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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 81

From जैनकोष



पूयादिसु व्यसहियं पूण्ण हि जिणेहिं सासणे भणियं ।

मोहक्खोहविहीणो परिणामो अप्पणो धम्मो ।।81।।

(238) पुण्य और धर्म की मुद्रा का निर्देशन―उक्त गाथा में यह बताया गया था कि जैसे रत्नों से हीरा श्रेष्ठ है, वृक्षों में चंदन श्रेष्ठ है इसी प्रकार धर्मों में जिनधर्म श्रेष्ठ हैं । तो अब यह जिज्ञासा हुई कि वह धर्म क्या है जो सर्वश्रेष्ठ है । उसका समाधान यहाँ दिया है । पहले तो पुण्य और धर्म इन दो में अंतर समझिये । पुण्य तो कहलाता है पूजन आदिक में अथवा व्रत तपश्चरण करने में जो शुभ भाव होता है वह तो है पुण्य और उससे जो कर्म बंधा वह है पुण्य कर्म, और धर्म क्या है मोह और क्षोभ से रहित जो धर्म का परिणाम है वह है धर्म । तो यहाँ पुण्य और धर्म में यह अंतर जानना कि पुण्य तो राग है, धर्म में राग नहीं है ।

(239) निरापद आत्मास्वरूप की दृष्टि के बिना सर्वत्र आकुलतायें―संसार के जीव अज्ञान से पुण्य की वांछा करते हैं, मेरे को खूब पुण्यबंध हो और मैं देव बनूं, राजा महाराजा बनूं इस तरह की इच्छा करते हैं, मगर देव और राजा महाराजा बनकर आत्मा को मिलेगा क्या? देव बन गया तो देवांगनाओं में रमण करेगा । यहाँ वहाँ खूब खेल तमाशे करना अथवा दूसरों की ऋद्धि को देखकर जलते भुनते रहना । यों निरंतर वे भी दुःखी हैं और राजा महाराजा भी दुःखी हैं ꠰ अभी यहाँ के बड़े-बड़े मिनिस्टरों की हालत देख लो-―एक रात भी चैन से सो नहीं सकते । मान लो थोड़ा धन वैभव इज्जत प्रतिष्ठा विशेष मिल गई, उसमें बड़ा मौज माना? तो उसका तो फल है संसार से परिभ्रमण । और धर्म से क्या है ? ऐसा परिणाम कि जहाँ यह आत्मा अपने ज्ञानस्वरूप में मग्न है, किसी द्रव्य का मोह है नहीं, न किसी बात का क्षोभ है, न आकुलता है, न रागद्वेष है, न

किसी के प्रति ममता है इन विकारों से रहित जो आत्मा का ज्ञान परिणाम है उसे कहते हैं धर्म । तो यह धर्म ꠰ तो यह धर्म सर्वश्रेष्ठ है ꠰ जीव पर यह एक बड़ी विपत्ति छायी है कि इसने परपदार्थों को अपना माना है और उसके पीछे दुःखी होता है । अपना मानने से कोई अपना हो जाता है क्या ? अरे जब यह देह भी अपना नहीं है, यह भी छूटेगा, तब फिर अन्य पदार्थ की तो बात ही क्या ?

