भी नहीं है । ऐसा अनंत उत्कृष्ट सिद्ध का सुख ये सम्यग्दृष्टि जीव चारित्र धारण करके प्राप्त करते हैं ।


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