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वर्णीजी-प्रवचन

वर्णीजी-प्रवचन:भावपाहुड - गाथा 82

From जैनकोष



सद्दहदि य पत्तेदि य रोचेदि य तह पुणो वी फासेदि ꠰

पुण्णं भोयणिमित्तं ण हु सो कम्मक्खयणिमित्तं ꠰꠰82।।

(242) अज्ञानियों के कल्पितधर्म की चेष्टा की भोगप्रयोजकता―जो अज्ञानी जीव है अभव्य हैं वे कुछ-कुछ धर्म में तो लगते हैं और पुण्य के कार्य भी करते हैं, मगर भोग के लिए पुण्य कर रहे, हैं उनका यह कर्तव्य कर्म के क्षय को कारण नहीं बनता । जैसे अनेक मनुष्य अब भी दिखते हैं कि जो पूजा दान यज्ञ विधि आदिक सब कार्यों में खूब लग रहे हैं, ऐसा लगता है देखने वाले लोगों को कि ये खूब धर्मात्मा हैं, मगर उनके भीतर का आशय कौन जाने । उन्हें यह आशय प्रिय हो जाया करता है कि मैं ठीक रहूं, मेरा कुटुंब ठीक रहे, मेरी बढ़वारी हो, मैं समाज में मुख्य माना जा रहा हूँ, ऐसे ही धर्म के कार्य करने से मेरी महिमा बढ़ेगी तो ये सब जो आशय हैं ये भी भोग के निमित्त हैं । उनका जो किया हुआ कर्तव्य है, धर्म है वह कर्म के क्षय का कारण नहीं बन सकता । मोक्ष और संसार का सुख ये दोनों परस्पर विरुद्ध बातें हैं, या तो संसार मार्ग में रुले जीव या मोक्ष मार्ग में लगे । संसार के सुख की भी इच्छा करते रहे और थोड़ा-थोड़ा मोक्ष का भी काम बनता रहे, ऐसा नहीं होता । निश्चय एक करें कि हमको संसार के सुख ही पाना है या अपने आत्मा की शांति पाना? अगर आत्मा में शांति पाना है तो इसके लिए बाहर दृष्टि रखने की जरूरत है नहीं । जिसका सच्चा निर्णय बन गया अपने आत्मा में लगने का उसको संकट हो ही नहीं सकता है । दुनिया में कुछ भी होता रहे, उसके चित्त में आकुलता नहीं हो सकती ꠰

(243) मौज की गप्प में अलाभ―जो मोक्ष को ऊपरी चाहने वाले जीव हैं याने मोक्ष नाम सुन रखा और कुछ मन में वांछा भी है कि मेरे को मोक्ष मिले, पर मोक्ष का स्वरूप क्या है ? यह जिसकी दृष्टि में नहीं है, ऐसे पुरुष की चर्चा कर रहे हैं । जैसे एक घटना लो मानो कोई आदमी रोज-रोज मंदिर में भगवान की मूर्ति के समक्ष कहे कि मुझे तो मोक्ष चाहिए और कुछ न चाहिए, तो मानो देव आये और बोले कि हे भक्त चलो हमारे साथ हम तुम्हें मोक्ष में ले जाने के लिए आये हैं, तो वह भक्त पूछता है कि भाई क्या-क्या है मोक्ष में? तो वह देव कहता है, कि मोक्ष में अनंतज्ञान अनंत आनंद है । तो वह भक्त कहता―क्या मोक्ष में रहने को मकान भी है?....नहीं...., क्या खानेपीने ऐश आराम के अच्छे साधन भी हैं ?....नहीं ।....तो फिर हमें ऐसा मोक्ष न चाहिए तो मोक्ष की बात करते तो सब हैं पर मोक्ष का स्वरूप क्या है वह समझकर अगर मोक्ष की चाह करे तो उसको मोक्षमार्ग मिलेगा ।

(244) मोक्ष व मोक्षमार्ग―मोक्ष में होता क्या है? खालिस आत्मा, ज्ञानज्योति, यह ही मात्र शुद्ध है, जिससे किसी का संबंध नहीं । वह अकेला आत्मा रह गया, उसे कहते हैं सिद्ध भगवान ꠰ तो ऐसा मोक्ष मिलने का तरीका यह ही है कि अब भी अपने स्वरूप में अकेला देखो ꠰ इस दिखने वाली दुनिया में भी मैं अकेला ही हूं, इस कुटुंब परिवार में रहते हुए भी मैं अकेला हूं ꠰ धर्मात्मावों के संग में मुनिसंघ में रहते हुए भी मैं अकेला ही हूं और इस देह के बीच में रहते हुए भी मैं अकेला ही हूं ꠰ देह पर है, कर्म जुदे है और कर्म के उदय से होने वाले रागद्वेषादिक भाव जुदे हैं ꠰ मैं एक ज्ञानस्वरूप मात्र हूं, ऐसा अभी भी देखें तो उसका वह ध्यान बनता है कि जिसे मोक्षमार्ग कहते हैं ꠰ सो मोक्ष का स्वरूप समझकर आगे चलें ꠰ आत्मा का विशुद्ध स्वरूप जानकर आत्मा में आवो तो वह है धर्मपालन की विधि, लेकिन कोई पुरुष पुण्य को ही मोक्ष का कारण माने कि ऐसे-ऐसे काम मंदिर में कर लें तो मोक्ष मिलेगा, तो मात्र पुण्य को ही मोक्ष का कारण मानता और उसकी ही श्रद्धा करता और उसकी ही समझ के अनुसार अपना अभिप्राय बनाता, उसी को ही मोक्ष का कारण मानता और उसी को ही अंगीकार करता, लेकिन यह स्पष्ट है कि ये जो बाहरी भक्ति, दान, पूजा, तप, व्रत आदिक परिणतियां है सो ये पुण्य रूप तो हैं, क्योंकि हिंसा, झूठ, चोरी आदिक पापों से विलक्षण हैं, सो ये तो भोग के ही कारण हैं ꠰ स्वर्ग पा लिया, कुछ मौज भोग लिया, मगर ये मोक्ष के कारण नहीं हैं ꠰ हां यदि सम्यक्त्वसहित है वह पुरुष तो उसे देव भव के पाने के बाद मनुष्य होकर मुनिव्रत धारण कर मोक्ष हो सकता है ꠰ साक्षात् तो ध्यान पूर्वक जो आत्मचर्या है वह मोक्ष का कारण है ꠰ मोक्ष का निमित्त पुण्य नहीं है ꠰ पुण्य होता है मगर ज्ञानी पुण्य की रुचि करके पुण्य नहीं करता ꠰ उसकी भावना यही रहती है कि हे देव मैं आपका सेवक बनकर भव-भव में तुम्हारी आराधना करता रहूं ꠰ ऐसा बोलता है भक्त मगर ज्ञानी की यह इच्छा नहीं होती कि मैं प्रभु का सेवक बनकर रहूं ꠰ कहना तो पड़ता है भक्ति में मगर श्रद्धा में यह है कि मैं आत्मा विशुद्ध निर्मल शुद्ध होऊं ꠰


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