(240) आपत्ति से हटकर निरापद अंतस्तत्त्व में आने का अनुरोध―बाह्य पदार्थों में रागद्वेष ममता होना और बाह्य पदार्थों में सुधार बिगाड़ करने का हर्ष विषाद मानना यह इस जीव पर बड़ी भारी विपदा है । लेना देना किसी पदार्थ से कुछ नहीं किसी पदार्थ का एक भी अंश इस आत्मा में आता नहीं, वस्तु का स्वरूप ही ऐसा है कि सब अपने-अपने गुणों से सत् हैं तो कोई मेरा कैसे हो सकता ? गृहस्थी में है कोई तो उसकी परिस्थिति है ऐसी कि वह घर में रहता है, घर के बाल बच्चों का पालन पोषण करता है, उनसे प्रेम व्यवहार भी करता है, लेकिन अज्ञान न रखकर यदि प्रेम पूर्वक व्यवहार बनाये रहे तब तो ठीक है, आखिर घर में रहकर गुजारा इसी तरह से चलेगा । घर में रहकर कहना यही पड़ता है कि धन मेरा, बाल बच्चे मेरे, अमुक मेरे, पर चित्त में यह बात दृढ़ता पूर्वक बैठ जाना चाहिए कि ये मेरे वास्तव में हैं कुछ नहीं, परिस्थितिवश मेरे तेरे का व्यवहार करना पड़ता है इस प्रकार की यदि दृष्टि रहेगी तो समझो कि वह धर्ममार्ग में हैं । हम आप सबका कर्तव्य है कि धर्म का पालन करना अपना मुख्य कर्तव्य समझें । चाहे कुछ भी हो, पर में की दृष्टि न मिटे । मेरा धर्म है मेरा स्वरूप । मैं अपने में यह परख बनाये रहूं कि मैं अपने स्वरूप का हूँ, मेरे स्वरूप से बाहर मेरा कुछ नहीं । जो कुछ सर्वस्व है सो मेरे स्वरूप में है, ऐसा दृढ़ निश्चय बनायें और अपने आप में रमने में संतोष पायें, यह कला चाहिए जीव को । अब लोक के जीव, मनुष्य ही देख लो, आत्मा की बात में कितने लोग लगे हैं । वास्तविक धर्मपालन में कितने लोगों को रुचि है और बाह्यपदार्थों के मनोवनोद में कितने लोग रहे हैं सो तो विचारों । धर्म के काम में तो थोड़े से लोग लगे हैं, बाकी सभी लोग बाहरी-बाहरी कामों में जुटे हैं, ये बाहरी काम सारभूत होंगे ऐसा विश्वास न बनाये । अपना सारभूत काम तो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक᳭चारित्र है । मोक्ष जाने वाले कितने होते है? अत्यंत बिरले । अनंतानंत जीवों के सामने शून्य बराबर । तो धर्म की रुचि करने वाले भी बिरले ही होगे, क्योंकि धर्मरुचि करने का फल है मोक्ष का लाभ । तो एक अपने को ही सोचना चाहिए कि मेरी पर से अज्ञान विपत्ति हटे और सहज ज्ञानस्वरूप में उपयोग रमे, यह ध्यान में लेना चाहिए ।

(241) धर्मसहित होने में आत्मा का उद्धार―इस गाथा में धर्म का स्वरूप बताया है । मोह, क्षोभ से रहित जो परिणाम है वह है धर्म । इस गाथा में पुण्य और धर्म दोनों का स्वरूप कहा है, तो एक बात और विशेष समझना कि कोई धर्म से रहित होकर पुण्य कार्य करता है तो उसके विशिष्ट पुण्य न बंधेगा और कोई धर्म से सहित हुआ शुभभाव में आता है तो उसके विशिष्ट पुण्य बंधेगा । ऊंचा पुण्य उसी के बंधता है जो धर्मसहित हो । अब यहाँ पूछते हैं कि यदि कोई जीव मोक्ष को तो जा नहीं रहा तो सम्यक्त्वपूर्वक दान पूजा, आदिक विशिष्ट पुण्य को कोई करता है तो यह गृहस्थ स्वर्ग में जाता है और परंपरया वह मुनिव्रत धारण करके मोक्ष पा लेता है । आत्मा का जो सत्य स्वरूप है ज्ञानस्वरूप, उस ज्ञानस्वरूप में जिसकी दृष्टि है, फिर अगर पूजा आदिक कार्यों में दया, दान आदिक में लगता है तो मोक्ष न जायेगा तो उसको स्वर्ग तो मिलेगा । सम्यग्दृष्टि मनुष्य देव होकर वहाँ से चलकर मुनिलिंग धारण करके मोक्ष भी जल्दी पा सकता है । यह धर्म का प्रभाव बताया गया ꠰ धर्मरहित पुरुष का पुण्य भी भला नहीं कर सकता । धर्मरहित होकर सब स्थितियों में भला है । इस प्रकार पुण्य और धर्म का स्वरूप कहकर अब कर्म के क्षय का कारण क्या है और क्या नहीं है, इसका निर्णय देते हैं ।


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