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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 161

From जैनकोष



ते मे तिहुवणमहिया सिद्धा सुद्धा णिरंजणा णिच्चा ।

दिंतु वरभावसुद्धिं दंसणणाणे चरित्ते य ।꠰161।।

(594) सिद्धों के ध्यान से निर्मलता के आशीष की अभ्यर्थना―सर्व जीवों के सर्वोत्कृष्ट आत्मा सिद्ध भगवान हैं । तो सिद्ध भगवान के ध्यान से आत्मा निर्मल होता है । ॐ नम: सिद्धेभ्यः, इस मंत्र पदों के सहारे सिद्ध का ध्यान करना, वे विकाररहित हैं, केवल आत्मा ही आत्मा रह गए हैं, उसका अतुल आनंद है, जिसमें अब कोई तरंग, नहीं, जो कभी लौटकर संसार में नहीं आते, वे सदा के लिए पवित्र हो गए हैं । उन सिद्ध भगवान का ध्यान हम आपके लिए बहुत बड़ा शरण है । कैसी भी विपत्ति आयी हो, सिद्ध प्रभु का ध्यान करें । मोह हटेगा, राग गलेगा, संसार टल जायेगा । संकट कुछ भी नहीं है हम आप पर बुलाये हुए संकट हैं । परवस्तु का मोह किया, परवस्तु में राग बसाया और वह परवस्तु हमारे आधीन है नहीं, वह तो जैसी परिणमन है, परिणति है तो उसके परिणमन को निरखकर यहाँ मोही जीव मानते कि हाय ऐसा क्यों हो गया? यों सोच सोचकर दुःखी होते हैं और अगर यह जानें कि ये सब तो बाहरी परिणमन हैं, जो परिणमन होना था सो हो गया, जगत के जीवों का समागम मिला है । जितना आयु का उदय है उतनी देर का समागम है । न रही आयु तो अब यहाँ से विदा हो गए, वे बिल्कुल भिन्न जीव हैं, उनसे मेरा कोई संबंध नहीं है । सबके अपनेअपने जुदे-जुदे कर्म हैं, जुदा-जुदा सत्त्व है । अपने सत्त्व में सब रहते हैं । संकट किस बात का आया? तो संकट हुआ करता है मोह और राग का । तो जहाँ मोह और राग नहीं है वहाँ संकट नहीं । तो यह स्थिति बनेगी सिद्ध भगवान के ध्यान से, अपने आत्मस्वरूप के ध्यान से । तो इस गाथा में सिद्ध भगवान का ध्यान करके अपने लिए उत्कृष्ट भावशुद्धि प्राप्त हो, यह भावना की । ये प्रभु तीनों लोक के द्वारा पूजित हैं । कैसे तीनों लोक के द्वारा पूजित है? स्वर्ग के देव और इंद्र भी इनका ध्यान करते हैं । मध्य लोक में मनुष्य उनका ध्यान करते हैं । ऊर्द्धलोक के देवेंद्र भी उनका ध्यान करते हैं और नीचे अधोलोक के भवनवासी व्यंतरदेव तथा नारकी ये सब सिद्ध के स्वरूप का ध्यान करते हैं । जिन्होंने केवल आत्मा के चैतन्यस्वरूप का ध्यान किया उन्होंने सिद्ध का ध्यान कर लिया । नरकों में भी सम्यग्दृष्टि नारकी आत्मा के स्वरूप का ध्यान बना लेते हैं । तो ऐसे ये सिद्ध प्रभु तीनों लोकों के द्वारा पूजित हैं, शुद्ध हैं । न कर्म इनके साथ हैं, न कोई विकार है । निरंजन हैं, कोई अंजन नहीं रहा, सदा रहने वाले हैं । ऐसे ये सिद्ध भगवान हमारे दर्शन, ज्ञान और चारित्र में उत्कृष्ट भावशुद्धि को प्रदान करें । कुंदकुंदाचार्य इस ग्रंथ की समाप्ति के समय सिद्ध भगवान का ध्यान करते हुए भावशुद्धि की प्रार्थना कर रहे हैं ।


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